Thursday, 16 June 2016

शिकायतों में वक्त इतना जाया हो जाता है कि लौटते वक्त मलाल के सिवा जिस्म पर कुछ नहीं होता............

कभी कभी शिकायतों का सिम सिम  पिटारा खुल जाता है और वक्त के आहते में लम्हे इधर उधर बिखर जाते हैं। उसकी शिकायतें खुद से इस कदर हैं कि गाहे बगाहे छम्म से फ़ैल जाती हैं और उसको ही परेशान करती रहती हैं , मुश्किल ये है वो सुनता भी नहीं और सुनाये बिना रहता भी नहीं।


हम जिंदगी के कितने करीब से गुज़र जाते हैं और जिंदगी को छू भी नहीं पाते। शिकायतों में वक्त इतना जाया हो जाता है कि लौटते वक्त मलाल के सिवा जिस्म पर कुछ नहीं होता। ताउम्र खुद के लिए सहूलियतें जुटाने में इस कदर मसरूफ रहते हैं कि रूह जिस्म से कब फना हो गई होती है इसका पता ही नहीं चलता।

आक्रोश स्वभाविक होते हैं पर एक से जुर्म के लिए खुद को  पारितोषिक और दूसरे के लिए  सजा का आयोजन भी अजीब सच है। आक्रोश खुद को तर्क से परे और दूसरे को कटघरे में खड़ा कर देता है।  हम सब अपने  कंधों पर अपने सच का सलीब ले कर चलते हैं और सब के पास अपने सही होने की वजह है। वाजिब है या गैरवाजिब इसका फैसला जब हो सकता है जब वो एक दूसरे की जिंदगी के फैसलों से परे हो।  नैतिकता के धरातल पर सब नंगे हैं। सबके जिस्म से उह्ह्ह् आती है। लिबास को जिस्म समझने वाले और रवायतों को गिरवी रख रूह का मोलभाव करने वाले दिल के दलाल गली के हर मोड़ पर मिल जाते हैं।

मैं उसकी  शिकायतों से पार उससे  हार जाना चाहती हूँ। हर तर्क से परे उसको उस झील सा ठहरा और हजारों सितारों को अपने सीने पर लिए बेसाख्ता खिलखिलाते ,उड़ते देखना चाहती हूँ। ये वक्त का दरिया है जो हमारे बीच बह रहा है। क्या फर्क पड़ेगा ये दरिया मनो सूख भी जाए ............तो भी हर बरसात पानी अब यहीं से हो कर गुज़रेगा और जब भी गुज़रेगा हम फिर एक दूसरे के सामने होंगे।

कुछ रिश्ते  न काल के , न सवाल के  मोहताज़ होते  है। उनकी उम्र भी नहीं होती ,जिसकी होती है वो रिश्ते नहीं होते बस मुलाकात होती है । सो चुकना तो है ही है आज नहीं तो कल ये हिसाब बराबर होगा पर जितना होगा उतना  मेरा दावा वक्त पर मजबूत होता जाएगा।

वो उलझा हुआ है ये मैं जानती हूँ लेकिन ये भी सच है कि बिना सच को स्वीकार किये वो  एक कदम आगे नहीं बढ़ पाएगा। शिकायतों से परे संवाद की दुनिया है । इस दुनिया में जाओ और सुनो कि पीड़ा की हरेक की परिभाषा अलग अलग है। कुछ देर कंधे पर हाथ रखो और सुनो..........दर्द पिघल जाएगा और अहम की दीवार टूटेगी तो ये सूखी सी लगने वाली घास फिर से हरी होने लगेगी ! मौसम सब गुज़रते हैं ,ये भी गुजरेगा !

