Thursday, 28 January 2016

कोई जनम रेत के बर्फ या बर्फ के रेत हो जाने की दुआ करना.........

मन कभी अपना कभी पराया सा सोचने लगता है। शाम के उतरने का मंज़र पार्क की बेंच के खाली कोने सा सालने लगता है। रोज शाम का टहलना उसको शहर की चीख चिल्ल्हाट से दूर खींच पेड़ों के उस झुरमुट में ले जाता है जिसके नीचे छनती रोशनी में बस हम दोनों बैठे हैं।

एक रुमानियत भरी शाम , कभी उदास सी शाम में और कभी सुस्त से कदमों में फिर से एक जान सी भर देती है। उन किलों और पहाड़ियों पर घूमते हुए हमने कितनी सदियाँ साथ जी ली !! हमारे साथ इतिहास चल निकला और हम भी इतिहास बन गए ना !

शहर अब कितना बदल गया है ,हम अब साइकिल से उतनी दूर उतनी खामोशी से जा ही नहीं सकते। अब कोई खामोश कोना बचा ही नहीं। हमारे पास कोई तस्वीर भी नहीं ! उन लम्हों की बस यादें हैं जिनको हम अक्सर साझा कर लेते हैं ! तुम कभी सड़क पर दौड़ते तांगों , कभी ऊंट को देख हैरान होते रहते थे। रेत के धोरे में मुट्ठी भर रेत को हाथ से फिसला कर तुम रुक जाते थे ,कुछ रेत बची रखते ....... कहते कि समय है ,देखो मैंने बचा लिया !!  ........... पर समय कहाँ रुका ?

हम रोशनी से बह निकले हैं। अब मेरी शाम तुम्हारी सुबह और तुम्हारी सुबह मेरी शाम हो गयी है। हम दोनों ही जागे कभी सोये से हैं। मैं रेत लिए बैठी हूँ तुम बर्फ से खेल रहे हो ......

दूरियों का भी कोई नाप तो होता होगा !! कैलेंडर की गिनती भी होती होगी !! कौन याद रखे ,कब तक याद रखे.......... समझौते समझ पर हावी कभी समझ समझौतों पर हावी हो जाती है। आदत हो गई है तुम्हारे नहीं होने कि और मेरे नहीं पहुंच पाने कि इतनी कि अब शिकायतों के सिलसिले भी जाते रहे।

हम जब क़यामत के पार जाएंगे तो इस कहानी को साथ ले जाएंगे !! एक बार फिर से उस किले की  किसी दीवार पर बैठ सूरज को डूबते देख साइकिल से अपने ठिकानों को लौट जाएंगे। पर कोई जनम रेत के  बर्फ या बर्फ के रेत हो जाने की दुआ करना।

ढ़लती शामों में पसरती परछाइयों में चाँद का उतर आना देखेंगे , तुम चाँद बन मेरी छत पर उतरना मैं चांदनी सी सांसों में बिखर जाउंगी ..........

रूमानी से इस ख्वाब को कैनवास पर उतार देना ! तुम लकीरों से खेलना जानते हो इस बार तकदीर में कोई साझा साँझ भी लिख देना ........ 

Tuesday, 26 January 2016

सहजता की लक्ष्मण रेखा के पार खड़े होने वाला हर याचक अब रावण दिखने लगा है..........


पिछले कुछ समय से खुद को जेहादी बनने से रोक रही हूँ , कामयाब हुई या नहीं, पता नहीं लेकिन भीतर बहुत कुछ घटा है जिसे कहने से खुद को रोक लिया है।

ये भी अजब कश्मकश है चीखने को जी करता है पर हाथ अपने ही मुहं को भींच लेते हैं। हम सब ऐसे ही हैं शायद ........... छुपाना चाहते हैं ,साझा करना चाहते हैं पर डर और संदेह के घेरों में घिरे -छिपे जिंदगी से आँख मिचौनी खेलते हैं। 

ईमानदारी की बात यही कि एक समय था जब बड़ा रुतबा था ख़ुद पर कि ईश्वर की सहृदयता का प्रतिफल मुझसे अधिक कौन जानता होगा ........  जो कुछ देखा -सुना -गुज़रा उसने उस विश्वास को दुगना कर दिया लेकिन कुछ ऐसा बीज कहीं भीतर धंस गया जिसकी शाखाएं अब संशय के फलों से झुकी जा रही हैं ....... 

