Sunday, 24 February 2019

ये माटी ,पहाड़ ,नदियां ,जंगल ,खेत....... एक यायावर है मुझमें जो कभी टिकने नहीं देता !


वक़्त कहाँ रुकता है किसी के लिए और अगर रुक भी जाये तो कौन ठहरता है उस वक़्त के लिए ?
कभी वक़्त को हमारे लिए फुरसत नहीं और कभी हमें वक़्त का इंतज़ार करना नहीं आता....... हम सब ठेले जाते हैं ,कभी इसके मन से तो कभी उसके मन से !!

एक रोज़ जंगल की पगडंडी पर पत्तों की चरमर सुनते हुए मैंने जाना कि खुद के लिए वक़्त निकालना कितना जरूरी है | पहाड़ों से उड़ कर आते बादल और सीली हुई हवा ने कान में कहा कि अब आयी हो तो लौटना मत...... मैं अब उसी की सुनती हूँ | जब तक उसकी नहीं सुनी थी , उलझन में थी कि किसकी सुनूं ?

ये माटी ,पहाड़ ,नदियां ,जंगल ,खेत....... एक यायावर है मुझमें जो कभी टिकने नहीं देता ! वक़्त ने जीना सिखा दिया ,चलते रहना सिखा दिया , इंतज़ार करना सीखा दिया |

घुम्मकड़ी को जिंदगी का हिस्सा बना लीजिये , समझ जाएंगे कि जीने लिए दुनिया भर के तामझाम नहीं चाहिए | मौत भी आने से पहले आपके इंतज़ामात का जायजा लेने नहीं आएगी | कितना भी आराम जुटा लें , रिश्तों का कितना भी जमावड़ा हो आसपास...... आपको सुकून तो पल दो पल आँख बंद करके अकेले हो जाने में ही मिलेगा |

जब आनंद भीतर है तो बाहर किसे ढूंढना और किसके लिए महल -असबाब इकट्ठे करने हैं ?

भीतर के बच्चे को ज़िंदा रखिये और उसके बचपन को महसूस कीजिए | वक़्त को कैलेंडर का और कैलेंडर को जिंदगीनामा बना लेंगे तो जियेंगे कब ? लोग शिकाययत करते हैं ,उसके लिए इतना किया पर उसने ऐसा किया -वैसा किया...... ये सच है ,हम नाशुक्रे लोग हैं ! जिसने किया, वो उसका फर्ज था सोच कर आगे बढ़ जाते हैं ,ये सोच कर कि ना भी करता तो कौन सा उसको कहा था करने के लिए...... व्यथा की कथा यहीं से शुरू हो जाती है |

क्यों किया ?

इसीलिये कहती हूँ , कीजिये पर खुद को बचा ले जाईये इस कपोल कल्पित बोझ से | सब के कर्मों का भार अपने कंधों पर कैसे रखा जा सकता है |

वक़्त पर भरोसा करना और वक़्त से शिकायतें करना जरूरी नहीं है और लाज़मी भी नहीं ! अवसाद और खुशी का हर मौका पेड़ -पहाड़ -नदी -हवा...... के साथ साझा कीजिये और वक़्त की धुन को गुनगुनाइए ,यही जीवन संगीत है ,यही वक़्त है जीने का.......

जीते रहिये -चलते रहिये !!

Sunday, 20 January 2019

मैं चाँद पर हूँ , हूँ तो हूँ !! कम से कम सुबह होने तक तो हूँ ना .......

एक रोज़ आसमां पर टहलते हुए चाँद के करीब पहुँच गयी........ गुजरते हुए आंचल में सितारे अटक गये थे ,अटके रहने दिए !! कुछ उठा के जूड़े में भी अटका लिए...... !! चाँद मुझे देखते ही खिल गया , कहा आओ..... कब से इंतज़ार था तुम्हारा !!