हर एक को उसका आईना  प्यारा ही बताएगा पर कभी उसके आईने से उसको भी देखो शायद आराम आ जाए .......वैसे भी तुम को अपने चेहरे पर ज्यादा ही गुमान है भले गुस्से में नाक पकौड़े सी हो जाए और गाल बंगाल की खाड़ी हो रहे हों .........    तो मुस्कुराओ उठो और शिकायतों को  परे रख आसमान  को अपने आलिंगन में समेट लो ! मौसम खुशगवार है !                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          

Monday, 13 June 2016

ये रिश्तों का बंटवारा है , ये रूह कहीं, जिस्म कहीं का रिश्ता है !

" एक अरसे के बाद उससे मुलकात हुई ! अरसा भी क्या कहूं एक दशक ही बीत गया होगा ........ वो जब लौटा था तो  उसकी नीली -भूरी सपनीली आँखों में हजार सपने और कंधे पर सच की सलीब थी। इस बार वो जब लौटा तो कंधे पर जिम्मेदारियां और आँखों में तलाश थी ,सवाल थे।

इंसान भी अजीब है , कुछ की तलाश में कुछ भी खो देता है और कुछ मिल जाता है तो फिर कुछ पाने की जद्दोजहद में लग जाता है। मैंने उसके साथ ,उसके सफर में एक बेनाम हमसफर का रिश्ता निभाया है  ..... उसके साथ रोना उसके साथ हंसना भी हुआ ,बस नहीं हुआ तो साथ नहीं हुआ।

ये रिश्तों का बंटवारा है , ये रूह कहीं, जिस्म कहीं का रिश्ता है ! दोनों अधूरे- अधूरी कहानी ,पूरी सी दिखने वाली पर खत्म नहीं होने वाली सी कहानी है मनो ..... ! परिवार और समाज से परे कुछ नहीं है पर कुछ है जो इन दोनों में ही नहीं ,वो बस वहीं है, जहाँ रूह बसती है।

जिंदगी बिना रिश्तों के नहीं चलती ,रिश्ते जरूरी भी नहीं। जरूरतों का धरातल बदलता रहता है। बस जो नहीं बदलता वो एक एहसास है कि "तुम हो ना "........    उसका हाँ कह देना और मेरा मान लेना !!

बस वही एक एहसास खींच लाया उसको ,वही एक खालीपन ,वही एक उदास कोना ,वही एक टीस ...... देस क्या परदेस क्या ! अब समंदर भी बूँद और कभी बूँद भी समंदर लगता है।

अच्छा सुनो ! बिटिया कितनी बड़ी हो गयी ?
18 पूरे होने वाले हैं , उसने कहा और मुस्कुरा दिया !
तुमने उसका नाम वही रखा ना जो हमने सोचा था ?
तुमको याद है ?
मैं हंस पडी.........
और तुमने भी तो ऐसा ही कुछ किया है ना ?
वो हंस पड़ा .......
हम्म !! ऐसे पागलपन भी भला भूलता है कोई !
नहीं ! वो पागलपन नहीं था ,वक्त था ! हम पर कहानी लिख रहा था और हम किरदार सिर्फ उसके कहे को निभा रहे थे !
थे नहीं हैं ! मैंने बात को विराम दे दिया।

विराम दे देने की कोशिशें नाकाम होती रहीं ! घंटों उँगलियों में उलझे वक्त के धागे सुलझाते रहे......... दोनों को पता था सुलझेगा कुछ नहीं पर इन धागों की पेचीदगी में उम्र के तार फंसे हैं जिनके फंसे रहना ही हमारी नियति बन गयी है।

पर जो भी है अच्छा ही है ! साथ रहते तो शायद कभी टूट जाते इसलिए दूर सही साथ हैं तो भी क्या बुरा है। जो पास हैं वो भी कितना जुड़े हैं ? "

वो अपनी बात कहती जा रही थी। कुछ मुझे पता था, कुछ अनसुना भी था।

फिर क्या हुआ ........ ? मैंने सवाल बढ़ा दिया ये सोच के कि उसकी चुप के अंतराल को कम कर  सकूंगी पर वो अब निढ़ाल सी सोफे पर पसर गयी। आंसुओं की धार उसके गालों से लुढ़कते देख पा रही थी मैं  .......