आशंकाओं से भरी इस दुनिया कि कभी कल्पना नहीं की थी। अपने भीतर डरे सिमटे से लोग इतने लाचार कि उघाड़ कर दिखाना तो दूर अपने जख़्म का इलाज भर नहीं कर सकते। दिन भर दोस्ती का , रिश्तों का दम भरते हैं और सच की नाजुक सी धमक से चटख जाने से डरते हैं।  

जब सबका सच एक ही है तो सब डरते क्यों हैं ? जब सबका झूठ एक ही है तो सबका सच अलग कैसे है ?

सबका दर्द एक ,सबकी दवा एक पर सबके हिस्से अपना अपना घाव है। 

किसी ने कहा कि इश्क़ अंजाम पर इसलिए नहीं पहुंचा क्यूंकि धर्म बीच में आ गया ,किसी ने कहा की महत्वाकांक्षाएं उसे दूर ले गयीं !! किसी ने अपनी जिंदगी के मुश्किल वक़्त को अपने साथी से इसलिए साझा नहीं किया क्यूंकि "बनती नहीं है " तो किसी ने दोस्ती में बगावत कर दी। सबकी अपनी -अपनी कहानियां , अपने अपने अनुभव हैं....... कुछ भी हो बस बात इतनी सी है कि हम बे फ़िक्र हो जाने और कर देने की आज़ादी खो चुके हैं। 

अहं के जंजाल ने रिश्ते निगल लिए , उन्मुक्त हंसी निगल ली। व्हाट्स एप्प के जोक भी इस कदर बोझिल लगने लगते हैं कि एक सोचना पड़ता है कि ये हँसने  के लिए था। 

नहीं , मैं किसी परेशानी में नहीं और किसी अवसाद में भी नहीं हूँ। दोस्त ,  इसे पढ़ के मेरी मनः स्थिति का अंदाजा न लगाया करो। मुझे अब दरिया बन बहना सिखा दिया है जमाने ने। अब किनारों से उलझने से डर नहीं लगता ,न उनको खो दिशा बदले जाने से भयभीत हूँ। 

पर मुझे डर उनका है जो संदेह के इस दौर में निश्चलता से भरपूर उन लम्हों को खो रहे हैं जो ईश्वर ने किसी नियामत की तरह हमारी जिंदगी में भेजे होते हैं।  

सहजता की लक्ष्मण रेखा के पार खड़े होने वाला हर याचक अब रावण दिखने लगा है। स्नेह का दान किसे दूँ ? 

नामों के परे भी कोई संसार तो होगा जहां गुमनाम सा कोई ख्याल होगा ...... वो हंसी ,वो ठहाके ,वो किसी वादी में बिखर जाने का हसीं सा ख्याल ......... 

इर्दगिर्द शंकाओं का जंगल उग आया है ! भाग जाने का मन है........ ब्रेक चाहिए !! ब्रेक ! पहाड़ ,धुआं धुआं मौसम , धुंध की रजाई...... मैं मेरे साथ  !!

हसीं ख्याल है ना ...... पर जल्द ही ये लम्हे भी मैं चुरा ही लूंगी !! आप भी कोशिश करते रहें कि किसी अपने के अपने बने रहे वरना पराया तो हर कोई है ही !

चलते हैं ...... आप भी आनंदित रहिये , आनंदित रखिये भी !

Saturday, 9 January 2016

अकेले चलना और चले जाना ही नियति है तो ये रवायतों के मेले फिजूल हैं.…….