मैं हंस पड़ी ,ये सोच कर कि ये भी निरा झूठा है ,मेरा इंतज़ार इसे क्यों था भला ? सारी दुनिया इसकी तरफ देख के आहें भर रही है , जाने कितने ख्वाब ,जाने कितनी ख्वाहिशें इसके इर्द गिर्द घूमती हैं........मेरा इंतज़ार ?

उसको अनसुना कर दिया मैंने ! मैं बस उसको छूना चाहती थी ,ये देखना चाहती थी कि वो वास्तव में उन कल्पनाओं के जैसा है भी या नहीं जिसके लिए दुनिया छोड़ने की जिद की ??

अजीब होती हैं ना ख्वाहिशें भी ! रात सितारे हथेली पर धर जाती है और दिन माथे पर सूरज रखकर चला जाता है | हम कहाँ होते हैं इन सब के बीच ? कोई भी कहाँ है ? सबके पास अपनी अपनी दुनिया है , कहने भर को सब इसी दुनिया में हैं !!

हर कोई अपने आप में एक टापू है , उस तक पहुंच भी जाओ तो सब से कट जाना होता है और वहां से निकलो तो उसको छोड़ देना होता है | कोई विकल्प नहीं कि सब संग हो , सब साथ हों....... बस एक ही सुकून है , ख्वाब !!

मैं चाँद पर हूँ , तो हूँ !! कम से कम सुबह होने तक तो हूँ ना .......उससे हजार सवाल करूंगी , उसकी नजर से दुनिया भी देखूंगी !

मैंने कहा , मुझे ले चलो अपने साथ .......वहां बादलों से पार !! दुनिया देखनी है मुझे ?

वहीं से तो आयी हो ? वो हैरान था !

हाँ , पर वहां से कुछ समझ नहीं आयी , अजीब था सब !! भीड़ लगती थी पर सब अकेले ही मिले ......!

तो , तुमको क्या लगता है यहाँ से सब एक साथ दिखेंगे ?

हाँ ,दिखेंगे ! दूर से सब के करीब होना धोखा होता है ना !! फिर तुम भी तो उनके लिए वैसे ही मरीचिका हो.. तुम्हारी कसमें खाते हैं , तुमको देख कर कितने व्रत उपवास होते हैं , किसी के बचपन का सहारा और किसी की जवानी का .......पर तुम भी तो कहाँ हो ?

हूँ तो !! देखो छू कर देखो मुझे ....... मुझमें भी धडकन है , मुझमें भी बचपन है और जीवन का हर रंग है !! चलो ले चलता हूँ तुमको वहां जहाँ से तुम अपनी इच्छा पूरी कर सको !!

हम बादलों के पार चल पड़े ! चांदनी की दरिया पार कर कोई जगह थी , उसने कहा मेरी बाहं कस कर थामना और फिर नीचे देखना !!

मैं हैरान थी ,हथेलियाँ उसकी बाहं को और कस रही थीं ......मेरी दुनिया तो बिलकुल अलग है , एक दम बूँद बराबर , लोग भी कहीं नहीं , बस रोशनी ही रोशनी तो कहीं समन्दर कहीं पहाड़.......!! ये वैसी नहीं है, जैसी मैं सोचती थी !!

तुम डर रही हो ? चाँद ने पूछा !!

हां !! ये कैसे हो गया ? जो उम्र भर जिया वो झूठ कैसे और ये सच कैसा है ?

वो हंस दिया , कहने लगा "सुनो , मैं भी तो मिट्टी हूँ ! ना चांदनी मेरी है ना मर्जी से मेरी सूरत तुमको दिखा पाता हूँ...... असमान में टंगा हूँ ,ना जमीन मेरी है न आसमान मेरा है पर मुझे तुमसे प्यार है........इसलिए कि तुम मेरी दुनिया हो और मुझसे मिलने यहाँ तक चली आईं........अब जाओ ,लौट जाओ ! देखती रहना मुझे ,हर रात तुमको नई नज्म सुनाऊंगा ,तुम्हारे लिए कुछ कहानियां और गीत भी लाऊंगा......