मैं कमरे का पर्दा खींच निकल आयी। कुछ सवाल अनुत्तरित रह जाने चाहिए ,जवाब जिनका खुद के पास ही न हो तो फिर नासूर बन जाने तक उनको कुरेदने से भी क्या हासिल।

मुझे पता है जिंदगी किसी के लिए नहीं रुकती  ........ सब चलते रहेंगे ,मिलते रहेंगे और फिर कहीं गुम जाएंगे फिर मिलने के लिए !

आप भी चलते रहिये पर जो साथ है उनका शुक्रिया करते रहिये कि वे साथ तो हैं ! ये साथ और साथ के भरोसे की मिट्टी नम रहनी चाहिए ! मोहब्बत की बेल इसी से हरीभरी रहेगी ! रिश्तों को हरा रखना है तो हाथ थामे  रखिये..... ! मौसम की फितरत है देर -सवेर बदल जाएगा !




Sunday, 12 June 2016

राजनीति की रसोई में पकाने आये हैं तो चमचे और लोटों की जगह बना लीजिए !

राजनीति के रसोईघर में दाखिल होने से पहले कवच -कुंडल धारण करके आईये। पकाने आये हैं तो चमचे और लोटों की जगह बना लीजिए , दाल गलने से लेकर परोसने तक वही काम आएंगे । अगर जीमने आये हैं तो अपनी थाली -कटोरा लेकर पंगत में बैठ जाइये , "जैसे ही बनेगा परोसा जाएगा " पर भरोसा रखिये और इंतज़ार कीजिये।

इस रसोईघर में कुछ बर्तन हैं जो बरसों से काम नहीं आये ,शायद दादी दहेज़ में लाई हों या दादा जी जिद करके ले आये हों , बहरहाल वो ऊपर वाली दुछत्ती में पड़े हैं ,इस इंतज़ार में कि कभी जरूरत हुई तो निकालेंगे। मुझ याद ही नहीं कि वहां से बर्तन कभी निकले भी थे ,हाँ ये जरूर हुआ कि बाऊजी सबको बताते रहे कि उनके पास अंग्रेजों के जमाने का कलसा और मुगलों के जमाने का लोटा पड़ा है। बाज़ार में कोई खरीददार भी नहीं ,कबाड़ी को बेचेंगे तो मुहल्ला कहेगा कि पुरखों की निशानी बेच दी , सो सब जस के तस है।

निष्ठाओं के अचार की कई बरनियां भी एक आले में सजी हैं। ये सब मौसम आने पर सस्ते में मिल जाने वाली सब्जियां हैं तो बारहों महीने काम आती हैं। निष्ठा का अचार चटपटा और पाचक होता है। सब्जी न हो तो इसके साथ किसी गर्मागर्म बवाल को परोसा जा सकता है।

रसोई पार के कोने में एक चक्की है जो मुद्दों को पीस मालपुए का घोल बनाने के काम आती है। चक्की की घरघराहट से सात घर दूर तक पता चल जाता है कि आज दिन की रसोई में क्या पकने वाला है। सब अलर्ट हो जाते हैं और कानाफूसी शुरू हो जाती है। माहौल में उत्तेजना बनाए रखने के लिए ये दो पाट की मशीन बड़े काम आती है। इसे चलाता कोई और, और इसमें पिसता कोई और है।

मीडिया का दूध आंच पर चढ़ा है और बहने के इंतज़ार में है पर इस रसोई काका की पैनी नज़र से न दूध उबल के गिरता है न आंच ही मंदी होती है। ये दूध जितना उबलेगा इस पर मलाई उतनी गाढ़ी आएगी और रसोई काका  ही जानते हैं कि उस मलाई का हकदार कौन होगा सो आपको ये कभी पता नहीं चलेगा कि जो दूध आप चढ़ा के आये थे उसकी मलाई कौन खा गया।