तुमने अपना फ्लैट क्यों बेचा !!
तुम क्यों बुलाते रहे मुझको !!
क्यों तुम मुझे ..... ...... 
वो फोन पर उलझ रही थी ,इस बात से बेख़बर कि आसपास कोई है ,उसकी आवाज़ मेरे कमरे तक आ रही थी। कॉलेज में अक्सर उलझते देखती हूँ इन लड़कियों को फोन पर ! नज़रंदाज़ कर दिया पर आवाज़ की तल्खी और दर्द मेरे जेहन में उतरा जा रहा था। मन किया कि उसको बुला कर पूछूँ ..........  पर ..... 

खैर !! वो एकआध घंटा उससे उलझती रही फिर आवाज़ खामोश हो गयी। मैं भी भूल सी गयी। 
एक दिन बाद जब शहर लौटी ,अखबार उठाया तो खबर पर नज़र गयी कि कुछ दूरी पर ही बसने वाले परिवार के तीन लोगों ने खुदकुशी कर ली। अफ़सोस हुआ , अखबार एक ओर रख उठ गयी। 

घंटी घनघना उठी ........ लड़की आपके कॉलेज में पढ़ती थी। परेशान थी ,तीन साल से सगाई का रिश्ता था ,टूट गया था .......... कर्जा था ,लड़की पर दवाब था ....... दूसरी तरफ से और भी बहुत कुछ कहा जा रहा था ! मैं शायद कुछ सुन ही नहीं पा रही थी....... 

तुम सोचते हो मेरा उसके साथ चक्कर है ,तुम ने मुझे उसके साथ कब देखा ? तुम मुझे अपनी मर्जी से ले जाते रहे ........ ! उस लड़की की आवाज़ें मेरे कानों में झनझनाने लगी। 

लड़की ,उसके पापा और उसकी माँ तीनों दुनिया से विदा हो गए। 

उस गली की जिंदगी दो दिन के बाद सामान्य हो गयी। फुसफुसाहटों का दौर चल रहा है। कर्जा था , दहेज़ का चक्कर था , बेटी पापा -मम्मी से नाराज़ थी....... मैं चुप से गुज़र आती हूँ। 

आसपास कितने घर हैं ,कितने लोग ,कितने कंधे ......... पर तीनों में से किसी को कोई भी नहीं मिला जो इस लौ को बुझने  से बचा पाता। हम सब साथ हैं पर कितने अकेले हैं ........ कितना डर है , कितने भय में जीना सिखाया जाता है। 

काश !! उस पल में उससे बात कर लेती ! काश वो भी रो पाती.......... पर ऐसा नहीं होना था। हर कोई उतना खुशनसीब भी नहीं होता कि उस दौर में कोई हाथ आगे बढ़ा के कह भर दे कि हम साथ हैं ना .......... आप चिंता न करिये !! जब बीतती है तो दर्द का अहसास जोर मारने लगता है और वक़्त कोरों को फिर से नम कर जाता है। 

बात गयी ,कल सब मेहमान भी उस आँगन से चले जाएंगे .........  जो पीछे रह गए वो भी उनके बिना जीना सीख लेंगे पर हम जो जिन्दा हैं कब सीखेंगे कि किसी को इतना भी दर्द न दें कि दर्द ही जिंदगी बन जाए। जो बाँट नहीं सकते उसे दे कर जिए तो क्या जिए ? 

जिन्दा होना और जिंदगी के साथ होना दो दीगर बातें हैं। कुछ और नहीं कर सकते तो कमजोर पलों में हाथ बढ़ा उबार लीजिये बाकि तो जो है सो हईए ही ! किस दोस्ती किस नाते रिश्तों का भरम पाले बैठे हैं ....... ?

अकेले चलना और चले जाना ही नियति है तो ये रवायतों के मेले फिजूल हैं और अगर ये सब काम के हैं तो क्या सब सिर्फ जश्न के साथी हैं ?

सवालों से उलझ रही हूँ। जवाब भी है पर अनजान बन बच निकलना चाहती हूँ। सच यही कि कभी कभी अपना ही सामना हो जाए तो डर लगने लगता है। क्यों नहीं पूछा उससे ? पर पूछ के भी क्या हो जाता ....... खुद से विश्वास डगमगा जाता है ,कभी लौट आता है। भाग्य भी कोई चीज होती है......  बहुत बहाने है खुद को समझाने के ,समझा ही लूंगी !