और सुनो , दुनिया वही है जिसमें तुम खुश रह सको और खुशी का कारवां भीतर से बहता है !! उसे महसूस करना और खुश रहना...... मुस्कुराना कि चाँद भी तुम्हारा है और दुनिया भी !!

नींद तब तक खुल गयी थी ,सूरज माथे पर चढ़ आया था पर एक चाँद भी कहीं दूर क्षितिज पर था , जो देख कर मुस्कुरा रहा था कि मैं सलामत से अपनी दुनिया में लौट आयी हूँ उसके प्यार को हजार सितारों के साथ जीत के आयी हूँ ...........

Thursday, 20 December 2018

......लेकिन रंगों के खेल में खुद बेरंग मत हो जाना ..... इतना कि तुम खुद को भी पहचान ना सको !!



ये निष्ठाएं भी अजब का पागलपन हैं !! डिस्क्लेमर जैसा कुछ सबके दरवाजे पर टंगा है....... फैशन के इस दौर में गारंटी की उम्मीद ना रखें !

हम फिर भी कितना कुछ चाहने लगते हैं और मानने लगते हैं जैसे हर चाहा और माना हुआ हो ही जाना हो ,जैसे वो आपका अधिकार हो  | 

अपनी मूर्खताओं और अपनी समझ पर वक्त कितनी आसानी से पानी फेर जाता है | रिश्ते कितने भी अजीज हों ,कितने भी जतन से सम्भाले गये हों , एक रोज " मोनोटोनस" हो ही जाते हैं | 

नयापन बाज़ार में बिकता हो तो बताओ ,खरीद लायें ? एक के साथ एक फ्री इन्द्रधनुष खरीद लें , जब तुम इस रंग से बोर हो जाओ तो तुम्हें दूसरा रंग थमा दूं ?

नये लोग जीवन में नई सम्भावनाएं जगाते हैं और पुराने धीरे धीरे दरवाजे की ओर धकेले जाते हैं | एक सहज प्रक्रिया की तरह इसकी व्याख्या और इसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण सुनकर लगता है जैसे आप किसी बाज़ार में खड़े हैं और सामने वाला आपको मार्केटिंग की टिप्स दे रहा है | 

ये सब देखते देखते और जीते जीते एक रोज़ मन जाने कहाँ उठ के चल देता है !! 

रिश्तों के बाज़ार में भ्रम के सौदे हैं | सौदा पट जाना चाहिए फिर बाकि सब गौण हो जाता है | रिश्तों पर एक चादर निष्ठाओं की भी होती है , ढकी रहती है तो अपने लगते हैं | भीतर सब खोखले हैं और एक लम्हे में तार -तार हो जाने हैं | 

कोई भी आवाज़ उस सफर की कहानी बयाँ नहीं कर सकती जो किसी त्रासदी से उपजी हो , वैसे ही जैसे वो चुप्पी जो किसी संवाद में "और " पर आकर अटक गयी हो | 

समन्दर किनारे की रेत है मन !! कितनी ही लहरें आयें -जाएँ ये रीता का रीता रह जाता है !! खारे -नमक को पीता, रेत हो जाने की नियति को स्वीकार कर चुका हो जैसे  | 

किसी "इंटरेस्टिंग" सी स्टोरी का प्लाट सजाते -सजाते मन कितनी ऊब से भर गया है | अब तुम जाओ और इन्द्रधनुष उतार के लाओ ताकि किसी के जूडे में उसे सजा सको ,उसके संग दिल बहला सको | 

मैं यहीं हूँ ! देखूंगी अपने आसमान पर नये रंगों को सजते, तुमको मुस्कुराते और इठलाते !! 

जाओ - तितलियाँ और फूल सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं ....... !!

