Saturday, 20 June 2020

बालकनियों में उतरती शामों के किस्से हमेशा रूमानी नहीं होते .....


                           

नींद जब नहीं आती तो नहीं आती और जब आती है तो सुबह आती है जब जागना होता है ..... उठने – सोने का वक्त बदलता रहा !! पहले अपने स्कूल की बस निकल जाने का डर जगा देता था फिर बच्चों की स्कूल बस का, उसके बाद आदत बन गयी और चाहने पर भी देर तक सोना नहीं हो पाया |

पिछले तीन महीने में व्यवस्थाएं बदलीं !! बच्चे हॉस्टल से घर आ गये और संजय ने भी घर को दफ्तर बना लिया था ! बदलना केवल मुझे था , मुझे सबको वैसा ही माहौल देना था जैसा उनके कॉलेज –हॉस्टल –ऑफिस में होता है | घर का एक कोना जो नहीं बदला वो थी रसोई .....सारे स्विच बोर्ड चार्जर से लदे रहते , बिस्तरों पर ,सोफे –कुर्सी ,मेज पर लैपटॉप –पावरबैंक ,किताबें .... कपड़े कहीं और सिरहाने पानी की बोतलों का जमावड़ा !! इस बेतरतीबी से झुंझला कर कलह करने से भी कुछ नहीं होना था क्योंकि मोबाइल और कंप्यूटर से गर्दन उठाने का वक्त किसी के पास नहीं था |

नाश्ता क्या बनाऊं ?
बना लो , जो बनाना है !!
पोहे ?
नहीं कुछ और ?
इस और का जवाब ढूँढने का वक्त किसी और के पास नहीं था, वो मेरा धर्म था, मुझे ही निभाना था |
नाश्ते के बर्तन धोना फिर खाने की तैयारी के बीच सीमा के ना आने का मलाल करते करते झाडू –पोंछा....
करती क्या हो सारा दिन ?
ये काम नहीं है क्या  ?
कोई कुछ कहता नहीं, जैसा जचे जब जचे कर लिया करो क्यों परेशान रहती हो ?

संजय की आवाज़ की तल्खी मुझे हर बार ये बात बताने से रोक देती कि परेशानी काम से नहीं है, उस वक्त से थी जिसमें मैं कहीं हूँ ही नहीं ! पत्नी और मां होने के अलावा मेरा कोई वजूद है क्या ? कुछ देर मोबाइल हाथ में ले लो तो संजय की गर्दन ऐसे घूमती है , जैसे मैं कोई गुनाह कर रही हूँ !

क्या देखती रहती हो इसमें ?
व्हाट्सएप्प है , कानपुर वाली बुआ के पोता हुआ है !!
हुआ होगा , हमें क्या ? ये ग्रुप छोड़ दो, बेकार गॉसिप और पोलिटिकल बातें हैं, दिमाग खराब करती हैं |
मैं सिर्फ देखती हूँ , कहती कुछ नहीं !
बेकार टाइम खराब करना है |
तो क्या करूँ ?
पढ़ा करो !
क्या ?
जो पढ़ना चाहो !!

याद आया पढ़ने के लिये पिछले मेले से कुछ किताबें लाई थी | एक रोज उठाईं, कुछ पन्ने पलटे कि संजय कहने लगे कि ये बेकार ऑथर है , सनसनी के लिए लिखता है |

किताब उस दिन से शेल्फ से बाहर नहीं निकली |

तुम घूम आया करो , वजन बढ़ जाएगा !!
ठीक है , शाम को जाउंगी !
शाम को तो बच्चों के स्नैक्स का टाइम होता है ,कैसे जाओगी ?
तो सुबह चली जाउंगी !!
देख लेना ऐसे जाना कि 7 बजे तक लौट आओ, मुझे 8 बजे रिपोर्ट करनी होती है !!
उसके बाद वो सुबह भी आज तक नहीं आयी |

