Thursday, 31 December 2015

काल की गति कैलेंडर की मोहताज नहीं है........ !!

वक़्त ने बीतना होता है , बीत जाता है। हम तारीखों को ढोते हैं और समय हमारी कलाईयों पर बंधे रहने का भरम देता हुए हमें कहीं पीछे छोड़ जाता है। आगे बढ़ना भी कहाँ हो पाता  है। जो पीछे छूट गया वो भला था या बुरा था जैसा भी रहा गुज़र गया.......  कुछ सीखा कि नहीं ,नहीं कह सकती ये भी वक्त ही तय करेगा। 

खुशनसीबी पर इतराने को जी करता है तो दूसरे ही पल मन उदास भी हो जाता है। लम्हे बड़े सौदाई होते हैं ,हर एहसास की कीमत मांगते हैं। सिर पर प्यार करने वालों का उधार चढ़ा है उधर नफरत करने वाले दरवाजा पीट रहे हैं। मैं किस से तकाजा करूँ ? दोनों ही मेरे अपने हैं.......  मेरे ही लेनदेन के खाते है। 

जाईये गुज़र जाईये , हर गली में सौदाई हैं ,हर गली जज्बात बिकते हैं , रिश्तों की होली जलती है कभी ख्वाबों की दिवाली मनती है। ये कारवां है  जिधर से गुज़र जाए जिंदगी , अजब रंग बिखरे हैं गज़ब लोग मिलते हैं। 

 ये साल शानदार रहा , उम्मीद से बेहतर हासिल किया और उम्मीद से कहीं अधिक खो भी  दिया। पाया जो कुछ सर माथे , जो खोया उसका हौसला जुटाने में जो पाया वो भी उम्मीद से बढ़ कर पाया। अफ़सोस कुछ नहीं बस यही तल्ख़ी रह गयी कि कुछ सितारे जो फ़लक पर चमक सकते थे वो अनजाने ही जमीन पर आ गिरे और मैं निमित्त बन गयी। 

तोड़ देते हैं कुछ पल, कुछ भरोसे डगमगा जाते हैं ,कुछ उम्मीदें जला के ख़ाक कर देती हैं लेकिन दूसरे ही पल कुछ नए लम्हे हाथ आगे बढ़ा  देते हैं........   विश्वास  लौट आता है , भरोसा और बढ़ जाता है कि ईश्वर हमारे लिए कभी गलत चुन नहीं सकता। 

मैंने जो चुना गलत चुना पर वही सजा मेरे लिए नियति ने तय कर रखी थी कि मैं ठोकर खा लूँ तो समझूँ कि जिंदगी सीधा सपाट मैदान नहीं है। घुटने छिले हैं तो दर्द भी होगा ,कुछ तमाशबीन हंसेंगे भी लेकिन जख्म याद दिलाता रहेगा कि काल की गति कैलेंडर की मोहताज नहीं है। 

मैंने जो निर्णय किये वो सही थे क्यूंकि उन्हीं ने मुझे सच को जीने का हौसला दिया। नई मंज़िलों के पते मिले ,नया आसमान मिला। ईनाम के तौर  मिली किसी अजनबी मुस्कुराहट की कीमत  लगाई ही नहीं सकती।  

जो किया दिल से किया ! शिकायत किसी से अब कोई बाकी नहीं..........  कटुता शेष नहीं केवल मंगल कामनाएं हैं .......  नियति क्या चुन के लाई है पता नहीं पर मेरी दुआएं आप के हर नेक कदम पर आपके साथ हैं। 

2016 मेरे जीवन में तुम्हारा स्वागत है !




Saturday, 12 December 2015

वो एक रिश्ता है , डूबने लगती हूँ तो हाथ बढ़ा देता है .........

