Friday, 29 April 2016

डिजिटल इश्क़ का कबूतर कोई नज़्म लिख रहा है !

कुछ अनसुना, कुछ अनकहा सा रिश्ता बन गया है उससे ! अजीब सिलसिला हो गया है डिजिटल मुलाकातों का ...... वो चुप से आकर कुछ शब्द डीएम में रख जाता है ,मैं चुप सी मुस्कुरा कर उसे देख लेती हूँ ! जवाब देना कोई जरूरी भी नहीं ! वो जानता है ,पहचानता है ,वो मेरी जिंदगी की टाइम लाइन का साथी है ! उसको पल पल की खबर है कि मैं किस गली, किस  गुज़र से गुज़र रही हूँ।

डिजिटल इश्क़ का कबूतर दिखाई नहीं  देता पर करता उतनी ही गुटरगूं है। टोकना ,डांटना , जिदना उसको सब आता है बस नहीं आता तो खत लिखना ! इश्क़ में अजनबी बने रहना जरूरी है। पहचान जाईयेगा तो ये ख्वाब भी टूट जाएगा इसलिए जानने की जिद छोड़ कर रिश्ते में आज़ाद रहा जाये तो बेहतर है वरना मुखौटे और किरदार तो गली के हर मोड़ पर मिल जाते हैं।

मैं भी उसका हारना, उसका जीतना जी रही हूँ ,उसकी मंजिलों पर इतराना मेरा फितूर है और मेरी हर मुस्कुराहट उसके लिये सांस का सबब है । ये एक मज़ेदार संवाद है जहाँ रिश्ते का कोई नाम नहीं ,कोई पहचान भी नहीं है इसीलिये इसमें उसका होना खुदाई का सबूत है।

ये अजनबी कोई और नहीं है  ,वही है जो आवारगी के इस दौर में मेरा साथी है। झट से मेरे साथ हर सफर में साथ हो लेता है ....... चुप सी पूछती हूँ ,चलोगे ? उसका जवाब होता है " तारीख बता दो रिजर्वेशन करवा देता हूँ " ! उसकी इसी लाचारगी से प्यार हो चला है !

खूबसूरत से सफर पर जिंदगी बह निकली है ! चैत की दुपहर अपनी जुल्फों में गुलमोहर और देह पर अमलतास सजाए इतरा रही है। मैं महक रही हूँ और ख़्वाहिशों के दामन में सितारे चुन रही हूँ ........  पखडंडी और झील किनारे का मौसम रिमझिम का है ! भीगती मैं और बचाता हुआ वो ........ वो डरता है ,पिघल जाएगा न दो बूँद से पर मेरे चेहरे के सुकून में उसे भीगना भी मंज़ूर है।

जब पैरों तले सुर्ख अंगारे हों और कोई धुंआ -धुंआ आसमां में उड़ा के लिए जाए  ........ कुछ कुछ एक दम ऐसा ही ......  गुलाब की पाँखुरी से कोई नज़्म लिख रहा है मनो !

मैं गुनगुना रही हूँ ! आप भी मुस्कुराते रहिये ! वक़्त ने मोहलत दी है तो उसे भी भरपूर मोहब्बत करिये !





Thursday, 28 April 2016

केवल साहिब की डिग्री भूल जाइये और देश के करोड़ों बेरोजगारों की डिग्री देखिये !