ना घूमने जाना हुआ ,ना पढना ,ना सोना ,ना जागना ......
इस सब का अभ्यास हो गया है मुझे , अब यही जिन्दगी है | मैं नहीं समझ पाती कि 14 दिन के क्वारेंनटीन से या होम आईसोलेशन से लोग डरते क्यों हैं ? ये होम आईसोलेशन तो मैं 28 बरस से जी रही हूँ !!!! चुप्पी का एक मास्क ओढ़े रिश्तों को बचाते, जी रही हूँ |
क्या पहनना है ,क्या बनना है ,क्या लाना है, किससे रिश्ते रखने हैं और किसके साथ कितनी दूरी रखने है सब गाईडलाइन जी ली हैं मैंने |

बच्चों को क्या खुद में शामिल करूं , मैं अब मेरे साथ नहीं रहती !!
तो, ऐसे कब तक चलेगा ?
चलेगा, सबका चल ही रहा है | बच्चों की अपनी दुनिया है, अपनी परेशानियाँ हैं..... उनको और क्या परेशान करना !! सबको अपने हिस्से की चक्की चलानी हैं– अपना पेट भरना है| भाड़ है दुनिया – फूंक मारते जाओ !!

आभा कहती जा रही थी ...... धाराप्रवाह , सांस की फ़िक्र किये बिना !!
फेसबुक पर तुम्हारी तस्वीरें देखकर मुझे लगता था कि तुम अपने परिवार में खुश हो ?
हाँ ,खुश हूँ मना कब किया ?
फिर खुद में नहीं होना क्या है ?
कुछ नहीं बस ज़िंदा रहना है , साँसों के खेल को मेले में बदलना भर है | इसका ख़ुशी या नाखुशी से कोई वास्ता नहीं है !! जो ख़ुशी है तो बस इतनी कि अब दर्द नहीं होता ना किसी से झगड़ने का मन करता है | संजय की कर्कशता और मेरे प्रति उनका दोयम प्रेम मुझमें अब ऊब और गुस्सा भी नहीं भरता !! वो जब  कभी कहता भी है कि तुमको लोगों से तौर तरीके सीखने चाहियें तो लगता है कि इतना दोगला होने से बेहतर है चुप रह जाना , अकेले रह जाना |

आभा कहते कहते चुप हो गयी ....पीछे से आवाज़ आ रही थी “किससे इतनी देर तक बातें कर रही हो ? समय देखो, ये फोन करने का वक्त है क्या ?

आभा ने रिसीवर रख दिया , उसका फोन आना कम हो गया है ! उसका होम आईसोलेशन अंतहीन है , उसके लिए इस जिन्दगी से जूझने के सिवा कोई विकल्प नहीं !! उसके प्रश्नों का मेरे पास समाधान नहीं और मेरे समाधानों को वो अपने सवालों में फिट कर पाए उसके पास उतनी स्पेस नहीं |

ये हर बंद दरवाजे के पीछे की कहानी है .... समन्दर की स्याही से रेत पर लिखी कहानी !! फेसबुकिया तस्वीरों से किसी की तकलीफ , भीतर चल रहे संघर्ष और इन्कलाब की करवटों को जान लेना आसान नहीं | प्रेम का परिंदा उड़ान चाहता है पर हमने उसे दुनियादारी की और कभी अपने कम्फर्ट जोन की सलाखों के पीछे धकेला है |


बंद दरवाजों और बालकनियों में उतरती शामों के किस्से हमेशा रूमानी नहीं होते ...... इनके किरदार अपने वजूद की लड़ाई - लड़ते , समझौते करते करते लम्बी नींद सो जाते हैं !! इनके ख्व़ाब बहुत खूबसूरत होते हैं , मौका मिले कभी आपको तो इनके सोने से पहले उनको जगा के पूछियेगा, खुद से और दुनिया से आपकी भी शिकायतें कम हो जायेंगी  !!!!

Sunday, 28 April 2019

लेकिन फिर मन कहता है नोटा नहीं , उम्मीद को चुनना !!