जिंदगी के कैनवास पर जितनी भी बार नज़र डालो हर तस्वीर कुछ पहचानी सी लगती है मनो कल की ही बात हो , कभी बोलती से लगती है कभी सिर्फ खामोशी से मुझे देखती है।  इन तस्वीरों में एक उसका चेहरा भी है जो हर तस्वीर के पीछे से मुझे खामोशी से देख रहा है। बरसों का खामोश साथ है , कितने रंग चढ़े और फीके भी पड़ गए पर उसकी चमक कभी गयी ही नहीं।

वो एक रिश्ता है , डूबने लगती हूँ तो हाथ बढ़ा देता है और जब तैरने का जी चाहता है खामोशी से मुझे लहरों के साथ खेलते देख मुस्कुरा भर देता है। उसके किनारे पर बैठ मुझे देखते रहना बड़ा सुकून देता है। ये यकीन हो जाता है कि शाम ढ़ले वहीं किनारे उसी से मुलाक़ात होगी।

अल्हड़पने के वो दिन उसने बखूबी संजो लिए हैं।  न मिलने न बिछड़ने के दर्द से परे के ये खामोश रूमानी से लम्हे, इश्क़ का वो दरिया बन गए जिसे उस नीली छतरी वाले ने खुद मेरे लिए रचा है।  वक्त का ये दरिया अब और खूबसूरत दिखाई देता है। किसी शाम जब आँखों से कुछ लम्हे झरने लगते है तो दरिया का ये किनारा ही कुछ कंकर हथेली में थमा जाता है और मैं घंटों उसी खेल में गुम फिर से आसमान छूने के लिए उड़  जाती हूँ। अपने पंखों पर इतराती, लजाती देख वो मुस्कुरा भर देता है। 

इस रिश्ते का कोई नाम न होना ही इसे संजोये हुए है। नाम वाले रिश्तों के साथ अपेक्षाओं और आक्षेपों के सिलसिले होते हैं ,बड़े अजीब होते हैं ,होते हैं पर किसी और के होते हैं। मेरे भी हैं ,सबके होते हैं पर मैं उनमें कहीं नहीं हूँ।

सांसों से लिखे नाम वक्त की सियाही भी धुंधला नहीं पाती। उसके साथ के वो पल इतने अज़ीज इस कदर अपने कि वजूद कब पिघल गया और एक नए सांचे में ढल गया पता ही नहीं चला। मैं लम्हा लम्हा जीती रही वो लम्हा लम्हा संजोता रहा और बरस बीत गए। न उम्मीदों की गुलामी न नाम की जिदें .......... न रवायतों की जंजीरें। आवाज़ देने से पहले आवाज़ सुन लूं और बिना देखे भी जिसके  जख़्म पढ़ लूं उस रिश्ते के साथ जिंदगी बसर हो तो मंज़िलों की परवाह कौन करे !

मेरी आवारगी को खुदा ने रहमतें बख्शी हैं। बेशुमार मोहब्बत पायी है मैंने जिंदगी से ,इतनी कि शिकायतें अब कोई बाकी नहीं हैं। सवाल हज़ारों हैं ,रोज़ बुलबले से उठते -बैठते हैं।  मैं उन आँखों के समंदर को पढ़ लेती हूँ तो हर सवाल का जवाब मिल जाता है।

दर्द के जंगल के पार वो  राहतों का दरिया है  ,वो आकाश जिसने मुझे अपने भीतर ऐसा सहेजा कि मैं हर उड़ान के बाद भी उस जद को पार नहीं कर पाती जिसके पार वो नहीं है। 

मेरी आवारगी तुझसे मेरा ये रिश्ता मेरा प्यार है ...... चल ले चल, जहाँ चाहे ... अब कोई अरमान भी बाकी नहीं सिवा इसके कि तेरा साथ हो और हाथ में तेरा हाथ हो ....... आ अब उड़ चलें !







Sunday, 6 December 2015

जितने चेहरे चाहे लगा लीजिये ,हर चेहरे का सच वही होता है जो आप हैं.........

एक अरसा हो गया अब यहाँ  , शायद डेढ़ साल ___ ट्विटर की मायावी दुनिया एक आईने  की तरह मेरे सामने है, मन जैसी कभी सीधी सपाट कभी एक दम जंतरम् -मंतरम्।

140 की सीमा में किसी के चरित्र और उसकी जिंदगी का खाका खींच लेने की धृष्टता आपने भी की होगी ,मैंने भी की है। कई बार महसूस हुआ कि किसी नतीजे पर पहुंच गयी ,दूसरे ही पल लगा कि शायद गलत हूँ। कुछ बेहतरीन हैंडल थे जिनके पीछे की सोच बेहद सुकून भरी थी ,कुछ आलोचनाओं के पुलिंदे ,कुछ शिकायतों के  सिलसिले ........ हम उन्ही का पीछा करते हैं जिन्हें  या तो पसंद करते हैं या सख्त नापसंद। जिन्हें पसंद करते हैं उन्हें पढ़ते हैं , प्रतिक्रिया देते हैं ,संवाद  करते हैं और जिन्हें पसंद नहीं करते उनका पीछा इसलिए करते हैं कि उन्हें लगातार ये जता सकें कि हमें आप में दिलचस्पी नहीं है या किसी दिन पीछा करना बंद कर देंगे , खामोश कर देंगे और विजयी भाव से खुद को भर लेंगे।  