तो बड़े साहिब जी डिग्री नहीं दिखा रहे हैं , न ही साहिब-नामा में उल्लेखित चंद नामों के सिवा कोई और स्कूली या कॉलेज जीवन का टीचर या सहपाठी किसी की नज़र में आया है।

साहिब ऐसा क्यों कर रहे हैं , नहीं पता ! यदि वे सच में पोलिटिकल साइंस के विद्यार्थी रहे हैं तो किसी ने तो उनको पढ़ाया होगा ,किसी ने तो उनके साथ परीक्षा दी होगी ,कोई तो कहे कि हाँ हमने साथ फार्म भरा था। यूनिवर्सिटी जब किसी की भी डिग्री का सत्यापन कर सकती है तो साहिब की डिग्री को पर्दे में क्यों छुपा रही है।

मुझे लगता है ये प्रश्न ही चाय वाले के साथ साजिश है। लोग जलते हैं कि वो इस पद पर कैसे आ बैठा ? सही है जिस देश में अनपढ़ मुख़्यमंत्री राबड़ी और सांसद गोलमा देवी हो सकती हैं वहां का प्रधानमंत्री भी कम पढ़ा लिखा हो तो देश की छवि डिजिटल इंडिया की नहीं बन पाएगी। हम स्मार्ट सिटिजन नहीं कहला पाएंगे।

बार बार डिग्री मांगने वाले साहिब के 10 लाख के सूट से भी जलते हैं। अगर इन डिग्री मांगने वालों को ये आइडिया पहले आ जाता तो सारी किताब अपने कच्छे ,कमीज और पेंट पर छाप के परीक्षा में पहन के जाते और गोल मैडल जीत के ले आते।

साहिब की चाय पीने वाला और वैवाहिक संबंधों की पुष्टि करने वाला कोई नहीं जबकि साहिब को अपने विपक्षी की करोडों  की गर्लफ्रेंड की हर जानकारी है और वे हर बेटी के हर "गलत कामों " पर नज़र रखने के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष को मनोनीत कर सकते हैं।

अब मैदान में आई आई टी डिग्री धारी कूदा है कि डिग्री दिखाओ साहिब ! कमाल है , राष्ट्रीय झूठधारी से सच की इबारत लिखने को कहा जा रहा है। ये सब लोग जो डिग्री के पीछे पड़े हैं सब साहिब से जलते हैं क्यूंकि साहिब दिन में चार बार कपडे बदलते हैं ,धुआंधार भाषण देते हैं ,लाल आँख करके चीन -पाकिस्तान को डरा देते हैं हैं। जम्मू में नरम दिल्ली में गर्म रहते हैं और अगले वैश्विक चुनावों में विश्व के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं।

आप केवल साहिब की डिग्री भूल जाइये और देश के करोड़ों बेरोजगारों की डिग्री देखिये ! अब हर अनपढ़ प्रधानमंत्री बन जाए ऐसी किस्मत हर चाय वाले चौकीदार की नहीं हो सकती।

सो साहिब पर भरोसा रखिये !आखिर नेतृत्व ने डिग्री छिपाने की सोची है तो इसमें भी भारत का ही कोई वैश्विक हित शामिल रहा होगा !

सो सवाल मत करिये बस निष्ठा नामक अगरबत्ती जला के 2025 तक के लिए सो जाइए !

प्रणाम !


Saturday, 23 April 2016

अगला स्वयंवर राज्यसभा का है। हल्दी लगाओ बे नेता जी को .........

सत्ता कितनी भी हो पुरानी हो मेकअप नई बहू सा रखती है। दर्जन भर चूड़ियां ,कंधों तक मेहंदी नाक तक सिन्दूर ......... ! उसका हनीमून अगले स्वयंवर तक जारी रहता है। इस सत्ता का धणी उसका नेता होता है। हमेशा जजमान की मुद्रा में अचकन -टाई लटकाए रहता है। कार्यकर्ता सब बराती होते हैं। दूल्हे के आसपास बने रहेंगे तो फोटो में चेहरा आता रहेगा ,लोग चार बार दूल्हे का अता पता ही पूछ लें तो बरात में शामिल होना वसूल हो जाता है। 
सत्ता-नेता ब्याह में जनता को पंडित की भूमिका दी जाती है। कुंडली मिलाने के लिए दो जोड़ी रेशमी धोती और मलबरी के टंच कुर्ते का लालच और दक्षिणा में पंडित की औकात के अनुसार नकद का प्रावधान काफी है। दारु -मुर्गे की शौकीनी हो तो सत्ता की शक्ल और नेता की अक्ल से भी सरोकार नहीं होता। वो जैसा बोलो ओके कर देती है। 