दम घोटू चुनाव प्रचार और  उथले - कुंठित नवोदित नेताओं की सुनामी ने लोकतंत्र के इस महापर्व को कचरे का ढेर बना डाला है |

मन नहीं करता कि घर से बाहर जाकर झाँका भी जाए कि कौन वोट मांगने आया है,कौन जाने वो किस बहाने से आपके सुख  की रेकी कर के चला जाए | बहसों से बच के निकल जाती हूँ , आएगा तो मोदी ही - या पप्पू की मम्मी या फिर केजरीवाल ......... कान में सब कुछ पड़ता है पर मन जाने क्यों सब से निर्लिप्त है | 

ये अजीब उत्साहहीनता का दौर है ,  वैसा ही जैसा हमेशा से रहता था | 

छोटे थे तो हर दल की रैली के झंडे - बिल्ले लगा कर घूम लेते थे | पापा कट्टर कांग्रेसी थे सो पंजे पर जोर रहता था लेकिन जयपुर ग्रामीण से बीजेपी सांसद गिरधारी लाल भार्गव जो सात बार जीते थे , उजला अरोड़ा जो विधायक थीं पारिवारिक सदस्य ही थे ,के साथ कमल भी कहीं साथ चलता था |  वो दौर अटल बिहारी वाजपेयी ,वीपी सिंह और इंदिरा -राजीव का था |  सबका साथ रहता था , जनसंघियों का भी खूब आनाजाना था | 

राजीव गांधी को सुना था मैंने ,इंदिरा को भी....... अरविन्द केजरीवाल के शपथ ग्रहण में रामलीला मैदान की भीड़ का हिस्सा भी थी !!

सब देख सुन लिया और जी लिया ....... उम्मीदों को बनते बिगड़ते ,जोश को उठते -बिखरते -ठहरते देख लिया | सत्ता कैसे सपनों को छलती है और उम्मीदों को कैसे वोट में बदलती है ,सब देख लिया | 

आप चुनते किसी और को हैं वो निकलता कुछ और है , आप चलते उसके साथ हैं पर वो मंजिल बदल लेता है !! अब आधे रास्ते से लौट जाने या वहां रुक कर उसके लौटने ,पीछे मुड़ कर देखने की उम्मीदें भी जाती रहती हैं | कारवाँ बढ़ता रहता है , तारीखें बदलती रहती हैं और सरकारें भी | 

नहीं बदलता है कुछ तो वो है हमारी नियति !! 

तमाम तरह के हथकंडे अपना कर मोदी भले सरकार बना लें लेकिन ये बात वो भी जानते हैं कि देश को उन्होंने धर्म -जाति -समाज -देशद्रोही -देशभक्त में बाँट दिया है | इतना बैर -इतनी कटुता .......आप देश को बाँट कर उस पर राज कर सकते हैं लेकिन उसके दिल में जगह नहीं बना सकते | कांग्रेस की नीतिगत विफलताओं और भीतरघात ने देश को कमजोर विपक्ष  दे दिया जिसका परिणाम अब मोदी के रूप में सबको भोगना  पड़ रहा है | 

किसी भाषण में ,किसी परिचर्चा में वो देश के मुखिया नहीं लगे | बीजेपी के प्रवक्ता से ज्यादा इस व्यक्ति की कोई हैसियत नहीं है | फर्जी आंकड़े और फर्जी दावों के बूते पर अगर मोदी ही आएगा तो आ जाए !! कम से कम मेरी पीढ़ी इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराई जा सकेगी | 

देश जिम्मेदार है ,लोग जिम्मेदार हैं अपने गलत निर्णय के लिए !! हम काम नहीं देख रहे ,काम के नाम पर हो रहे प्रचार से भर्मित किये जा रहे हैं कि लगे कि अथाह काम हो रहा है | 

अब ऐसे में क्या देखना है ,क्या सुनना है ,किसे चुनना है सब कुछ नोटा हो गया है | 

लेकिन फिर मन कहता है नोटा नहीं ,  उम्मीद को चुनना !! 

कल वोटिंग है ,मैं वोट दूंगी आप भी वोट जरूर देना  भले मन हो या ना हो !! चुप रहे या बैठे रहे तो हम भी कहीं गुनहगार ही ठहराए जाएंगे | 

जय लोकतंत्र -जय जनतंत्र !!!


Sunday, 24 February 2019

ये माटी ,पहाड़ ,नदियां ,जंगल ,खेत....... एक यायावर है मुझमें जो कभी टिकने नहीं देता !