चलते हैं  ! जो जीती हूँ लिख देती हूँ , आप सही गलत ,नैतिक -अनैतिक सब तय करने के लिए स्वतंत्र है। 

मस्त रहिये ! खुश रहिये ! चलते रहिये !


Thursday, 7 January 2016

ये सफर मज़ेदार है....... मेरी आवारगी का दरिया हो , इश्क़ को समंदर हो जाना है।

वो एक पल होता है जिसमें जिंदगी या तो खत्म हो जाती है या फिर से जी उठती है........ आशाओं और अपेक्षाओं के बीच डूबती उतरती ख्वाहिशें और ख्वाहिशों की बेहिसाब बारिश में भीगते हम -तुम। तुम कब समंदर बन गए पता ही नहीं चला मैं कब सिमट के दरिया रह गयी नहीं पता। बरसों गुज़र गए तुम खार से उलझते रहे मैं गति से उलझती रही। तुम कब मेरे मन के किसी कोने से विस्तार पा किनारों से पार हो गए ,कैसे मैं जिंदगी की ताल -बे -ताल पर बहती रही......... कोई तो हिसाब होना चाहिये ना !

कभी कभी जी करता है कि तुम कुछ कहो और हज़ार सवाल  पूछो। तुम कुछ कभी नहीं पूछते , क्यों सिर्फ मुस्कुरा कर हाथ आगे बढ़ा देते हो ? नाराज़गी इस बात से भी कि कभी तो समंदर दरिया से उलझे ..... हाहाहा !
मुझे पता है तुम कहोगे कि क्या होगा पूछने से ? क्या जवाब दोगी तुम ? हम्म ,उसका कहना भी सही है , जब  जवाब कुछ नहीं तो सवाल पूछने भर से क्या होगा ! ये भी सच है और झूठ ये भी कहाँ कि हम शिकायतों की जद से भी परे आ पहुंचे हैं।

कितना अनमोल एहसास है तुम्हारे होने का ! हजारों दास्तानें हैं जो तुमको सुनानी हैं , तुमसे कहनी हैं ,कुछ पल हैं जो तुमसे साझा करने हैं……चुप से हाथ थामे चलते रहने में भी कितना सुकून है। 

सुकून की गर्माहटों की बीच जिंदगी के तमाशे चलते रहते हैं। कभी खुद पर हंसने के पल कभी खुद पर रो देने के पल ...... सब कुछ फिर वहीं तुम पर आकर खत्म हो जाते हैं। लहरों से आते हो और मन की हर शंका को बहा ले जाते हो। मैं फिर से जी उठती हूँ , मैं फिर से बह निकलती हूँ। 

कहीं तुमने लिखा था कि तुम्हारे और मेरे ख्यालों के बीच समंदर का ये शोर भी तुम्हें पसंद नहीं लेकिन देखो वक्त ने तुमको ही समंदर बना दिया। कितने खामोश दिख रहे हो पर भीतर के शोर की आवाज़ मैं सुन पा रही हूँ। हमने ऐसे ही जीना सीख लिया है। तुम आकाश से जा मिले हो मैं ककंर -पत्थरों को पार करती ,समेटती , खुद को आगे ठेलती जा रही हूँ। 

ये सफर मज़ेदार है.......  मेरी आवारगी का दरिया हो, इश्क़ को समंदर हो जाना है। जी भर के चाहा है जिंदगी ने मुझको और मैंने समंदर को। जब समंदर से निकली तो जिंदगी ने मीठा कर दिया अब ख्वाहिश ये कि मैं जिंदगी से बाहर आऊं तो समंदर का खार मेरे रोम रोम का निशां खत्म करे ,मेरा वजूद  तुम में इस कदर घुल जाये कि मैं लहर दर दर लहर तुममें फिर फिर मिलती ही रहूँ ..... 