हर ब्याह में जीजा -फूफा होते हैं ,सत्ता -नेता ब्याह में ये काम विरोधी दल करते हैं। वे कभी भी कहीं भी पसर सकते हैं। इज्जत उनकी वैसे कोई नहीं होती लेकिन मजबूरी है कि फेरे में डंडा फूफा गाढेगा ,जीजा साफ़ा बांधेगा सो संविधान की पालना के चलते उनको बुलाया जाना होता है। 

मीड़िया हॉउस इस ब्याह में ब्यूटीपार्लर होते हैं। सत्ता का श्रृंगार उनके दक्ष एंकर करते हैं। दुल्हन के नैननक्श ,कद -काठी के हिसाब से नकली गहने पसंद करवाए जाते हैं। ब्याह के कई दिन पहले से तय दर के हिसाब से सिटींग दी जाती है जिसमे उसे नख से शिख तक अभूतपूर्व सुंदरी बनाने की कवायद की जाती है। एंकर पूरे मनोयोग से उसकी ओढ़नी को जमाता है ,लटें संवारता है कि ऐन मौके जरा चूक ना हो जाए। 

दूल्हे नेता भी इसी पार्लर में जाते हैं ,आखिर रंग असली कैसा भी हो दिखना वही चाहिए जो पिया मन भाये। सत्ता की मैचिंग शेरवानी और साफ़ा बन के तैयार है। बरात दरवाजे पर आ पहुंची है। सोशल मीडिया बैंडबाजा है जिस के हाथ ट्विटर का झुनझुना ,फेसबुक की फूफडी और व्हाट्सप्प का ढोल है। बारात जैसे जैसे दरवाजे पहुंचती है सब जोर जोर से बजने लगते हैं , जीजा -फूफा नागिन नाच करते हैं और बाराती -घराती अपने बेस्ट में तैयार हो नेता-सत्ता के आगे पीछे हो लेते हैं। हर  बराती -घराती इस मुगालते में होता है  मने वो नहीं होगा तो ये ब्याह ही कैंसिल हो जाएगा। 

चंदे की नुक्ती -पूड़ी खा कर लौटने को होते हैं तो सत्ता -नेता का बाप दरवाजे हाथ जोड़े खड़ा होता है। लिफ़ाफ़े दिए बिना लौटेंगे तो आपके नाम के आगे शून्य दर्ज हो जाएगा फिर लल्ला के शगुन की लिस्ट में आपका नाम कट मानियेगा !

अब क्या ......... ब्याह हो गया ना ! हनीमून काल है ,फोटो सब देखते रहिएगा ! उनकी गलबहियों को देखते रहिये। पांच साल बाद ये फिर आएंगे तब तक नेता जी की सेवा पूजा करते रहिये। कल को सत्ता ने फिर इनके गले में ही हार ड़ाल दिया तो ये कहने से भी जाओगे कि हम तो दूल्हे के जिगरी हैं और दुल्हन के पास्ट प्रेजेंट का बही खाता रखते हैं। 

सो नेता जी के साथ माल उड़ाइये , अगला स्वयंवर राज्यसभा का है। हल्दी लगाओ बे नेता जी को ......... का ब्लॉग में टुकुर टुकुर पढ़ के समय खाली कर रहे हैं। चलते रहिये ब्याह का काम बहुत है ,हैशटैग का टोकरा खाली कर दीजिये  ,मोगरे के इन फूलों से दुल्हन इनकी ही न हो तो कहिएगा !

शुभ विवाह !