वक़्त कहाँ रुकता है किसी के लिए और अगर रुक भी जाये तो कौन ठहरता है उस वक़्त के लिए ?
कभी वक़्त को हमारे लिए फुरसत नहीं और कभी हमें वक़्त का इंतज़ार करना नहीं आता....... हम सब ठेले जाते हैं ,कभी इसके मन से तो कभी उसके मन से !!

एक रोज़ जंगल की पगडंडी पर पत्तों की चरमर सुनते हुए मैंने जाना कि खुद के लिए वक़्त निकालना कितना जरूरी है | पहाड़ों से उड़ कर आते बादल और सीली हुई हवा ने कान में कहा कि अब आयी हो तो लौटना मत...... मैं अब उसी की सुनती हूँ | जब तक उसकी नहीं सुनी थी , उलझन में थी कि किसकी सुनूं ?

ये माटी ,पहाड़ ,नदियां ,जंगल ,खेत....... एक यायावर है मुझमें जो कभी टिकने नहीं देता ! वक़्त ने जीना सिखा दिया ,चलते रहना सिखा दिया , इंतज़ार करना सीखा दिया |

घुम्मकड़ी को जिंदगी का हिस्सा बना लीजिये , समझ जाएंगे कि जीने लिए दुनिया भर के तामझाम नहीं चाहिए | मौत भी आने से पहले आपके इंतज़ामात का जायजा लेने नहीं आएगी | कितना भी आराम जुटा लें , रिश्तों का कितना भी जमावड़ा हो आसपास...... आपको सुकून तो पल दो पल आँख बंद करके अकेले हो जाने में ही मिलेगा |

जब आनंद भीतर है तो बाहर किसे ढूंढना और किसके लिए महल -असबाब इकट्ठे करने हैं ?

भीतर के बच्चे को ज़िंदा रखिये और उसके बचपन को महसूस कीजिए | वक़्त को कैलेंडर का और कैलेंडर को जिंदगीनामा बना लेंगे तो जियेंगे कब ? लोग शिकाययत करते हैं ,उसके लिए इतना किया पर उसने ऐसा किया -वैसा किया...... ये सच है ,हम नाशुक्रे लोग हैं ! जिसने किया, वो उसका फर्ज था सोच कर आगे बढ़ जाते हैं ,ये सोच कर कि ना भी करता तो कौन सा उसको कहा था करने के लिए...... व्यथा की कथा यहीं से शुरू हो जाती है |

क्यों किया ?

इसीलिये कहती हूँ , कीजिये पर खुद को बचा ले जाईये इस कपोल कल्पित बोझ से | सब के कर्मों का भार अपने कंधों पर कैसे रखा जा सकता है |

वक़्त पर भरोसा करना और वक़्त से शिकायतें करना जरूरी नहीं है और लाज़मी भी नहीं ! अवसाद और खुशी का हर मौका पेड़ -पहाड़ -नदी -हवा...... के साथ साझा कीजिये और वक़्त की धुन को गुनगुनाइए ,यही जीवन संगीत है ,यही वक़्त है जीने का.......

जीते रहिये -चलते रहिये !!

Sunday, 20 January 2019

मैं चाँद पर हूँ , हूँ तो हूँ !! कम से कम सुबह होने तक तो हूँ ना .......

एक रोज़ आसमां पर टहलते हुए चाँद के करीब पहुँच गयी........ गुजरते हुए आंचल में सितारे अटक गये थे ,अटके रहने दिए !! कुछ उठा के जूड़े में भी अटका लिए...... !! चाँद मुझे देखते ही खिल गया , कहा आओ..... कब से इंतज़ार था तुम्हारा !!

मैं हंस पड़ी ,ये सोच कर कि ये भी निरा झूठा है ,मेरा इंतज़ार इसे क्यों था भला ? सारी दुनिया इसकी तरफ देख के आहें भर रही है , जाने कितने ख्वाब ,जाने कितनी ख्वाहिशें इसके इर्द गिर्द घूमती हैं........मेरा इंतज़ार ?

उसको अनसुना कर दिया मैंने ! मैं बस उसको छूना चाहती थी ,ये देखना चाहती थी कि वो वास्तव में उन कल्पनाओं के जैसा है भी या नहीं जिसके लिए दुनिया छोड़ने की जिद की ??