किसी बाग़ या माली से निष्ठा मत रखना , बाग़ उजाड़ हो जाते हैं , माली मर जाते हैं लेकिन फूल और तितलियाँ कहीं नहीं जातीं ....... हर बार नई मिलेंगी ,नये रंगों और नयी गंध के साथ !

लेकिन रंगों के खेल में खुद बेरंग मत हो जाना ..... इतना कि तुम खुद को भी पहचान ना सको !!


Monday, 24 September 2018

हम सिर्फ साँसों के नुमाइंदे हैं , क़ानून की किताब नहीं !

कई सवाल और उनके कई जवाबों के बीच में फंसी कलम हैरां है कि कौनसा सवाल पहले लिया जाये और कौनसा जवाब उस सवाल का सही जवाब हो सकता है |

अरे !! ऐसा नहीं होता !! एक सवाल का जवाब एक ही हो सकता है |
क्यों ? जब सवाल किसी एक जवाब का परिणाम नहीं है तो जवाब भी कई होंगें ही ना !!!
नहीं , अगर तुमने ऐसा किया तो इसका अर्थ है तुम जवाब को गढ़ रही हो | जानती हो सच को गढ़ नहीं सकते |
यानि सवाल गढ़ सकते हैं लेकिन जवाब नहीं गढ़ सकते ?
सवाल कौन गढ़ता है ? वो तो उपजते हैं |
और जवाब ? जवाब भी तो उपजते हैं , अलग अलग किस्म के ,मौसम के हिसाब से !!
ये कुतर्क है |
तो तार्किक सवाल होते हैं और जवाब सब कुतर्क ?
नहीं ऐसा नहीं है | बात ये है कि मैं अगर कुछ सवाल कर रहा हूँ तो कुछ जानते हुए ही कर रहा हूँ ना और अगर जानते हुए कोई सवाल किया है तो उसे गढ़ना नहीं कहेंगे |
यानि तुम जवाब जानते हो फिर भी सवाल कर रहे हो ?

हाँ , ऐसा ही समझ लो |
ऐसा क्यों ? जब जानते हो तो जो जानते हो उसे ही मेरा जवाब मान लो और बात खत्म करो |

नहीं ये तो मेरी और से जबरदस्ती हो जाएगी | मैं तुम पर जवाब थोपना नहीं चाहता , बस जानना चाहता हूं !!
पर तुम जानते हुए भी क्या जानना चाहते हो ?
यही कि क्या मैं सही जानता हूँ ?
नहीं तुम कुछ नहीं जानते और जो जानते हो वो सही नहीं है |
देखो अब तुम जवाब को घुमा रही हो !!
अच्छा तो सीधा जवाब ये है कि तुम्हारा सवाल मेरे से जवाब लेने का अधिकारी नहीं है |

क्यों ? ये मेरा अधिकार है कि तुमसे सवाल करूँ ?
हो सकता है तुम्हारा अधिकार हो पर मेरा अधिकार है कि चाहूँ तो जवाब दूँ और ना चाहूं तो ना दूँ |
ये अनैतिक है , सीमा का उल्लंघन है |
तो जो नैतिकता तुम्हें सवाल करने का हक दे रही है वो मेरे जवाब नहीं देने को अनैतिक घोषित कर रही है ?

बहस से कोई फायदा नहीं !! साफ़ है कि तुम्हारे पास जवाब इसलिए नहीं है कि तुम दोषी हो
मेरा दोष ?

दोष यही है कि तुम सवालों से मुक्त होकर भाग जाना चाहती थीं लेकिन ऐसा कर नहीं सकीं !!

यानि तुम विजेता हो ? सवालों के घेरे में मुझे कैद करके रखना चाहते हो ?

दुनिया बड़ी खराब है , बाहर निकलना भी मत !!

सच कहा तुमने , दुनिया वाकई खराब है ! यहाँ तुम हो , सवाल हैं और जवाबों का ऐसा सन्नाटा है जिसे हजार चीख भी नहीं तोड़ सकती !!

लेकिन सुनो !!

कहो ?