उफ्फ्फ ये ख्वाहिशें ! ना जीने दें ना मरने दें..... पर अच्छा है कि ये मेरी आवारगी की लौ को दिए में तेल रहने तक जिलाये रखें बाकी हवाओं को किसने रोका है , मैं वहीं थमी हूँ आप जम के बहते रहिये !




Thursday, 31 December 2015

काल की गति कैलेंडर की मोहताज नहीं है........ !!

वक़्त ने बीतना होता है , बीत जाता है। हम तारीखों को ढोते हैं और समय हमारी कलाईयों पर बंधे रहने का भरम देता हुए हमें कहीं पीछे छोड़ जाता है। आगे बढ़ना भी कहाँ हो पाता  है। जो पीछे छूट गया वो भला था या बुरा था जैसा भी रहा गुज़र गया.......  कुछ सीखा कि नहीं ,नहीं कह सकती ये भी वक्त ही तय करेगा। 

खुशनसीबी पर इतराने को जी करता है तो दूसरे ही पल मन उदास भी हो जाता है। लम्हे बड़े सौदाई होते हैं ,हर एहसास की कीमत मांगते हैं। सिर पर प्यार करने वालों का उधार चढ़ा है उधर नफरत करने वाले दरवाजा पीट रहे हैं। मैं किस से तकाजा करूँ ? दोनों ही मेरे अपने हैं.......  मेरे ही लेनदेन के खाते है। 

जाईये गुज़र जाईये , हर गली में सौदाई हैं ,हर गली जज्बात बिकते हैं , रिश्तों की होली जलती है कभी ख्वाबों की दिवाली मनती है। ये कारवां है  जिधर से गुज़र जाए जिंदगी , अजब रंग बिखरे हैं गज़ब लोग मिलते हैं। 

 ये साल शानदार रहा , उम्मीद से बेहतर हासिल किया और उम्मीद से कहीं अधिक खो भी  दिया। पाया जो कुछ सर माथे , जो खोया उसका हौसला जुटाने में जो पाया वो भी उम्मीद से बढ़ कर पाया। अफ़सोस कुछ नहीं बस यही तल्ख़ी रह गयी कि कुछ सितारे जो फ़लक पर चमक सकते थे वो अनजाने ही जमीन पर आ गिरे और मैं निमित्त बन गयी। 

तोड़ देते हैं कुछ पल, कुछ भरोसे डगमगा जाते हैं ,कुछ उम्मीदें जला के ख़ाक कर देती हैं लेकिन दूसरे ही पल कुछ नए लम्हे हाथ आगे बढ़ा  देते हैं........   विश्वास  लौट आता है , भरोसा और बढ़ जाता है कि ईश्वर हमारे लिए कभी गलत चुन नहीं सकता। 

मैंने जो चुना गलत चुना पर वही सजा मेरे लिए नियति ने तय कर रखी थी कि मैं ठोकर खा लूँ तो समझूँ कि जिंदगी सीधा सपाट मैदान नहीं है। घुटने छिले हैं तो दर्द भी होगा ,कुछ तमाशबीन हंसेंगे भी लेकिन जख्म याद दिलाता रहेगा कि काल की गति कैलेंडर की मोहताज नहीं है। 

मैंने जो निर्णय किये वो सही थे क्यूंकि उन्हीं ने मुझे सच को जीने का हौसला दिया। नई मंज़िलों के पते मिले ,नया आसमान मिला। ईनाम के तौर  मिली किसी अजनबी मुस्कुराहट की कीमत  लगाई ही नहीं सकती।  

जो किया दिल से किया ! शिकायत किसी से अब कोई बाकी नहीं..........  कटुता शेष नहीं केवल मंगल कामनाएं हैं .......  नियति क्या चुन के लाई है पता नहीं पर मेरी दुआएं आप के हर नेक कदम पर आपके साथ हैं। 

2016 मेरे जीवन में तुम्हारा स्वागत है !




Saturday, 12 December 2015

वो एक रिश्ता है , डूबने लगती हूँ तो हाथ बढ़ा देता है .........