अजीब होती हैं ना ख्वाहिशें भी ! रात सितारे हथेली पर धर जाती है और दिन माथे पर सूरज रखकर चला जाता है | हम कहाँ होते हैं इन सब के बीच ? कोई भी कहाँ है ? सबके पास अपनी अपनी दुनिया है , कहने भर को सब इसी दुनिया में हैं !!

हर कोई अपने आप में एक टापू है , उस तक पहुंच भी जाओ तो सब से कट जाना होता है और वहां से निकलो तो उसको छोड़ देना होता है | कोई विकल्प नहीं कि सब संग हो , सब साथ हों....... बस एक ही सुकून है , ख्वाब !!

मैं चाँद पर हूँ , तो हूँ !! कम से कम सुबह होने तक तो हूँ ना .......उससे हजार सवाल करूंगी , उसकी नजर से दुनिया भी देखूंगी !

मैंने कहा , मुझे ले चलो अपने साथ .......वहां बादलों से पार !! दुनिया देखनी है मुझे ?

वहीं से तो आयी हो ? वो हैरान था !

हाँ , पर वहां से कुछ समझ नहीं आयी , अजीब था सब !! भीड़ लगती थी पर सब अकेले ही मिले ......!

तो , तुमको क्या लगता है यहाँ से सब एक साथ दिखेंगे ?

हाँ ,दिखेंगे ! दूर से सब के करीब होना धोखा होता है ना !! फिर तुम भी तो उनके लिए वैसे ही मरीचिका हो.. तुम्हारी कसमें खाते हैं , तुमको देख कर कितने व्रत उपवास होते हैं , किसी के बचपन का सहारा और किसी की जवानी का .......पर तुम भी तो कहाँ हो ?

हूँ तो !! देखो छू कर देखो मुझे ....... मुझमें भी धडकन है , मुझमें भी बचपन है और जीवन का हर रंग है !! चलो ले चलता हूँ तुमको वहां जहाँ से तुम अपनी इच्छा पूरी कर सको !!

हम बादलों के पार चल पड़े ! चांदनी की दरिया पार कर कोई जगह थी , उसने कहा मेरी बाहं कस कर थामना और फिर नीचे देखना !!

मैं हैरान थी ,हथेलियाँ उसकी बाहं को और कस रही थीं ......मेरी दुनिया तो बिलकुल अलग है , एक दम बूँद बराबर , लोग भी कहीं नहीं , बस रोशनी ही रोशनी तो कहीं समन्दर कहीं पहाड़.......!! ये वैसी नहीं है, जैसी मैं सोचती थी !!

तुम डर रही हो ? चाँद ने पूछा !!

हां !! ये कैसे हो गया ? जो उम्र भर जिया वो झूठ कैसे और ये सच कैसा है ?

वो हंस दिया , कहने लगा "सुनो , मैं भी तो मिट्टी हूँ ! ना चांदनी मेरी है ना मर्जी से मेरी सूरत तुमको दिखा पाता हूँ...... असमान में टंगा हूँ ,ना जमीन मेरी है न आसमान मेरा है पर मुझे तुमसे प्यार है........इसलिए कि तुम मेरी दुनिया हो और मुझसे मिलने यहाँ तक चली आईं........अब जाओ ,लौट जाओ ! देखती रहना मुझे ,हर रात तुमको नई नज्म सुनाऊंगा ,तुम्हारे लिए कुछ कहानियां और गीत भी लाऊंगा......

और सुनो , दुनिया वही है जिसमें तुम खुश रह सको और खुशी का कारवां भीतर से बहता है !! उसे महसूस करना और खुश रहना...... मुस्कुराना कि चाँद भी तुम्हारा है और दुनिया भी !!

नींद तब तक खुल गयी थी ,सूरज माथे पर चढ़ आया था पर एक चाँद भी कहीं दूर क्षितिज पर था , जो देख कर मुस्कुरा रहा था कि मैं सलामत से अपनी दुनिया में लौट आयी हूँ उसके प्यार को हजार सितारों के साथ जीत के आयी हूँ ...........

Thursday, 20 December 2018

......लेकिन रंगों के खेल में खुद बेरंग मत हो जाना ..... इतना कि तुम खुद को भी पहचान ना सको !!