मेरे पास एक विकल्प है |

वो क्या  है ?

अब मैं तुमको कोई जवाब नहीं दूंगी ,तुम्हारे किसी सवाल का कोई जवाब नहीं दूंगी !! अब मैं तुमको सवालों का पर्चा दूंगी और हर पर्चे में उतने ही सवाल होंगे जितने तुम्हारे जवाब जानने के अधिकार हैं |

मैं जवाब नहीं दूंगा !!

मत देना लेकिन अब से यही जवाब मेरा भी मान लेना और सवालों के नकाब ओढ़ जवाब की जिद मत करना ! सच ये है कि ना तुम जवाब जानते हो ना मैं , ना तुम सवाल कर सकते हो ना मैं | हम सिर्फ साँसों के नुमाइंदे हैं , क़ानून की किताब नहीं !

पल पल को जी लो , लहर लहर भीग लो....... और कहानी कुछ आगे है भी नहीं और थी भी नहीं  !!









Tuesday, 13 February 2018

मुन्ना ,बेबी ,जानू ,जाना सबका मालिक वैलेंटाईन है इसीलिए ......... !!!

फरवरी का महीना है ,प्रेम की बासंती हवा चल रही है।  कुछ ठिठुर रहे हैं , कुछ सिहर रहे हैं और कुछ रजाई को कसे जा रहे हैं ,कहीं उनको छूत न लग जाए |

 हम सब विरोधाभासों में जीते हैं ! सबको प्रेम चाहिए , सब प्रेम में हैं लेकिन प्रेम पर सबकी की भौहें तन जाती हैं | अगर प्यार सिर्फ जीवन जीने का तरीका होता तो ये दिक्कत नहीं होती ,दिक्कत इसलिए है क्यूंकि ये आपको नफरत सिखा रहा है , छलने और ठगने के तरीके सिखा रहा है | अब आप प्रेम के व्यापारीकरण के दौर में हैं इसलिए आपको किसी से अपना प्रेम साझा करने के लिए एक हफ्ते की निर्धारित प्रक्रियाओं को पूरा करना है | 

चुराई हुई शायरी , उधार के गिफ्ट और जतन से की गयी लीपापोती के बाद जब आप प्रेमी आमने-सामने होते हैं तो किसी रंगमंच के कलाकार अधिक होते हैं ,प्रेमी नहीं ! स्क्रिप्ट लिख के भी कोई प्रेम कर सकता है क्या ? करते हैं , बहुत हैं जो बतायेंगे कि आपसे बेहतर इंसान उसके जीवन में कभी नहीं आया ..... सच ये होता है कि कहने वाले को ना पहला याद है ना आप अंतिम हो | 

डिजिटल दौर के प्रेम में जब तक दिल वाली इमोजी और टैडी के साथ किस्सियों का आदान प्रदान ना हो तो लानतों का दौर चालू हो जाता है | मुन्ना ,बेबी ,जानू ,जाना सबका मालिक वैलेंटाईन है इसीलिए इस दिन को हमारा संस्कारी देश कूड़ा नजर से दखता है | बाबा वैलेंटाईन ने भगवा कपड़े पहन लिए होते तो देश की 80% समस्या का समाधान हो जाता | 

दिल्ली के अंकित को प्रेम की दर्दनाक सजा मिली , ये सजा उसको मिलनी ही थी ..... जन्म लिया था उसने इस दानव समाज में ! एक मां के सामने उसके बेटे को कोई ऐसी सजा दी है कि मन डरता है कि उस मां की कोख से निकली बद्दुआ पूरे समाज को ही कहीं नामर्द ना बना दे ! प्रेम करने वाले से नफरत कैसे कर सकते हो तुम भाई लोग ?