राजनीति की रसोई सब्र का इम्तिहान भी लेती है। छुरी में धार न हो तो फांक नहीं मिलती और गलती से खुद को लग जाए तो धार रुकती नहीं सो सब्र से काम लें। थाली में बैंगन लुढ़क रहे हों  या तड़का लगाना हो या चार बर्तनों की टकराहट को सम्भालना हो ,आपको धीरज रखना ही होगा वरना रायता फैलते देर नहीं होगी और मेहमान रसोई की अव्यवस्था के लिए सब रसोई काका की जगह जजमान को लानते भेजेंगे।
यहाँ सब कुछ पकता है , छिलके से लेकर गूदे तक कुछ भी ! कचरे के डिब्बे में जो कुछ दिख रहा है वह सब उनकी किस्मत का लेखा है

सो देवियों -सज्जनों ! राजनीति की रसोई में सम्भल के पांव धरियेगा ! पांव के नीचे भी नज़र रखिएगा कि कोई टूटे गिलास का कांच ही न आ जाए या मक्खन पर फिसल जाएँ। यहाँ जो कुछ भी पक रहा है वो सबको बराबर पचे जरूरी नहीं सो बाजार से आदर्शों की भूसी खाते रहिये और यहाँ का लुत्फ़ उठते रहिये।

रसोई काका आपके अन्नदाता हैं उन्हें प्रणाम करके बाहर आईयेगा वरना अगली बार भूख लगने पर खाना तो क्या दाना भी नसीब नहीं होगा !

नमस्कार ,चलते हैं ! हाँ ! जानते हैं ,भूख पर जोर किसी का नहीं है ........... 

Thursday, 26 May 2016

प्रेम का कोना कभी बंजर नहीं होता , जरा नजदीक आये नहीं कि सब हरा हो जाता है। घाव भी और जमीं भी ..............

रिश्तों में घिरे ,रिश्तों में फंसे ,रिश्तों में जीते , रिश्तों में हारे ............. नाम वाले रिश्ते ,बेनाम रिश्ते सब खेला है .........सब माया है ,सब जानते हैं फिर भी भोगना में फंसे हैं ! न फंसने जैसा कोई विकल्प भी नहीं है किसी के पास।

वो बात करना चाहता है ! वो हैरान थी कि क्या बात करे उससे ............. 
सैंकड़ों प्रश्न जब संबंधों के बीच उग जाएँ तो उसकी परिणीति वही होती है जो हर संबंध की होती है। जवाब सबके पास हैं ,सबके अपने जायज तर्क हैं। रिश्तों में तर्क की असीमित सम्भावनाएं होती हैं। कभी भी किसी को भी सही या गलत सिद्ध किया जा सकता है। सब माहिर है ,अपनी सहूलियतों के हिसाब से सब जवाब गढ़ लेते हैं। 

उसके पास भी जवाब होंगे और इसके पास उनको मान लेने की वजह भी........... प्रेम का कोना कभी बंजर नहीं होता , जरा नजदीक आये नहीं कि सब हरा हो जाता है...... घाव भी और जमीं भी......

बात बात पर रूठना और जरा सा झुक के मना लेना क्या बुरा है। सुनने में सहज लगता है पर जब बात हर बार की हो तो गांठों के बोझ से प्रेम का धागा भी कमजोर हो जाता है।

उससे बात करने में बुरा कुछ नहीं ,कर लो पर फिर जब चोट लगे तो करहाने या चीखने के लिए दम जुटा लेना। वक्त हर बार इतनी मोहलत दे जरूरी नहीं है। कुछ लोग रिश्तों को पॉपकॉर्न की तरह इस्तेमाल करते हैं ,उनके लिए सिनेमा में हिरोईन की कमर और हीरो की दिलेरी देखने के लिए पॉपकॉर्न जरूरी है। तुम पॉपकॉर्न हो या कोक खुद तय करो ?