ये निष्ठाएं भी अजब का पागलपन हैं !! डिस्क्लेमर जैसा कुछ सबके दरवाजे पर टंगा है....... फैशन के इस दौर में गारंटी की उम्मीद ना रखें !

हम फिर भी कितना कुछ चाहने लगते हैं और मानने लगते हैं जैसे हर चाहा और माना हुआ हो ही जाना हो ,जैसे वो आपका अधिकार हो  | 

अपनी मूर्खताओं और अपनी समझ पर वक्त कितनी आसानी से पानी फेर जाता है | रिश्ते कितने भी अजीज हों ,कितने भी जतन से सम्भाले गये हों , एक रोज " मोनोटोनस" हो ही जाते हैं | 

नयापन बाज़ार में बिकता हो तो बताओ ,खरीद लायें ? एक के साथ एक फ्री इन्द्रधनुष खरीद लें , जब तुम इस रंग से बोर हो जाओ तो तुम्हें दूसरा रंग थमा दूं ?

नये लोग जीवन में नई सम्भावनाएं जगाते हैं और पुराने धीरे धीरे दरवाजे की ओर धकेले जाते हैं | एक सहज प्रक्रिया की तरह इसकी व्याख्या और इसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण सुनकर लगता है जैसे आप किसी बाज़ार में खड़े हैं और सामने वाला आपको मार्केटिंग की टिप्स दे रहा है | 

ये सब देखते देखते और जीते जीते एक रोज़ मन जाने कहाँ उठ के चल देता है !! 

रिश्तों के बाज़ार में भ्रम के सौदे हैं | सौदा पट जाना चाहिए फिर बाकि सब गौण हो जाता है | रिश्तों पर एक चादर निष्ठाओं की भी होती है , ढकी रहती है तो अपने लगते हैं | भीतर सब खोखले हैं और एक लम्हे में तार -तार हो जाने हैं | 

कोई भी आवाज़ उस सफर की कहानी बयाँ नहीं कर सकती जो किसी त्रासदी से उपजी हो , वैसे ही जैसे वो चुप्पी जो किसी संवाद में "और " पर आकर अटक गयी हो | 

समन्दर किनारे की रेत है मन !! कितनी ही लहरें आयें -जाएँ ये रीता का रीता रह जाता है !! खारे -नमक को पीता, रेत हो जाने की नियति को स्वीकार कर चुका हो जैसे  | 

किसी "इंटरेस्टिंग" सी स्टोरी का प्लाट सजाते -सजाते मन कितनी ऊब से भर गया है | अब तुम जाओ और इन्द्रधनुष उतार के लाओ ताकि किसी के जूडे में उसे सजा सको ,उसके संग दिल बहला सको | 

मैं यहीं हूँ ! देखूंगी अपने आसमान पर नये रंगों को सजते, तुमको मुस्कुराते और इठलाते !! 

जाओ - तितलियाँ और फूल सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं ....... !!

किसी बाग़ या माली से निष्ठा मत रखना , बाग़ उजाड़ हो जाते हैं , माली मर जाते हैं लेकिन फूल और तितलियाँ कहीं नहीं जातीं ....... हर बार नई मिलेंगी ,नये रंगों और नयी गंध के साथ !

लेकिन रंगों के खेल में खुद बेरंग मत हो जाना ..... इतना कि तुम खुद को भी पहचान ना सको !!


Monday, 24 September 2018

हम सिर्फ साँसों के नुमाइंदे हैं , क़ानून की किताब नहीं !

कई सवाल और उनके कई जवाबों के बीच में फंसी कलम हैरां है कि कौनसा सवाल पहले लिया जाये और कौनसा जवाब उस सवाल का सही जवाब हो सकता है |