Friday, 22 April 2016

हैशटैग क्रांति से मुद्दों को पासबुक फॉर्म में ले आना भी उपलब्धि है।

हैशटैग क्रांति के वीर सेनानियों को मेरा नमन है। हे क्रांति दूतों तुम इतनी ऊर्जा कहाँ से लाते हो ? ये ठीक है कि तुम ट्विटर मशीन से चार -छह शब्दों को मिसाइल के तौर पर इस्तेमाल करके विरोधी के किले पर  ताबड़तोड़ वार कर उसे हतप्रभ कर देते हो लेकिन इतनी मोटी चमड़ी की सत्ता पर इसका असर अब नहीं होता है। कुछ और सोचो मित्रों !

दिनभर ट्रेंड बदलता रहता है पर समस्याएं और मुद्दे तो महीनों और वर्षों बाद भी वही रहते हैं। बदलता क्या है ? सोशल मीडिया के अतिदोहन ने उसे भड़ास मंच बना दिया है। चर्चा के लिए अब कोई मंच शेष नहीं है। या तो आप महिमा मंडन कीजिये या अपनी मुंडी का  भंजन करवा लीजिए। बच के निकल जाना चाहते हैं तो अपने पीछे गैर जिम्मेदार देशद्रोही का टैग लगवा लीजिए। 

कहीं कोई सूरत नहीं ,कोई विकल्प भी नहीं ! हैशटैग भी मंडन -विखंडन की फैक्ट्री है। सामजिक मुद्दों की आड़ में कहीं सत्ता की रोटी सिक रही है तो कहीं निर्दोष बापूजी की आड़ में भावनाओं का दोहन हो रहा है। सच में अगर कोई द्रवित हो रहा होता तो और इतने लोग अगर उस मुद्दे को लेकर गम्भीर होते तो कोई जनांदोलन बन चुका होता पर ऐसा नहीं हो रहा है।  

पंजाब के नशे पर चिंता है ,मराठवाड़ा के पानी का रोना है , मोदी जी की डिग्री की चिंता है ,केजरीवाल का सम -विषम है , इस बीच शाहरुख और ना जाने किसी किस का हैशटैगीकरण होना है। करिये खूब करिये लेकिन नतीजे की भी तो परवाह कीजिए ! उसका असर होने तक मैदान में तो रहिये। अपॉइंटमेंट की तरह हैशटैग चलाते रहिएगा तो उसकी भी कद्र निर्दोष बापूजी सरीखी हो जाएगी। 

तमाम सत्ता दलों की तरह हैशटैग उद्योग में भी रवीश के शब्दों में "इज़ इक्वल टू " का सिद्दांत खूब चल रहा है। बताओ मोदी जी ,बताओ सुषमा जी ,बताओ अलाना , बताओ फलाना जी करके सवाल दागते रहिये और दूसरी और से गलियों की जमात में सक्रियता पैदा करते रहिये। सवाल डिग्री को लेकर होगा जवाब में अफजल और शीला -मुन्नी ले आईयेगा ! बेजा - बेहूदे तर्क वितर्क कर, सोशल मीडिया का दोहन कर हम भीतर भी बंजर जमीन तैयार कर रहे हैं। 

इस सब में एक अच्छी बात हुई है वो ये कि हम समस्याओं और मुद्दों को पासबुक फॉर्म में ले आये हैं। इससे हम किसी भी ग्रुप बकलोली में आसानी से हारते नहीं हैं। ज्ञानचंद ,रायचंद प्रसन्न हैं कि कर्मचंद काम कर रहा है और कर्मचंद भी खुश है कि दोनों बेरोजगार भाई काम पर लगे हैं। 

जिस मीडिया की नज़र में आने के लिए ये हैशटैग चलाए जाते हैं उसकी अपनी तो कोई सुनवाई होती नहीं फिर इस हैशटैग वार की चपेट में आने वालों की कौन सुनता है ? जिसने शाहरुख की फिल्म देखनी है वो ट्रेंड देखकर जाना या नहीं जाना तय नहीं करेगा न हैशटैग देखकर मोदी अपनी डिग्री किसी को दिखा देंगे। केजरीवाल हैशटैग से पानी मराठवाड़ा नहीं पहुंचा सकते और न ही मोदी को दिल्ली के कामकाज में टांग अड़ाना बंद करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। 