जिंदगी के कैनवास पर जितनी भी बार नज़र डालो हर तस्वीर कुछ पहचानी सी लगती है मनो कल की ही बात हो , कभी बोलती से लगती है कभी सिर्फ खामोशी से मुझे देखती है।  इन तस्वीरों में एक उसका चेहरा भी है जो हर तस्वीर के पीछे से मुझे खामोशी से देख रहा है। बरसों का खामोश साथ है , कितने रंग चढ़े और फीके भी पड़ गए पर उसकी चमक कभी गयी ही नहीं।

वो एक रिश्ता है , डूबने लगती हूँ तो हाथ बढ़ा देता है और जब तैरने का जी चाहता है खामोशी से मुझे लहरों के साथ खेलते देख मुस्कुरा भर देता है। उसके किनारे पर बैठ मुझे देखते रहना बड़ा सुकून देता है। ये यकीन हो जाता है कि शाम ढ़ले वहीं किनारे उसी से मुलाक़ात होगी।

अल्हड़पने के वो दिन उसने बखूबी संजो लिए हैं।  न मिलने न बिछड़ने के दर्द से परे के ये खामोश रूमानी से लम्हे, इश्क़ का वो दरिया बन गए जिसे उस नीली छतरी वाले ने खुद मेरे लिए रचा है।  वक्त का ये दरिया अब और खूबसूरत दिखाई देता है। किसी शाम जब आँखों से कुछ लम्हे झरने लगते है तो दरिया का ये किनारा ही कुछ कंकर हथेली में थमा जाता है और मैं घंटों उसी खेल में गुम फिर से आसमान छूने के लिए उड़  जाती हूँ। अपने पंखों पर इतराती, लजाती देख वो मुस्कुरा भर देता है। 

इस रिश्ते का कोई नाम न होना ही इसे संजोये हुए है। नाम वाले रिश्तों के साथ अपेक्षाओं और आक्षेपों के सिलसिले होते हैं ,बड़े अजीब होते हैं ,होते हैं पर किसी और के होते हैं। मेरे भी हैं ,सबके होते हैं पर मैं उनमें कहीं नहीं हूँ।

सांसों से लिखे नाम वक्त की सियाही भी धुंधला नहीं पाती। उसके साथ के वो पल इतने अज़ीज इस कदर अपने कि वजूद कब पिघल गया और एक नए सांचे में ढल गया पता ही नहीं चला। मैं लम्हा लम्हा जीती रही वो लम्हा लम्हा संजोता रहा और बरस बीत गए। न उम्मीदों की गुलामी न नाम की जिदें .......... न रवायतों की जंजीरें। आवाज़ देने से पहले आवाज़ सुन लूं और बिना देखे भी जिसके  जख़्म पढ़ लूं उस रिश्ते के साथ जिंदगी बसर हो तो मंज़िलों की परवाह कौन करे !

मेरी आवारगी को खुदा ने रहमतें बख्शी हैं। बेशुमार मोहब्बत पायी है मैंने जिंदगी से ,इतनी कि शिकायतें अब कोई बाकी नहीं हैं। सवाल हज़ारों हैं ,रोज़ बुलबले से उठते -बैठते हैं।  मैं उन आँखों के समंदर को पढ़ लेती हूँ तो हर सवाल का जवाब मिल जाता है।

दर्द के जंगल के पार वो  राहतों का दरिया है  ,वो आकाश जिसने मुझे अपने भीतर ऐसा सहेजा कि मैं हर उड़ान के बाद भी उस जद को पार नहीं कर पाती जिसके पार वो नहीं है। 

मेरी आवारगी तुझसे मेरा ये रिश्ता मेरा प्यार है ...... चल ले चल, जहाँ चाहे ... अब कोई अरमान भी बाकी नहीं सिवा इसके कि तेरा साथ हो और हाथ में तेरा हाथ हो ....... आ अब उड़ चलें !







Sunday, 6 December 2015

जितने चेहरे चाहे लगा लीजिये ,हर चेहरे का सच वही होता है जो आप हैं.........