अरे !! ऐसा नहीं होता !! एक सवाल का जवाब एक ही हो सकता है |
क्यों ? जब सवाल किसी एक जवाब का परिणाम नहीं है तो जवाब भी कई होंगें ही ना !!!
नहीं , अगर तुमने ऐसा किया तो इसका अर्थ है तुम जवाब को गढ़ रही हो | जानती हो सच को गढ़ नहीं सकते |
यानि सवाल गढ़ सकते हैं लेकिन जवाब नहीं गढ़ सकते ?
सवाल कौन गढ़ता है ? वो तो उपजते हैं |
और जवाब ? जवाब भी तो उपजते हैं , अलग अलग किस्म के ,मौसम के हिसाब से !!
ये कुतर्क है |
तो तार्किक सवाल होते हैं और जवाब सब कुतर्क ?
नहीं ऐसा नहीं है | बात ये है कि मैं अगर कुछ सवाल कर रहा हूँ तो कुछ जानते हुए ही कर रहा हूँ ना और अगर जानते हुए कोई सवाल किया है तो उसे गढ़ना नहीं कहेंगे |
यानि तुम जवाब जानते हो फिर भी सवाल कर रहे हो ?

हाँ , ऐसा ही समझ लो |
ऐसा क्यों ? जब जानते हो तो जो जानते हो उसे ही मेरा जवाब मान लो और बात खत्म करो |

नहीं ये तो मेरी और से जबरदस्ती हो जाएगी | मैं तुम पर जवाब थोपना नहीं चाहता , बस जानना चाहता हूं !!
पर तुम जानते हुए भी क्या जानना चाहते हो ?
यही कि क्या मैं सही जानता हूँ ?
नहीं तुम कुछ नहीं जानते और जो जानते हो वो सही नहीं है |
देखो अब तुम जवाब को घुमा रही हो !!
अच्छा तो सीधा जवाब ये है कि तुम्हारा सवाल मेरे से जवाब लेने का अधिकारी नहीं है |

क्यों ? ये मेरा अधिकार है कि तुमसे सवाल करूँ ?
हो सकता है तुम्हारा अधिकार हो पर मेरा अधिकार है कि चाहूँ तो जवाब दूँ और ना चाहूं तो ना दूँ |
ये अनैतिक है , सीमा का उल्लंघन है |
तो जो नैतिकता तुम्हें सवाल करने का हक दे रही है वो मेरे जवाब नहीं देने को अनैतिक घोषित कर रही है ?

बहस से कोई फायदा नहीं !! साफ़ है कि तुम्हारे पास जवाब इसलिए नहीं है कि तुम दोषी हो
मेरा दोष ?

दोष यही है कि तुम सवालों से मुक्त होकर भाग जाना चाहती थीं लेकिन ऐसा कर नहीं सकीं !!

यानि तुम विजेता हो ? सवालों के घेरे में मुझे कैद करके रखना चाहते हो ?

दुनिया बड़ी खराब है , बाहर निकलना भी मत !!

सच कहा तुमने , दुनिया वाकई खराब है ! यहाँ तुम हो , सवाल हैं और जवाबों का ऐसा सन्नाटा है जिसे हजार चीख भी नहीं तोड़ सकती !!

लेकिन सुनो !!

कहो ?

मेरे पास एक विकल्प है |

वो क्या  है ?

अब मैं तुमको कोई जवाब नहीं दूंगी ,तुम्हारे किसी सवाल का कोई जवाब नहीं दूंगी !! अब मैं तुमको सवालों का पर्चा दूंगी और हर पर्चे में उतने ही सवाल होंगे जितने तुम्हारे जवाब जानने के अधिकार हैं |

मैं जवाब नहीं दूंगा !!

मत देना लेकिन अब से यही जवाब मेरा भी मान लेना और सवालों के नकाब ओढ़ जवाब की जिद मत करना ! सच ये है कि ना तुम जवाब जानते हो ना मैं , ना तुम सवाल कर सकते हो ना मैं | हम सिर्फ साँसों के नुमाइंदे हैं , क़ानून की किताब नहीं !

पल पल को जी लो , लहर लहर भीग लो....... और कहानी कुछ आगे है भी नहीं और थी भी नहीं  !!









Tuesday, 13 February 2018

मुन्ना ,बेबी ,जानू ,जाना सबका मालिक वैलेंटाईन है इसीलिए ......... !!!