सत्ता और समाज की मोटी चमड़ी पर स्पंदन के लिए हैशटैग की खुरच नहीं तीखे सामजिक आंदोलन और विमर्श की जरूरत है। टच से मुद्दे फिसलते रहें और कर्म से आज़ाद रहें ,वे यही चाहते हैं और हम वही कर रहे हैं। 

चलिए खुश रहिये ,करते रहिये ,कहते रहिये ! होना न होना सब सत्ता के हाथ है हमसब तो निमित्त मात्र हैं जिनका इस्तेमाल कोई भी करने के लिए स्वतंत्र है। ताली ही बजानी है इधर बजायें या उधर, बात एक ही है। 

सोशल मीडिया के क्रांति दूतों को प्रणाम ! भरम कायम रहे !




Friday, 25 March 2016

समाज को धार्मिक कोढ़ हो गया है। सवाल केजरीवाल के पीड़ित परिवार से मिलने का नहीं सवाल ये बनाया जा रहा है कि दादरी गए थे तो पंकज के घर क्यों नहीं गए ?

हत्या कैसे जायज ठहराई जा सकती है। कहीं भी हो ,किसी भी रूप में हो ,ये प्रकृति के न्याय के विरुद्ध है। इस अपराध में सोशल मीडिया भी हमलावर है ,वो भी बराबर का हिस्सेदार है ........  देशप्रेम को धर्म से जोड़ दो , वोट को धर्म से जोड़ दो , मरण ,परण ,जनम सबको धर्म से जो दो......... धर्म ना हुआ कोई  हथियार हो गया है। 

धर्म की दुहाई देकर कभी अख़लाक़ के हत्यारों को बचाए या घेरे जाने का प्रयास होता है तो कभी दिल्ली के डॉक्टर नारंग की हत्या को साम्प्रदायिक रंग दे सत्ता की गोटियां चलने का मामला बनाया जाता है। आका हुकुम देते हैं और चेलेचपाटे या रेवड़ कहिए व्हाट्स एप्प ,फेसबुक पर भड़काने वाले संदेश ,हरे गेरुए रंग में पोत कर पटा देने का प्रयास करती है। 

वे जानते हैं कि अधिकांश लोग बिना घटना की तह तक जाए चंद संदेशों के आधार पर भड़केंगे और उनके साथ नारे लगाने सड़क पर आ जायेंगे , नहीं भी निकले तो 10-20 को संदेश तो प्रसारित कर ही देंगे। इन संदेशों के आवेश में आकर फिर भले कितने और पंकज ,कितने और अखलाख मरें इसकी परवाह किसी को नहीं। 

दिल्ली में बच्चे के बाहर खेलने पर एक मोटर साइकिल सवार को कुछ कह देना एक व्यक्ति को इतना भारी पड़ा कि मोटर साइकिल सवार धमकी के साथ घर लौटा और साथ कुछ लाठी -डंडों से लैस गुंडों को लेकर आया और उस इंसान को इतना मारा कि उसने दम तोड़ दिया।  
दूसरे मामले में भीड़ ने एक इंसान को इसलिए मार डाला क्यूंकि किसी ने बताया कि वह गौ मांस खा रहा है। 

दोनों ही मामले में मरने वाले के खून का रंग लाल ही था। दोनों के ही परिवार मातम मना रहे हैं। दोनों में से दोषी कोई नहीं था। दोनों ही युवा थे और सुंदर भारत का सपना पाले हुए थे ,अपने घर के चिराग थे। 

कौन हक़ देता है हमको ये सवाल उठाने का कि उनका धर्म क्या है ,क्या था ? जो जिन्दा हैं उनका धर्म क्या है ,ये कि वो जन भावना को इस कदर दूषित कर दें कि बौद्धिक हैवानियत उनके जिस्म से फूट कर मवाद बन बहने लगे ? 