जब आप प्रेम में होते हो दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह पर , सबसे जादुई पलों को जी रहे होते हो ! हर मुश्किल से पार कर पाने का ,उसका सामना करने की हिम्मत जुटा पाते हो , हर किसी को खुशगवार नजरों से देखते हुए दुनिया बनाने वाले का शुक्रिया अदा करते हो ! 
क्या हम हमेशा ऐसे ही नहीं रह सकते ? क्यूँ हम इतने विध्वंसक हो जाते हैं ,क्यूँ प्रतिशोध हमारे प्रेम पर भारी पड़ जाता है ? 

क्या आप अपनी मर्जी से किसी जात विशेष में पैदा हुए हैं ? क्या प्रेम जाति देख कर किया जा सकता है ? जाति देखकर केवल सत्ता के चक्रव्यूह रचे जा सकते हैं ! लग्न कुंडली तक में राहू केतु वही होंगे जो आपके या किसी और के हैं !! आप आज मुस्लिम हैं कल हिन्दू कोख मिल गयी तो क्या कीजिएगा , आज हिन्दू हैं कल ईसाई हो गये तो ?

ये प्रेम का मौसम है , छोटा सा जीवन है ! जिसके साथ खुश हैं और ईमानदार हैं ,उसी को जीवनसाथी बना लीजिये ! सम्मान कीजिये प्यार का ताकि कभी ये ना कहना पड़े कि मेरे नसीब में सिर्फ धोखा है , नफरत है और असफलताएं हैं ! प्यार करने वालों को प्यार से देखिये , प्यार का व्यापार करने वालों पर सख्त नजर भी रखिये !

प्यार को सलाम और आप सबको ढेर सारा प्यार !  बाबा वैलेंटाईन आप सबके जीवन को प्यार -मोहब्बत से तर रखें ! चलते हैं ,अपना ख्याल रखियेगा मौसम बदल रहा है !!

Saturday, 25 November 2017

........तो AAP पांच साल की हो गयी ! बधाई !

........तो AAP पांच साल की हो गयी ! एक ऐसा बच्चा जिसका जन्म ही लाठियों ,डंडों ,तिहाड़ के साये में , ठंड में ठिठुरती रातों में सड़क किनारे पड़े जनमानस के बीच हुआ ! उस बच्चे को सरकते ,चलते और फिर दौड़ते देखना कितना सुखद है ये वो हर व्यक्ति समझ सकता है जिसके मन में माँ -पापा , दादा दादी का साथ बसा हो ! आंदोलन से राजनैतिक दल का रूप लेते हुए सब का मन आशंकित था कि क्या सत्ता के बाहुबली इस बच्चे को जीने भी देंगे ! असमय मरते हुए कई आन्दोलनों ,कई दलों ,कई क्रांतिकारी विचारधाराओं को देखा है | AAP अपवाद के रूप में उभरी और तमाम विषमताओं , षड्यंत्रों ,कुचक्रों से झूझते हुए एक मजबूत राजनैतिक दल के रूप में उभरी है |
अरविन्द के नेतृत्व ने इसे दिशा दी है तो मनीष ने इसको अंजाम तक ले जाने की भूमिका बखूबी निभाई है | कुमार विश्वास ,संजय ,आशुतोष ,दिलीप पांडे ,प्रीती मेनन ,गोपाल राय , प्रशांत भूषण और भी ना जाने कितने ही लोगों ने इस बच्चे को चलना सिखाया ,इसके कदमों को मजबूती दी |
हजारों कार्यकर्ता जिनके पास सम्भवतः पार्टी की प्राथमिक सदस्यता भी नहीं है को मैंने  इस दल के साथ ऐसे जुड़े देखा है मानो वो इनका अपना परिवार हो !
कितनों ने अपना करियर छोड़ा ,घरबार छोड़ा , अपना शहर तक छोड़ दिया और सिर्फ जिद और जुनून में AAP के हमराह हो गए ! कभी कभी लोग पूछते हैं ,ऐसा क्या है इस अरविन्द केजरीवाल में जो लोग इसकी तुलना मोदी से करते हैं और तमाम मीडिया को भी सिर्फ दिल्ली ही दिखाई देती है ?