फरवरी का महीना है ,प्रेम की बासंती हवा चल रही है।  कुछ ठिठुर रहे हैं , कुछ सिहर रहे हैं और कुछ रजाई को कसे जा रहे हैं ,कहीं उनको छूत न लग जाए |

 हम सब विरोधाभासों में जीते हैं ! सबको प्रेम चाहिए , सब प्रेम में हैं लेकिन प्रेम पर सबकी की भौहें तन जाती हैं | अगर प्यार सिर्फ जीवन जीने का तरीका होता तो ये दिक्कत नहीं होती ,दिक्कत इसलिए है क्यूंकि ये आपको नफरत सिखा रहा है , छलने और ठगने के तरीके सिखा रहा है | अब आप प्रेम के व्यापारीकरण के दौर में हैं इसलिए आपको किसी से अपना प्रेम साझा करने के लिए एक हफ्ते की निर्धारित प्रक्रियाओं को पूरा करना है | 

चुराई हुई शायरी , उधार के गिफ्ट और जतन से की गयी लीपापोती के बाद जब आप प्रेमी आमने-सामने होते हैं तो किसी रंगमंच के कलाकार अधिक होते हैं ,प्रेमी नहीं ! स्क्रिप्ट लिख के भी कोई प्रेम कर सकता है क्या ? करते हैं , बहुत हैं जो बतायेंगे कि आपसे बेहतर इंसान उसके जीवन में कभी नहीं आया ..... सच ये होता है कि कहने वाले को ना पहला याद है ना आप अंतिम हो | 

डिजिटल दौर के प्रेम में जब तक दिल वाली इमोजी और टैडी के साथ किस्सियों का आदान प्रदान ना हो तो लानतों का दौर चालू हो जाता है | मुन्ना ,बेबी ,जानू ,जाना सबका मालिक वैलेंटाईन है इसीलिए इस दिन को हमारा संस्कारी देश कूड़ा नजर से दखता है | बाबा वैलेंटाईन ने भगवा कपड़े पहन लिए होते तो देश की 80% समस्या का समाधान हो जाता | 

दिल्ली के अंकित को प्रेम की दर्दनाक सजा मिली , ये सजा उसको मिलनी ही थी ..... जन्म लिया था उसने इस दानव समाज में ! एक मां के सामने उसके बेटे को कोई ऐसी सजा दी है कि मन डरता है कि उस मां की कोख से निकली बद्दुआ पूरे समाज को ही कहीं नामर्द ना बना दे ! प्रेम करने वाले से नफरत कैसे कर सकते हो तुम भाई लोग ?

जब आप प्रेम में होते हो दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह पर , सबसे जादुई पलों को जी रहे होते हो ! हर मुश्किल से पार कर पाने का ,उसका सामना करने की हिम्मत जुटा पाते हो , हर किसी को खुशगवार नजरों से देखते हुए दुनिया बनाने वाले का शुक्रिया अदा करते हो ! 
क्या हम हमेशा ऐसे ही नहीं रह सकते ? क्यूँ हम इतने विध्वंसक हो जाते हैं ,क्यूँ प्रतिशोध हमारे प्रेम पर भारी पड़ जाता है ? 

क्या आप अपनी मर्जी से किसी जात विशेष में पैदा हुए हैं ? क्या प्रेम जाति देख कर किया जा सकता है ? जाति देखकर केवल सत्ता के चक्रव्यूह रचे जा सकते हैं ! लग्न कुंडली तक में राहू केतु वही होंगे जो आपके या किसी और के हैं !! आप आज मुस्लिम हैं कल हिन्दू कोख मिल गयी तो क्या कीजिएगा , आज हिन्दू हैं कल ईसाई हो गये तो ?

ये प्रेम का मौसम है , छोटा सा जीवन है ! जिसके साथ खुश हैं और ईमानदार हैं ,उसी को जीवनसाथी बना लीजिये ! सम्मान कीजिये प्यार का ताकि कभी ये ना कहना पड़े कि मेरे नसीब में सिर्फ धोखा है , नफरत है और असफलताएं हैं ! प्यार करने वालों को प्यार से देखिये , प्यार का व्यापार करने वालों पर सख्त नजर भी रखिये !

प्यार को सलाम और आप सबको ढेर सारा प्यार !  बाबा वैलेंटाईन आप सबके जीवन को प्यार -मोहब्बत से तर रखें ! चलते हैं ,अपना ख्याल रखियेगा मौसम बदल रहा है !!