समाज को धार्मिक कोढ़ हो गया है। सवाल केजरीवाल के पीड़ित परिवार से मिलने का नहीं सवाल ये बनाया जा रहा है कि दादरी गए थे तो पंकज के घर क्यों नहीं गए ? किसी ने ये प्रयास नहीं किया की हर पीड़ित परिवार इस मनोदशा में नहीं होता कि ऐसे दुखद परिस्थिति में किसी बाहरी व्यक्ति को शामिल कर सके। 
केजरीवाल भले ही मुख्य्मंत्री हों पर बिना परिवार की सहमति के उस परिवार से उस समय मिलने की जिद नहीं कर सकते जब वो किसी से मिलना नहीं चाह रहा हो। 

पुलिस ने हमलवारों को पकड़ा है ,प्रशासन धार्मिक उन्माद फ़ैलाने वालों से सतर्क रखने के प्रयास में है तो अब ये हम सबकी जिम्मेदारी हैं कि ऐसे लोगों को जो अपने निज स्वार्थों की रोटी लाशों पर सेकनें के आदी हो गए हैं को पहचाने और सयंम रखते हुए उन लोगों को पहचान सकें तो छद्म राष्ट्रवाद की आड़ में आये दिन धर्म की बोटियाँ उछाल हमें जानवर बना रहे हैं। 

इंसानियत बचाए रखिये , हर धर्म का यही सार है। 


लौटने के लिए कुछ तारीख़ें वक्त तय करके रखता है। आखिर तारीखों का भी तर्पण होता है ,उनमें में भी प्राण होते हैं।

दिल खुश है आज .......  बोझ उतरा हो मानो ! बेवजह की जंजीरें ,बेकार के सिलसिले खुद ही खुद से उलझने -सुलझने के सिलसिले,  नामालूम से सवाल और कभी ना मिल सकने वाले जवाबों की बेजा खोज ! तर्क कुछ नहीं कुतर्को के सहारे अतीत को थामे रहकर खुद को प्रताड़ित करते रहने का कोई अर्थ भी तो नहीं।

अपने फैसलों का खामियाज़ा खुद ही भुगतना होता है। गलत सही का फैसला समय करेगा। 

ये होली गयी और रंग दे गयी ,रंग गयी। मैं फिर से जिंदगी में लौट आयी..........  लौटने के लिए कुछ तारीख़ें वक्त तय करके रखता है। आखिर तारीखों का भी तर्पण होता है ,उनमें में भी प्राण होते हैं। 

खुद को आज़ादी मुबारक कहने का दिल कह रहा है ,वक़्त ने ये हौसला दिया है कि आवारगी कायम रहे। अपने अगले सफर पर निकलने की तैयारी है।  बाबा नीम करोरी के पास जाने का मन है। पहाड़ बुला रहे हैं ,मैं आ रही हूँ........ 

बाहर की व्यवस्था से लड़ना आसान है पर भीतर की उठापटक से जूझना बेहद मुश्किल।  आसान से सवाल और सीधे सपाट दिखने वाले रास्ते उतने सहज भी नहीं जितने प्रतीत होते हैं।  मन के चक्रव्यूह में ख्वाहिशों का अभिमन्यु हर बार मारा जाता है पर ना मन बाज आता है ना ख्वाहिशों की ताक़त कम होती है। 

हम सब भीतर की महाभारत में कभी दुर्योधन कभी कान्हा बन जाते हैं कभी गांधारी बन अंधत्व का ऐच्छिक वरण कर सुख की अनुभूति लेते हैं और दुःख को स्वनिमंत्रित कर बैठते हैं। 