मेरा जवाब होता है , फकीर है वो ! जिसके पास कुछ नहीं होता उसके पास रब होता है | रब साथ ना होता तो आज और की तरह AAP को भी राजनीति निगल जाती | ईमानदार इरादे और  नेक राह  थाम कर चलने वाले ही जो कहते हैं कर दिखाते हैं |

हजार कमियों और असफलताओं के बावजूद AAP ने शिक्षा और स्वास्थ्य में जो काम किये हैं वो विपक्ष भी नजरंदाज नहीं कर सकता | बेशक परिवार के भीतर मतभेद हैं लेकिन अगर वो मतभेद भी उसे सकारात्मक दिशा दे रहे हैं तो उनका भी स्वागत करना चाहिए |

14 फरवरी को जब अरविन्द शपथ ले रहे थे ,मेरे साथ कोमल और पूजा थीं ! हम सब आंसुओं से तर थे ,हमारे पीछे लाखों की भीड़ थी जिनकी आँखों में हजार सपने और AAP के लिए दुलार था !

अंकिता ,केशव , आरती......सबसे पहली बार मिली थी लेकिन ऐसा लग रहा था मानो परिवार इकट्ठा हुआ है ! अंकित ,डॉन ,गजेंद्र ,दुर्गेश , राशु , शाश्वत ,राकेश ,नवेन्दु ,पवन,प्रियंका , ......पटेल नगर की ढेर सारी स्मृतियां मानस पर अंकित हैं | ढेर सारी तस्वीरें हैं जो इस सफर की साथ की याद दिलाती रहती हैं ! झाड़ू के साथ इस अनोखी यात्रा में शामिल होना मेरे जीवन के बेहतरीन समय में से एक है |

AAP ने जनता के भरोसे को तोडना नहीं है , उसे देश के हर बंदे को भरोसा दिलाना है कि झाड़ू हाथ में है तो क्या गम है !
बढ़ते चलिए , काम करते चलिए ! गलतियों से सबक ले ,सबको साथ ले कर चले तो जय निश्चित है !

शुभकामनाएं AAP सभी को !

Monday, 2 October 2017

क्या सुशांत सिन्हा मोदी जी के हरकारे हैं या रवीश के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं ?



मेरे सामने दो ख़त हैं - एक रवीश का जो उन्होंने अपने प्रधानमंत्री को एक नागरिक की हैसियत से लिखा था और दूसरा सुशांत सिन्हा का जिन्होंने रवीश के प्रधानमंत्री को लिखे पत्र का जवाब दिया है |

क्या आप किसी के किसी को लिखे पत्र का जवाब दे सकते हैं ? मैं सवाल आपसे करूँ और जवाब देने कोई तीसरा आये तो उसे क्या मानूं ? ये भी सही है कि भारत के प्रधानमंत्री के पास इतना टाइम नहीं कि वो रवीश जैसे मामूली पत्रकार के मामूली से पत्र के जवाब के लिए समय निकाले ! ये मसला पत्र लिखने वाले और पत्र पाने के वाले के बीच का था !

खैर ! अगर आपने पत्र नहीं पढ़ा हो तो एक दो मसले बता देती हूँ |

रवीश ने लिखा कि उनको धर्म रक्षति रक्षित: नाम के उस व्हाट्स ग्रुप में जबरदस्ती जोड़ा जा रहा है जिसके कई एडमिन हैं और उनमें से कइयों को प्रधानमंत्री जी सहित कई अन्य माननीय फॉलो करते हैं |
इस ग्रुप द्वारा उनको मारने , खींचने , अश्लील हरकतें करने तक की अभद्र टिप्पणियां की हैं ! एक अन्य महिला पत्रकार को भी परेशान किया जा रहा है | रवीश ने इस वार्तालाप के कई स्क्रीन शॉट भी दिए हैं और उनके नाम भी बताये हैं !