मैं उससे बतिया रही थी मनो खुद को जी रही थी ! उसका डर जायज है , उसका डर उस अनुभव की देन है जो वो भी जी रही है पर पिघल जाती है और पिघलना बुरा भी नहीं। बुरा सिर्फ परिणाम है ,जो डराता है डस्टबिन की शक्ल में। लोग भी चेहरे पर चेहरे चढ़ाये गुज़रते हैं , रटे रटाये डायलॉग - कही कहाई कहानियां कितना भरोसा करें और भरोसा उनका क्या अब खुद पर भी नहीं होता !! 

कोई तराजू ले कर नहीं बैठा पर सब एक दूसरे को तोल टटोल रहे हैं। टाइम पास के लिए रिश्ते और संबंधों की दुकानदारी में जितना कुछ एक के साथ एक फ्री का लालच है उतना जिंदगी भर की जमापूंजी जाने का डर भी है। 

अवसाद से बचना है तो रिश्तों में मज़ाक से बचिए। आपके लिए मनोरंजन हो सकता है पर किसी और के लिए ये जिंदगी का सवाल बन सकता है। हर कोई "वो " नहीं हर " वो " "वो " भी नहीं। जब मज़ाक बनाते हैं तो बनाते रहिये और फिर बन जाने के लिए भी तैयार रहिये। जिंदगी खेल का मैदान जरूर है पर बेईमानी से जीते तो हारने वाले से उसके ईमान का सुकून तो फिर भी हासिल नहीं कर पाएंगे। 

उसको बख्श दें ! छल के खेल में किसी के ईमान किसी की मासूमियत को जीतने से बेहतर है कि उन को चुनें जिनके पास दिल नहीं फौलाद है ताकि जब आपको चोट लगे तो अहसास हो कि दर्द किसे कहते हैं !

चलते रहिये ! बचके रहिये !

Thursday, 12 May 2016

रिश्ते फ़ास्ट फ़ूड नहीं होते ........

तुम किसी रोज़ "मैं " हो कर मुझे देखो ......
उससे क्या हो जायेगा ?
देखो न कभी ,फिर पूछना !
तुम हो जाना मुश्किल है मेरे लिए ! कहाँ से शुरू करूंगा ,नहीं समझ आएगा !
शुरू ऐसे करना कि मान लेना कि मैं मेरे साथ नहीं हूँ तुम्हारे साथ हूँ और अकेली भी हूँ !
उफ्फ्फ ! जिंदगी को जलेबी बना के जीती हो तुम !
जलेबी सी जिंदगी   ......... आह्ह्ह ! क्या ख्याल है और इस जलेबी की चाशनी तुम हो !

वो किसी एक सिरे को पकड़ कर मुझ तक पहुंचने की राह बनाता है और खुद ही उलझ जाता है। रिश्तों का मकड़जाल होता ही ऐसा है , कोई कभी कहीं पहुंचा ही नहीं ! सब भरम में जीते हैं ,सफर के -मंजिल के -साथ के......... ये मुगालते हैं ! सबने पाले हैं ,सब छले जाते हैं और सब फिर भी जमे रहने के लिए जमे रहते हैं।

किसी शाम पहाड़ी पर बैठे -बैठे उसने मेरे आँचल से अपना मुहं ढांप लिया और कहने लगा कि बस अब इसके बाद समय को रोक लो ! सूरज को डूबने से रोकती या अपना आँचल सरका लेती............

जब मन का हो तो समय रेत सा फिसलता है और ना हो तो तन तपती बालू में  धंसा जाता है। हवाओं में उलझते बालों ने कोई नज़्म लिख डाली है। ये वक़्त किसी सूरज का पाबंद हो सकता है पर मन का पंछी उड़ने के लिए किस घड़ी को देखता है। वो बस उड़ जाता है ,समंदर के पार कोई है ........... जो कहता है तुम होतीं तो ऐसा होता,तुम होतीं तो वैसा होता  .......... तुम कहाँ नहीं हो ,कब नहीं हो और मैं भी कब तुम्हारे साथ नहीं हूँ ! ज़रा हाथ भर बढ़ाओ और महसूस करो मुझे !

रिश्ते फ़ास्ट फ़ूड नहीं होते ,ये इश्क़ की इंस्टेंट डिलीवरी लेने वाले , कूपनों और स्कीम के मोहताज नहीं समझ सकते !
किसी पगडण्डी पर हाथ थामे खामोश सिलसिले को जीना फूलों के उस शज़र जैसा है जो आज भी उस झील किनारे मुस्कुरा रहा है ! हम आज भी वही हैं और कहीं नहीं हैं !

चलते रहना और मुस्कुराते रहना आप भी ,कोई है जो आपसे हौसला मांग रहा है और दे रहा है तो इन पलों को संजो के रखिये ! काम आएंगे !






Monday, 2 May 2016

उसके साथ मेरा रिश्ता यायावरी का है .......

सफ़र पर निकली हूँ तो अब लौट जाने का मन नहीं है .........  यायावरी रास आने लगी है। जिद ने जद को हरा दिया है ! किसी ने पूछा  कहाँ पहुंचना  है ? मैंने पूछा , आप कहाँ पहुंचे ? कहाँ से चले थे ........ किसी सिरफिरे के पास ही मेरे सवालों के जवाब होते हैं ! मज़ेदार है  , सब  सफर पर हैं पर सब इमारतों को अपनी जागीर समझ के इंचटेपिया हो रहे हैं। यहाँ से यहाँ तक तेरा और वहां से वहां तक मेरा !  किसको कब क्या हासिल हुआ ये सिर्फ बायो में लिखा है और बायो की हकीकत से जिंदगी का असल दूर है !

उसके साथ मेरा रिश्ता यायावरी का है ........एक  शाम  उसने भी पूछा " तुम ठहर जाओ ,थकती नहीं हो क्या ? " मैं हंस पडी ......... ठहरने के लिए अब समय नहीं है , मैं जल्दी में हूँ !! वो पहाड़ देख रहे हो ना ,उसके पार मुझे जाना है ........
तुम पागल हो , वो बादल हैं !
बादल तुम्हारे लिए हैं , मेरे लिए उनके पार एक एक दुनिया है जो धुआं धुआं ,सीली सीली , तैरती हुई , हर  कुछ से परे, बरसने को तैयार है !
ये बातें हकीकत से परे हैं ......... वो ऐसे कहता है ,जैसे मैं सुन ही रही हूँ और कहते कहते वो भी मेरा हाथ थामे  बादलों के पार चल देता है।
हकीकत  के किस्से बादलों की स्याही में घुलने लगे हैं। ये इश्क़ का बादल है ,खामोशी से आया है और जिंदगी में हज़ार रंग घोले जा रहा है। झील में तैरती सैंकड़ों रोशनियाँ मेरी दहलीज़ पर ला सजाई हैं उसने .......  जब इश्क़ में होते हैं तो उसके पार कुछ नहीं होता और इस पार हम नहीं होते। बैंच पर बैठे डूबते सूरज को देखते हुए हम अपने भीतर रोशनी का दरिया जमा कर रहे हैं , दरिया के इस छोर पर वो और इस छोर मैं  ........ !

आवारगी का ये सम्मोहन उसके इर्दगिर्द होने के एहसास से और बढ़ चला है।
"सफर अकेले करना चाहिए " मैं कहती हूँ।
यानि मैं लौट जाऊं ?  वो पूछता है।
तुम आये ही कब जो लौट जाओगे ?
उलझा दिया तुमने ,चलो उलझा ही रहने दो ! सुलझने से क्या पा लिया अब उलझे रहने में मज़ा आने लगा है ! तुम अकेली सफर पर रहो ,मैं बस तुम्हारे साथ रहूंगा !

तो मैं जीती ......... मेरी यायावरी जीती ! आवारा लम्हों के सफर में जिंदगी जीती है !
चलते रहिये आप भी , सफर में रहेंगे तो मुगालतों से बचे रहेंगे। दुनिया में किसी को न बदल सकते हैं ,न सिखा -पढ़ा सकते हैं ! आप काहे जी जला रहे हैं  ......... भीतर के सफर को बाहर के सफर से अलग कर लें और यायावरी  का मज़ा लें !

चलते हैं !
 


Sunday, 1 May 2016

तुम्हारी आवाज़ मेरे आँचल को सितारों से भर देती है !

अकस्मात ही तुम मिल गए ...... कुछ दिन पहले मिल जाते ...ना ,कुछ साल साल पहले ,अरे कुछ उससे भी पहले........ पर तुम नहीं मिले ! तुम को तब मिलना ही नहीं था ! वक्त भी मजिस्ट्रेट है मनो ,वक्त ही क्या हर लम्हा जज की कुर्सी पर बैठा है। तुम लम्हों का सबसे नायाब तोहफा हो जो जिंदगी की किताब के सबसे दिलचस्प मोड़ पर साथ चलने को हो !!

मैं तुमको उन लम्हों से चुरा लाई हूँ या तुमने मुझे ढूंढ निकाला है !! हहहहा  ..... ये रोज की लड़ाई है और जीतता कोई नहीं ! हम दोनों ही हारना चाहते हैं ! ये वक़्त और चाँद से दूरी कुछ नहीं है। सांसों की लय पर सफर तय किया जा सकता है। मीलों चला जा सकता है और बरसों तक निभाया जा सकता है। जो कुछ हमने पाया ,जो कुछ हमने जिया , वो महक रहा है मेरे चारों ओर।

तुम बात करते करते कहीं गुम जाते हो और मैं सुनते- सुनते कहीं और निकल जाती हूँ।  हमारे पास इतनी कहानियां हैं ,इतने फ़साने हैं कि जमाने बीत जाएंगे खत्म होने में पर वो किस्से खत्म नहीं होंगे। चलो छोड़ो..... हम अक्सर एक दूसरे को कहते हैं और फिर से उसी किसी सिरे को पकड़ कर उस सिलसिले को दफन करने लगते हैं। ये साथ का रोना ,साथ का हंसना...... अच्छा लगता है !

मुस्कुराहटें बिखर रही हैं ! चेहरे पर तैरते सुकून और तुम्हारी ख्वाहिशों की दलीलें मेरे आसपास रुमानियत का जंगल उगा रही है।

कौन इतनी फ़िक्र करता है कि चाँद को उदास नज़र से ना देखा जाये या उदास किसी भी ग़ज़ल और किसी भी चुभने वाले लम्हों को जमींदोज़ कर मुझसे दूर कर दिया जाए ।  अब जिंदगी की टाइम लाइन को मैंने तुम्हारे हवाले कर दिया है ,तुम जो चाहे रखो ,जिसे चाहे रखो. ....... ये पासवर्ड मुसीबतों का फेरा है ! जो घर में ताला नहीं लगाता उसके लिए ये सब सम्भालना भी बेकार है........ बस मैं और मेरा सुकून ,मेरी आवारगी ....... मेरे साथ चल ! सब बवाल से दूर , बस खामोश हम -तुम .........

तुम्हारी आवाज़ मेरे आँचल को  सितारों से भर देती है ! मैं रात उसे मुहं तक ढांप हर उस शह से दूर निकल जाती हूँ जो मुझे सताती है ! मैं खुश हूँ कि जिंदगी महरबां है मुझ पर ........अब कोई जिक्र नहीं और फ़िक्र भी नहीं क्यूंकि रिश्ता अब कोई उस नाम  का है ही नहीं !

कभी जी कर देखें ,कभी अमृता -इमरोज बन कर देखें ! देह के पार भी कोई दुनिया है जो हज़ारों बरस से उसके मेरे बीच इश्क का समंदर बन रोज़ ही उतरती है ! ये सफ़र उसके नाम का उसी के साथ हो चला है !
मैं नज़्म लिख रही हूँ , वो कहानी लिख रहा है ! किसी दिन साथ छापेंगे ! आप पढियेगा जरूर.........