मन भी कमाल है ,कितना धमाल करता है ! सबकुछ उल्टा पुल्टा अस्त व्यस्त और उसके बाद पसरा सन्नाटा ..... समय वो भी बीत जाता है और फिर से वही सब दोहराया जाता है। हर बार, बार बार और कितनी बार मन के फेर में फेरा लग जाता है ,आंसुओं की लड़ियां बांध जाती हैं ,कभी मन समंदर हो तुमसे गले लग जाता है। 

जीवन भी अद्द्भुत है ,तुम संगीत हो। गूंजता है हर पल और उसकी रुनकझनक मुझे जंगल में खींचे लिए जाती है........ असीम शांति और सुकून के लम्हे चुरा ही लिए हैं मैंने !!

जिंदगी को मृर्त्योत्सव की तरह जी लीजिए ! है भी और नहीं भी और होगी भी नहीं ........  वेदना को क्षमा के दरिया में बहा आइये और देखिये ये संगीत फिर बजने लगा है !

खुशियों की चाबी क्षमा में निहित है , खुद को भी कीजिये और और अपने अपनों को भी कीजिये ....... अब हो जाता है ना कभी कभी ,आपसे भी और उनसे भी !!

चलते रहिये -मुस्कुरा के गले मिलते रहिये ! देखिये कोई रूठा तो नहीं है ना आपसे .......... दो कदम आगे बढ़ा के मना लीजिए और न माने तो दुआएं भेजिए कि सब सुख सब के आंगन में बरसे। 

Saturday, 12 March 2016

मैं ,तुम और मेरी आवारगी बस और कोई नहीं है ................

एक लम्हा गुज़र गया , चुप से बिखर गया ! मेरे आँचल में सिमटा वो एक अधूरा सा एहसास उसकी सिलवटों पर पसरा रहा। मैं दिन की घड़ियां गिनती रही ,शाम की सीढ़ियों पर जब रात ने दस्तक दी तो चाँद दरवाजे आ खड़ा हुआ।  सितारों से भरा मेरा आँचल रात की सरगम पर गुनगुनाता रहा !

मैं वक्त हो गयी ,इसी तरह बीतती रही और उतरती रही उसके सांचे में ,उसकी लय से अपनी ताल मिलाने में लम्हे साल और साल जनम में कब बीत गए पता ही नहीं चला। 

मैं तुमको शब्दों में उतार किसी रोज अपने सिरहाने रखना चाहती हूँ पर तुम्हें छपवा कर किसी और के हाथों ,किसी और के सिरहाने नहीं रख सकती। मैं पढूं ,मेरा किरदार मेरे लम्हे और हमारा वजूद उतार दूँ कहीं। 
ऐसा भी कभी होता है भला पगली कि मैं रहूँ और ना भी रहूँ 
हाँ तुम तो ऐसे ही हो , होते भी हो और नहीं भी हो। 
मेरे फरमान मानते भी हो ,उलझते भी हो और सुलझ के फिर बिखर भी जाते हो !

 क्या खूब खेल है ये जिंदगी का ........   धूप कंचों से खेल रही हैं और शाम सिरहाने बैठी है। जादू सा उतर आया है आँगन में। लोग चेहरे से तेरा पता लेने में लगे हैं, मैं हर हाल में तुझे ज़माने से चुराने की जिद पे उतर आयी हूँ। 

आ जाईये , गुलालों का मौसम आया है ! वही रंगों के गीत वही कुनमुनी सी ताल किनारे की हवा का झौंका गुज़रा है !

मेरी ख्वाहिशों मुझे तुमसे बेइंतिहा इश्क़ है !! मैं कब तुमसे अलग रही और कब तुम्हारे साथ थी ........... बेमानी से सवाल है ! बस सच  यही है कि रंग बेहिसाब और जिंदगी सिर्फ ख्वाब तुम्हारे नाम का है !

मैं ,तुम और मेरी आवारगी बस और कोई नहीं है ! चले आओ !