एक अरसा हो गया अब यहाँ  , शायद डेढ़ साल ___ ट्विटर की मायावी दुनिया एक आईने  की तरह मेरे सामने है, मन जैसी कभी सीधी सपाट कभी एक दम जंतरम् -मंतरम्।

140 की सीमा में किसी के चरित्र और उसकी जिंदगी का खाका खींच लेने की धृष्टता आपने भी की होगी ,मैंने भी की है। कई बार महसूस हुआ कि किसी नतीजे पर पहुंच गयी ,दूसरे ही पल लगा कि शायद गलत हूँ। कुछ बेहतरीन हैंडल थे जिनके पीछे की सोच बेहद सुकून भरी थी ,कुछ आलोचनाओं के पुलिंदे ,कुछ शिकायतों के  सिलसिले ........ हम उन्ही का पीछा करते हैं जिन्हें  या तो पसंद करते हैं या सख्त नापसंद। जिन्हें पसंद करते हैं उन्हें पढ़ते हैं , प्रतिक्रिया देते हैं ,संवाद  करते हैं और जिन्हें पसंद नहीं करते उनका पीछा इसलिए करते हैं कि उन्हें लगातार ये जता सकें कि हमें आप में दिलचस्पी नहीं है या किसी दिन पीछा करना बंद कर देंगे , खामोश कर देंगे और विजयी भाव से खुद को भर लेंगे।  

 इन हैंडलों के भीतर एक अजीब सा सच और एक अजीब सा झूठ छिपा है। सच वो जो किसी प्रतिक्रिया के रूप में अनजाने ही सामने आ जाता है और झूठ वो जो दिन -रात शब्दों की  माया से गढ़ा जाता है। पिछले कुछ दिनों में कुछ ऐसे ही मायाजाल से उलझ रही हूँ....... व्यक्ति अपने सच से भागने लिए झूठ के जंगल उगाता  है। दिन रात बे सिर -पैर की बातें और उस दुनिया के किस्से कहानी सुना रहा है जिसमें वो है नहीं ,मायावी संसार गढ़ लिया है इर्दगिर्द  !

अप्राप्य के प्रति कौन आकर्षित नहीं होता लेकिन उसको अभिव्यक्त करने के लिए जिन शब्दों ,तस्वीरों का चयन किया जाता है उसे सम्भवतः आपके भीतर का जमीर भी इजाज़त न देता होगा। आप कैसे इतना गिर सकते हैं ? कैसे आप अपनी क्षमताओं के साथ इतनी निर्लज्जता के साथ बलात्कार कर सकते हैं और खुद ही उसको सम्मान भी देते हैं। खुद का महिमामंडन खुद के बनाये कल्पना लोक में ?

धीमा विष है जिसे पिया जा रहा है ...... जितने चेहरे चाहें लगा लीजिये ,हर चेहरे का सच वही होता है जो आप हैं । कितना भागेंगे ,कब तक भागेंगे ? जितना भागेंगे  ये उतनी गति से आपको दौडायेगा और एक दिन आपको ही थका देगा। 

इतने बेनामी हैंडल बना कर व्यक्त्तिव के उस हिस्से का पोषण करते हैं जिसे वक्त रहते खत्म किया जाना चाहिए लेकिन इस स्वनिर्मित संसार में होता उल्टा है। 

झूठ से सच की जंग कैसे जीतेंगे ,पता नहीं। जो भी हो मैं भी सीख रही हूँ ,देख रही हूँ ,समझ रही हूँ कि इंसान कोई एक भाषा न बोलता है ना समझता है। सहजता की इतनी कमी क्यों है , क्यों सब इतना बिखरा सा है ?

ट्वीटर का ये सफर अजब स्टेशनों से गुज़र रहा है ,अजब मुसाफिर -गजब के किस्से। 

मैं और मेरी आवारगी हमेशा की तरह इस बार भी इन सबके बीच से होकर , हर बार वहीं पहुँच जाते है जहाँ उसे जाना होता है ........  कहीं दूर - गुम जाने के लिए तैयार , झूठ की दुनिया में सच की बेजा तलाश है ! एक उम्मीद है , सो जाते -जाते ही जाएगी ! मैं हमेशा सफर में ही हूँ। 

आप भी चलते रहिये .......