इसी में वे आगे लिखते हैं कि उनको धमकी दी जा रही है कि वे नौकरी से निकाले जाएंगे ! इस पूरे पत्र में रवीश ने अन्य किसी मुद्दे का जिक्र तक नहीं किया है |

दूसरा खत जो मुझे नहीं पता कि सुशांत बाबू ने किस हैसियत से लिखा है , में लिखा है की --

पहला - आपने अपने स्वर्गीय पिता से अपने आत्मिक रिश्ते को सार्वजनिक करने की धृष्टता की !

दूसरा -आप बेवजह डर रहे हैं यानि जो धमकियां मिल रही हैं उनको रवीश को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए ! वे ऐसा कर रहे हैं तो इसलिए कि आप प्रसिद्धि चाहते हैं ! वे खुद को अहमियत ना दें उनके रहने या जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा !

तीसरा - नौकरी जाए तो जाए आपकी बीबी खूब कमाती हैं और अब तक जितना कमाया उससे आप सड़क पर नहीं आएंगे !

आपने फलां को देखकर शीशा बंद कर लिया , मेरे लिये मैनेजिंग एडिटर को चिट्ठी क्यों नहीं लिखी !

पत्र के आखिर में तथाकथित पत्रकार सुशांत जी बीमार रवीश के स्वस्थ्य होने की कामना कर रहे हैं !

मैं हैरान हूँ और विचलित भी और विश्वास से कह रही हूँ पत्र का जवाब देने वाला या उसका कोई अपना उसी धर्म रक्षति रक्षित: का सदस्य होगा जो रवीश , बरखा , राजदीप को मारो - खींचो -पटको के साथ सम्पूर्ण परम् अश्लीलता के उन्माद के नारे लगा रहा है !

आप जिस भी दल /विचारधारा का समर्थन करते हैं वो आपके व्यक्तित्व में झलकने लगती है और अंततः वह संस्था या तो आप जैसी हो जाती है या आप उसके जैसे हो जाते हैं !

यदि आप सोचते हैं कि असहमति का अंत गौरी लंकेश जैसा होना चाहिए या असहमति का बलात्कार करना चाहिए तो आप उस भी उस उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनने जा रहे हैं या बन बन चुके हैं जिसको जीवन के मूलभूत प्रश्नों से कोई सरोकार नहीं है | आप चुप रहें और जयजयकार करके चमत्कार का इंतज़ार जब तक करें जब कि कोई आपका अपना सवाल करने के जुर्म में अपनी नौकरी नहीं खो देता या चौराहे पर मारा नहीं जाता |

यदि आप ऐसा नहीं सोचते हैं और मानते हैं कि पत्रकार का काम आंकड़ों की बाजीगरी का सच सामने लाना है ताकि आपका पैसा आपके काम आये , ताकि आप ये जान सकें कि आपने जिनको चुना था वो क्या सही क्या गलत कर रहे हैं तो समझिये कि टीवी में परोसी जाने वाली भायँ - भायँ केवल मरीचिका है , बचना चाहते हैं और अपना तर्क बचाये रखना चाहते हैं तो टीवी देखना बंद कर दीजिये | धार्मिक उन्माद से बचिए और समझिये कि एक पूरी इंडस्ट्री है जो ये फरेब लिखती है ,आपको जोड़ती है और आंकड़ों के मायाजाल से भरमा के पेट्रोल की बढ़ती कीमतों , फिसलती नौकरियों के सवाल से दूर कर रही है |

बाकि तो आप जो चाहे जो सोचें , जो चाहे करें कौन रोक सकता है !

दोनों के पत्रों के लिंक आपको दे रही हूँ केवल ब्लॉग के संदर्भ के लिए !

रवीश का पत्र जो प्रधानमंत्री जी के लिए था -
https://www.facebook.com/RavishKaPage/posts/706573349540815


सुशांत सिन्हा का प्रत्युत्तर -
http://www.sushantsinha.news/%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE/