Thursday, 26 May 2016

प्रेम का कोना कभी बंजर नहीं होता , जरा नजदीक आये नहीं कि सब हरा हो जाता है। घाव भी और जमीं भी ..............

रिश्तों में घिरे ,रिश्तों में फंसे ,रिश्तों में जीते , रिश्तों में हारे ............. नाम वाले रिश्ते ,बेनाम रिश्ते सब खेला है .........सब माया है ,सब जानते हैं फिर भी भोगना में फंसे हैं ! न फंसने जैसा कोई विकल्प भी नहीं है किसी के पास।

वो बात करना चाहता है ! वो हैरान थी कि क्या बात करे उससे ............. 
सैंकड़ों प्रश्न जब संबंधों के बीच उग जाएँ तो उसकी परिणीति वही होती है जो हर संबंध की होती है। जवाब सबके पास हैं ,सबके अपने जायज तर्क हैं। रिश्तों में तर्क की असीमित सम्भावनाएं होती हैं। कभी भी किसी को भी सही या गलत सिद्ध किया जा सकता है। सब माहिर है ,अपनी सहूलियतों के हिसाब से सब जवाब गढ़ लेते हैं। 

उसके पास भी जवाब होंगे और इसके पास उनको मान लेने की वजह भी........... प्रेम का कोना कभी बंजर नहीं होता , जरा नजदीक आये नहीं कि सब हरा हो जाता है...... घाव भी और जमीं भी......

बात बात पर रूठना और जरा सा झुक के मना लेना क्या बुरा है। सुनने में सहज लगता है पर जब बात हर बार की हो तो गांठों के बोझ से प्रेम का धागा भी कमजोर हो जाता है।

उससे बात करने में बुरा कुछ नहीं ,कर लो पर फिर जब चोट लगे तो करहाने या चीखने के लिए दम जुटा लेना। वक्त हर बार इतनी मोहलत दे जरूरी नहीं है। कुछ लोग रिश्तों को पॉपकॉर्न की तरह इस्तेमाल करते हैं ,उनके लिए सिनेमा में हिरोईन की कमर और हीरो की दिलेरी देखने के लिए पॉपकॉर्न जरूरी है। तुम पॉपकॉर्न हो या कोक खुद तय करो ?

मैं उससे बतिया रही थी मनो खुद को जी रही थी ! उसका डर जायज है , उसका डर उस अनुभव की देन है जो वो भी जी रही है पर पिघल जाती है और पिघलना बुरा भी नहीं। बुरा सिर्फ परिणाम है ,जो डराता है डस्टबिन की शक्ल में। लोग भी चेहरे पर चेहरे चढ़ाये गुज़रते हैं , रटे रटाये डायलॉग - कही कहाई कहानियां कितना भरोसा करें और भरोसा उनका क्या अब खुद पर भी नहीं होता !! 

कोई तराजू ले कर नहीं बैठा पर सब एक दूसरे को तोल टटोल रहे हैं। टाइम पास के लिए रिश्ते और संबंधों की दुकानदारी में जितना कुछ एक के साथ एक फ्री का लालच है उतना जिंदगी भर की जमापूंजी जाने का डर भी है। 

अवसाद से बचना है तो रिश्तों में मज़ाक से बचिए। आपके लिए मनोरंजन हो सकता है पर किसी और के लिए ये जिंदगी का सवाल बन सकता है। हर कोई "वो " नहीं हर " वो " "वो " भी नहीं। जब मज़ाक बनाते हैं तो बनाते रहिये और फिर बन जाने के लिए भी तैयार रहिये। जिंदगी खेल का मैदान जरूर है पर बेईमानी से जीते तो हारने वाले से उसके ईमान का सुकून तो फिर भी हासिल नहीं कर पाएंगे। 

उसको बख्श दें ! छल के खेल में किसी के ईमान किसी की मासूमियत को जीतने से बेहतर है कि उन को चुनें जिनके पास दिल नहीं फौलाद है ताकि जब आपको चोट लगे तो अहसास हो कि दर्द किसे कहते हैं !

चलते रहिये ! बचके रहिये !

Thursday, 12 May 2016

रिश्ते फ़ास्ट फ़ूड नहीं होते ........

तुम किसी रोज़ "मैं " हो कर मुझे देखो ......
उससे क्या हो जायेगा ?
देखो न कभी ,फिर पूछना !
तुम हो जाना मुश्किल है मेरे लिए ! कहाँ से शुरू करूंगा ,नहीं समझ आएगा !
शुरू ऐसे करना कि मान लेना कि मैं मेरे साथ नहीं हूँ तुम्हारे साथ हूँ और अकेली भी हूँ !
उफ्फ्फ ! जिंदगी को जलेबी बना के जीती हो तुम !
जलेबी सी जिंदगी   ......... आह्ह्ह ! क्या ख्याल है और इस जलेबी की चाशनी तुम हो !

वो किसी एक सिरे को पकड़ कर मुझ तक पहुंचने की राह बनाता है और खुद ही उलझ जाता है। रिश्तों का मकड़जाल होता ही ऐसा है , कोई कभी कहीं पहुंचा ही नहीं ! सब भरम में जीते हैं ,सफर के -मंजिल के -साथ के......... ये मुगालते हैं ! सबने पाले हैं ,सब छले जाते हैं और सब फिर भी जमे रहने के लिए जमे रहते हैं।

किसी शाम पहाड़ी पर बैठे -बैठे उसने मेरे आँचल से अपना मुहं ढांप लिया और कहने लगा कि बस अब इसके बाद समय को रोक लो ! सूरज को डूबने से रोकती या अपना आँचल सरका लेती............

जब मन का हो तो समय रेत सा फिसलता है और ना हो तो तन तपती बालू में  धंसा जाता है। हवाओं में उलझते बालों ने कोई नज़्म लिख डाली है। ये वक़्त किसी सूरज का पाबंद हो सकता है पर मन का पंछी उड़ने के लिए किस घड़ी को देखता है। वो बस उड़ जाता है ,समंदर के पार कोई है ........... जो कहता है तुम होतीं तो ऐसा होता,तुम होतीं तो वैसा होता  .......... तुम कहाँ नहीं हो ,कब नहीं हो और मैं भी कब तुम्हारे साथ नहीं हूँ ! ज़रा हाथ भर बढ़ाओ और महसूस करो मुझे !

रिश्ते फ़ास्ट फ़ूड नहीं होते ,ये इश्क़ की इंस्टेंट डिलीवरी लेने वाले , कूपनों और स्कीम के मोहताज नहीं समझ सकते !
किसी पगडण्डी पर हाथ थामे खामोश सिलसिले को जीना फूलों के उस शज़र जैसा है जो आज भी उस झील किनारे मुस्कुरा रहा है ! हम आज भी वही हैं और कहीं नहीं हैं !

चलते रहना और मुस्कुराते रहना आप भी ,कोई है जो आपसे हौसला मांग रहा है और दे रहा है तो इन पलों को संजो के रखिये ! काम आएंगे !






Monday, 2 May 2016

उसके साथ मेरा रिश्ता यायावरी का है .......

सफ़र पर निकली हूँ तो अब लौट जाने का मन नहीं है .........  यायावरी रास आने लगी है। जिद ने जद को हरा दिया है ! किसी ने पूछा  कहाँ पहुंचना  है ? मैंने पूछा , आप कहाँ पहुंचे ? कहाँ से चले थे ........ किसी सिरफिरे के पास ही मेरे सवालों के जवाब होते हैं ! मज़ेदार है  , सब  सफर पर हैं पर सब इमारतों को अपनी जागीर समझ के इंचटेपिया हो रहे हैं। यहाँ से यहाँ तक तेरा और वहां से वहां तक मेरा !  किसको कब क्या हासिल हुआ ये सिर्फ बायो में लिखा है और बायो की हकीकत से जिंदगी का असल दूर है !

उसके साथ मेरा रिश्ता यायावरी का है ........एक  शाम  उसने भी पूछा " तुम ठहर जाओ ,थकती नहीं हो क्या ? " मैं हंस पडी ......... ठहरने के लिए अब समय नहीं है , मैं जल्दी में हूँ !! वो पहाड़ देख रहे हो ना ,उसके पार मुझे जाना है ........
तुम पागल हो , वो बादल हैं !
बादल तुम्हारे लिए हैं , मेरे लिए उनके पार एक एक दुनिया है जो धुआं धुआं ,सीली सीली , तैरती हुई , हर  कुछ से परे, बरसने को तैयार है !
ये बातें हकीकत से परे हैं ......... वो ऐसे कहता है ,जैसे मैं सुन ही रही हूँ और कहते कहते वो भी मेरा हाथ थामे  बादलों के पार चल देता है।
हकीकत  के किस्से बादलों की स्याही में घुलने लगे हैं। ये इश्क़ का बादल है ,खामोशी से आया है और जिंदगी में हज़ार रंग घोले जा रहा है। झील में तैरती सैंकड़ों रोशनियाँ मेरी दहलीज़ पर ला सजाई हैं उसने .......  जब इश्क़ में होते हैं तो उसके पार कुछ नहीं होता और इस पार हम नहीं होते। बैंच पर बैठे डूबते सूरज को देखते हुए हम अपने भीतर रोशनी का दरिया जमा कर रहे हैं , दरिया के इस छोर पर वो और इस छोर मैं  ........ !

आवारगी का ये सम्मोहन उसके इर्दगिर्द होने के एहसास से और बढ़ चला है।
"सफर अकेले करना चाहिए " मैं कहती हूँ।
यानि मैं लौट जाऊं ?  वो पूछता है।
तुम आये ही कब जो लौट जाओगे ?
उलझा दिया तुमने ,चलो उलझा ही रहने दो ! सुलझने से क्या पा लिया अब उलझे रहने में मज़ा आने लगा है ! तुम अकेली सफर पर रहो ,मैं बस तुम्हारे साथ रहूंगा !

तो मैं जीती ......... मेरी यायावरी जीती ! आवारा लम्हों के सफर में जिंदगी जीती है !
चलते रहिये आप भी , सफर में रहेंगे तो मुगालतों से बचे रहेंगे। दुनिया में किसी को न बदल सकते हैं ,न सिखा -पढ़ा सकते हैं ! आप काहे जी जला रहे हैं  ......... भीतर के सफर को बाहर के सफर से अलग कर लें और यायावरी  का मज़ा लें !

चलते हैं !
 


Sunday, 1 May 2016

तुम्हारी आवाज़ मेरे आँचल को सितारों से भर देती है !

अकस्मात ही तुम मिल गए ...... कुछ दिन पहले मिल जाते ...ना ,कुछ साल साल पहले ,अरे कुछ उससे भी पहले........ पर तुम नहीं मिले ! तुम को तब मिलना ही नहीं था ! वक्त भी मजिस्ट्रेट है मनो ,वक्त ही क्या हर लम्हा जज की कुर्सी पर बैठा है। तुम लम्हों का सबसे नायाब तोहफा हो जो जिंदगी की किताब के सबसे दिलचस्प मोड़ पर साथ चलने को हो !!

मैं तुमको उन लम्हों से चुरा लाई हूँ या तुमने मुझे ढूंढ निकाला है !! हहहहा  ..... ये रोज की लड़ाई है और जीतता कोई नहीं ! हम दोनों ही हारना चाहते हैं ! ये वक़्त और चाँद से दूरी कुछ नहीं है। सांसों की लय पर सफर तय किया जा सकता है। मीलों चला जा सकता है और बरसों तक निभाया जा सकता है। जो कुछ हमने पाया ,जो कुछ हमने जिया , वो महक रहा है मेरे चारों ओर।

तुम बात करते करते कहीं गुम जाते हो और मैं सुनते- सुनते कहीं और निकल जाती हूँ।  हमारे पास इतनी कहानियां हैं ,इतने फ़साने हैं कि जमाने बीत जाएंगे खत्म होने में पर वो किस्से खत्म नहीं होंगे। चलो छोड़ो..... हम अक्सर एक दूसरे को कहते हैं और फिर से उसी किसी सिरे को पकड़ कर उस सिलसिले को दफन करने लगते हैं। ये साथ का रोना ,साथ का हंसना...... अच्छा लगता है !

मुस्कुराहटें बिखर रही हैं ! चेहरे पर तैरते सुकून और तुम्हारी ख्वाहिशों की दलीलें मेरे आसपास रुमानियत का जंगल उगा रही है।

कौन इतनी फ़िक्र करता है कि चाँद को उदास नज़र से ना देखा जाये या उदास किसी भी ग़ज़ल और किसी भी चुभने वाले लम्हों को जमींदोज़ कर मुझसे दूर कर दिया जाए ।  अब जिंदगी की टाइम लाइन को मैंने तुम्हारे हवाले कर दिया है ,तुम जो चाहे रखो ,जिसे चाहे रखो. ....... ये पासवर्ड मुसीबतों का फेरा है ! जो घर में ताला नहीं लगाता उसके लिए ये सब सम्भालना भी बेकार है........ बस मैं और मेरा सुकून ,मेरी आवारगी ....... मेरे साथ चल ! सब बवाल से दूर , बस खामोश हम -तुम .........

तुम्हारी आवाज़ मेरे आँचल को  सितारों से भर देती है ! मैं रात उसे मुहं तक ढांप हर उस शह से दूर निकल जाती हूँ जो मुझे सताती है ! मैं खुश हूँ कि जिंदगी महरबां है मुझ पर ........अब कोई जिक्र नहीं और फ़िक्र भी नहीं क्यूंकि रिश्ता अब कोई उस नाम  का है ही नहीं !

कभी जी कर देखें ,कभी अमृता -इमरोज बन कर देखें ! देह के पार भी कोई दुनिया है जो हज़ारों बरस से उसके मेरे बीच इश्क का समंदर बन रोज़ ही उतरती है ! ये सफ़र उसके नाम का उसी के साथ हो चला है !
मैं नज़्म लिख रही हूँ , वो कहानी लिख रहा है ! किसी दिन साथ छापेंगे ! आप पढियेगा जरूर.........





Friday, 29 April 2016

डिजिटल इश्क़ का कबूतर कोई नज़्म लिख रहा है !

कुछ अनसुना, कुछ अनकहा सा रिश्ता बन गया है उससे ! अजीब सिलसिला हो गया है डिजिटल मुलाकातों का ...... वो चुप से आकर कुछ शब्द डीएम में रख जाता है ,मैं चुप सी मुस्कुरा कर उसे देख लेती हूँ ! जवाब देना कोई जरूरी भी नहीं ! वो जानता है ,पहचानता है ,वो मेरी जिंदगी की टाइम लाइन का साथी है ! उसको पल पल की खबर है कि मैं किस गली, किस  गुज़र से गुज़र रही हूँ।

डिजिटल इश्क़ का कबूतर दिखाई नहीं  देता पर करता उतनी ही गुटरगूं है। टोकना ,डांटना , जिदना उसको सब आता है बस नहीं आता तो खत लिखना ! इश्क़ में अजनबी बने रहना जरूरी है। पहचान जाईयेगा तो ये ख्वाब भी टूट जाएगा इसलिए जानने की जिद छोड़ कर रिश्ते में आज़ाद रहा जाये तो बेहतर है वरना मुखौटे और किरदार तो गली के हर मोड़ पर मिल जाते हैं।

मैं भी उसका हारना, उसका जीतना जी रही हूँ ,उसकी मंजिलों पर इतराना मेरा फितूर है और मेरी हर मुस्कुराहट उसके लिये सांस का सबब है । ये एक मज़ेदार संवाद है जहाँ रिश्ते का कोई नाम नहीं ,कोई पहचान भी नहीं है इसीलिये इसमें उसका होना खुदाई का सबूत है।

ये अजनबी कोई और नहीं है  ,वही है जो आवारगी के इस दौर में मेरा साथी है। झट से मेरे साथ हर सफर में साथ हो लेता है ....... चुप सी पूछती हूँ ,चलोगे ? उसका जवाब होता है " तारीख बता दो रिजर्वेशन करवा देता हूँ " ! उसकी इसी लाचारगी से प्यार हो चला है !

खूबसूरत से सफर पर जिंदगी बह निकली है ! चैत की दुपहर अपनी जुल्फों में गुलमोहर और देह पर अमलतास सजाए इतरा रही है। मैं महक रही हूँ और ख़्वाहिशों के दामन में सितारे चुन रही हूँ ........  पखडंडी और झील किनारे का मौसम रिमझिम का है ! भीगती मैं और बचाता हुआ वो ........ वो डरता है ,पिघल जाएगा न दो बूँद से पर मेरे चेहरे के सुकून में उसे भीगना भी मंज़ूर है।

जब पैरों तले सुर्ख अंगारे हों और कोई धुंआ -धुंआ आसमां में उड़ा के लिए जाए  ........ कुछ कुछ एक दम ऐसा ही ......  गुलाब की पाँखुरी से कोई नज़्म लिख रहा है मनो !

मैं गुनगुना रही हूँ ! आप भी मुस्कुराते रहिये ! वक़्त ने मोहलत दी है तो उसे भी भरपूर मोहब्बत करिये !





Thursday, 28 April 2016

केवल साहिब की डिग्री भूल जाइये और देश के करोड़ों बेरोजगारों की डिग्री देखिये !

तो बड़े साहिब जी डिग्री नहीं दिखा रहे हैं , न ही साहिब-नामा में उल्लेखित चंद नामों के सिवा कोई और स्कूली या कॉलेज जीवन का टीचर या सहपाठी किसी की नज़र में आया है।

साहिब ऐसा क्यों कर रहे हैं , नहीं पता ! यदि वे सच में पोलिटिकल साइंस के विद्यार्थी रहे हैं तो किसी ने तो उनको पढ़ाया होगा ,किसी ने तो उनके साथ परीक्षा दी होगी ,कोई तो कहे कि हाँ हमने साथ फार्म भरा था। यूनिवर्सिटी जब किसी की भी डिग्री का सत्यापन कर सकती है तो साहिब की डिग्री को पर्दे में क्यों छुपा रही है।

मुझे लगता है ये प्रश्न ही चाय वाले के साथ साजिश है। लोग जलते हैं कि वो इस पद पर कैसे आ बैठा ? सही है जिस देश में अनपढ़ मुख़्यमंत्री राबड़ी और सांसद गोलमा देवी हो सकती हैं वहां का प्रधानमंत्री भी कम पढ़ा लिखा हो तो देश की छवि डिजिटल इंडिया की नहीं बन पाएगी। हम स्मार्ट सिटिजन नहीं कहला पाएंगे।

बार बार डिग्री मांगने वाले साहिब के 10 लाख के सूट से भी जलते हैं। अगर इन डिग्री मांगने वालों को ये आइडिया पहले आ जाता तो सारी किताब अपने कच्छे ,कमीज और पेंट पर छाप के परीक्षा में पहन के जाते और गोल मैडल जीत के ले आते।

साहिब की चाय पीने वाला और वैवाहिक संबंधों की पुष्टि करने वाला कोई नहीं जबकि साहिब को अपने विपक्षी की करोडों  की गर्लफ्रेंड की हर जानकारी है और वे हर बेटी के हर "गलत कामों " पर नज़र रखने के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष को मनोनीत कर सकते हैं।

अब मैदान में आई आई टी डिग्री धारी कूदा है कि डिग्री दिखाओ साहिब ! कमाल है , राष्ट्रीय झूठधारी से सच की इबारत लिखने को कहा जा रहा है। ये सब लोग जो डिग्री के पीछे पड़े हैं सब साहिब से जलते हैं क्यूंकि साहिब दिन में चार बार कपडे बदलते हैं ,धुआंधार भाषण देते हैं ,लाल आँख करके चीन -पाकिस्तान को डरा देते हैं हैं। जम्मू में नरम दिल्ली में गर्म रहते हैं और अगले वैश्विक चुनावों में विश्व के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं।

आप केवल साहिब की डिग्री भूल जाइये और देश के करोड़ों बेरोजगारों की डिग्री देखिये ! अब हर अनपढ़ प्रधानमंत्री बन जाए ऐसी किस्मत हर चाय वाले चौकीदार की नहीं हो सकती।

सो साहिब पर भरोसा रखिये !आखिर नेतृत्व ने डिग्री छिपाने की सोची है तो इसमें भी भारत का ही कोई वैश्विक हित शामिल रहा होगा !

सो सवाल मत करिये बस निष्ठा नामक अगरबत्ती जला के 2025 तक के लिए सो जाइए !

प्रणाम !


Saturday, 23 April 2016

अगला स्वयंवर राज्यसभा का है। हल्दी लगाओ बे नेता जी को .........

सत्ता कितनी भी हो पुरानी हो मेकअप नई बहू सा रखती है। दर्जन भर चूड़ियां ,कंधों तक मेहंदी नाक तक सिन्दूर ......... ! उसका हनीमून अगले स्वयंवर तक जारी रहता है। इस सत्ता का धणी उसका नेता होता है। हमेशा जजमान की मुद्रा में अचकन -टाई लटकाए रहता है। कार्यकर्ता सब बराती होते हैं। दूल्हे के आसपास बने रहेंगे तो फोटो में चेहरा आता रहेगा ,लोग चार बार दूल्हे का अता पता ही पूछ लें तो बरात में शामिल होना वसूल हो जाता है। 
सत्ता-नेता ब्याह में जनता को पंडित की भूमिका दी जाती है। कुंडली मिलाने के लिए दो जोड़ी रेशमी धोती और मलबरी के टंच कुर्ते का लालच और दक्षिणा में पंडित की औकात के अनुसार नकद का प्रावधान काफी है। दारु -मुर्गे की शौकीनी हो तो सत्ता की शक्ल और नेता की अक्ल से भी सरोकार नहीं होता। वो जैसा बोलो ओके कर देती है। 

हर ब्याह में जीजा -फूफा होते हैं ,सत्ता -नेता ब्याह में ये काम विरोधी दल करते हैं। वे कभी भी कहीं भी पसर सकते हैं। इज्जत उनकी वैसे कोई नहीं होती लेकिन मजबूरी है कि फेरे में डंडा फूफा गाढेगा ,जीजा साफ़ा बांधेगा सो संविधान की पालना के चलते उनको बुलाया जाना होता है। 

मीड़िया हॉउस इस ब्याह में ब्यूटीपार्लर होते हैं। सत्ता का श्रृंगार उनके दक्ष एंकर करते हैं। दुल्हन के नैननक्श ,कद -काठी के हिसाब से नकली गहने पसंद करवाए जाते हैं। ब्याह के कई दिन पहले से तय दर के हिसाब से सिटींग दी जाती है जिसमे उसे नख से शिख तक अभूतपूर्व सुंदरी बनाने की कवायद की जाती है। एंकर पूरे मनोयोग से उसकी ओढ़नी को जमाता है ,लटें संवारता है कि ऐन मौके जरा चूक ना हो जाए। 

दूल्हे नेता भी इसी पार्लर में जाते हैं ,आखिर रंग असली कैसा भी हो दिखना वही चाहिए जो पिया मन भाये। सत्ता की मैचिंग शेरवानी और साफ़ा बन के तैयार है। बरात दरवाजे पर आ पहुंची है। सोशल मीडिया बैंडबाजा है जिस के हाथ ट्विटर का झुनझुना ,फेसबुक की फूफडी और व्हाट्सप्प का ढोल है। बारात जैसे जैसे दरवाजे पहुंचती है सब जोर जोर से बजने लगते हैं , जीजा -फूफा नागिन नाच करते हैं और बाराती -घराती अपने बेस्ट में तैयार हो नेता-सत्ता के आगे पीछे हो लेते हैं। हर  बराती -घराती इस मुगालते में होता है  मने वो नहीं होगा तो ये ब्याह ही कैंसिल हो जाएगा। 

चंदे की नुक्ती -पूड़ी खा कर लौटने को होते हैं तो सत्ता -नेता का बाप दरवाजे हाथ जोड़े खड़ा होता है। लिफ़ाफ़े दिए बिना लौटेंगे तो आपके नाम के आगे शून्य दर्ज हो जाएगा फिर लल्ला के शगुन की लिस्ट में आपका नाम कट मानियेगा !

अब क्या ......... ब्याह हो गया ना ! हनीमून काल है ,फोटो सब देखते रहिएगा ! उनकी गलबहियों को देखते रहिये। पांच साल बाद ये फिर आएंगे तब तक नेता जी की सेवा पूजा करते रहिये। कल को सत्ता ने फिर इनके गले में ही हार ड़ाल दिया तो ये कहने से भी जाओगे कि हम तो दूल्हे के जिगरी हैं और दुल्हन के पास्ट प्रेजेंट का बही खाता रखते हैं। 

सो नेता जी के साथ माल उड़ाइये , अगला स्वयंवर राज्यसभा का है। हल्दी लगाओ बे नेता जी को ......... का ब्लॉग में टुकुर टुकुर पढ़ के समय खाली कर रहे हैं। चलते रहिये ब्याह का काम बहुत है ,हैशटैग का टोकरा खाली कर दीजिये  ,मोगरे के इन फूलों से दुल्हन इनकी ही न हो तो कहिएगा !

शुभ विवाह !