 इन हैंडलों के भीतर एक अजीब सा सच और एक अजीब सा झूठ छिपा है। सच वो जो किसी प्रतिक्रिया के रूप में अनजाने ही सामने आ जाता है और झूठ वो जो दिन -रात शब्दों की  माया से गढ़ा जाता है। पिछले कुछ दिनों में कुछ ऐसे ही मायाजाल से उलझ रही हूँ....... व्यक्ति अपने सच से भागने लिए झूठ के जंगल उगाता  है। दिन रात बे सिर -पैर की बातें और उस दुनिया के किस्से कहानी सुना रहा है जिसमें वो है नहीं ,मायावी संसार गढ़ लिया है इर्दगिर्द  !

अप्राप्य के प्रति कौन आकर्षित नहीं होता लेकिन उसको अभिव्यक्त करने के लिए जिन शब्दों ,तस्वीरों का चयन किया जाता है उसे सम्भवतः आपके भीतर का जमीर भी इजाज़त न देता होगा। आप कैसे इतना गिर सकते हैं ? कैसे आप अपनी क्षमताओं के साथ इतनी निर्लज्जता के साथ बलात्कार कर सकते हैं और खुद ही उसको सम्मान भी देते हैं। खुद का महिमामंडन खुद के बनाये कल्पना लोक में ?

धीमा विष है जिसे पिया जा रहा है ...... जितने चेहरे चाहें लगा लीजिये ,हर चेहरे का सच वही होता है जो आप हैं । कितना भागेंगे ,कब तक भागेंगे ? जितना भागेंगे  ये उतनी गति से आपको दौडायेगा और एक दिन आपको ही थका देगा। 

इतने बेनामी हैंडल बना कर व्यक्त्तिव के उस हिस्से का पोषण करते हैं जिसे वक्त रहते खत्म किया जाना चाहिए लेकिन इस स्वनिर्मित संसार में होता उल्टा है। 

झूठ से सच की जंग कैसे जीतेंगे ,पता नहीं। जो भी हो मैं भी सीख रही हूँ ,देख रही हूँ ,समझ रही हूँ कि इंसान कोई एक भाषा न बोलता है ना समझता है। सहजता की इतनी कमी क्यों है , क्यों सब इतना बिखरा सा है ?

ट्वीटर का ये सफर अजब स्टेशनों से गुज़र रहा है ,अजब मुसाफिर -गजब के किस्से। 

मैं और मेरी आवारगी हमेशा की तरह इस बार भी इन सबके बीच से होकर , हर बार वहीं पहुँच जाते है जहाँ उसे जाना होता है ........  कहीं दूर - गुम जाने के लिए तैयार , झूठ की दुनिया में सच की बेजा तलाश है ! एक उम्मीद है , सो जाते -जाते ही जाएगी ! मैं हमेशा सफर में ही हूँ। 

आप भी चलते रहिये .......

Wednesday, 25 November 2015

दर्द जब रूह से आज़ाद हुआ जाता है तो नफ़रत किससे करूँ...........

एक वक्त आता है जब लगता है कि सब हिसाब बराबर हो जाना चाहिए ,कभी जिंदगी बेहिसाब हो जाती है। कभी नफ़रतों का दौर, कभी मोहब्बत का दौर........ बेहिसाब कभी मैं -कभी वक्त की दरियादिली। वक्त की ईमानदारी ये कि कभी कोई मिला ही नहीं जिससे बेहिसाब नफरत करूँ , चाहती हूँ कि क्यों न करूँ पर चाह कर भी नहीं कर पाती किसी से भी नहीं।

जख़्म पक कर रिसने लगे हैं , काँटा जिस्म से खींच कर लाख निकाल दिया जाये लेकिन वो मंज़र अक्सर दीवारों से परछाई बन उतर आते हैं। हाथ अनचाहे ही उस दर्द को महसूस करता है जिसने वक्त को नासूर बना सफ़र की रूह पर सजा दिया। 

सजा भोगने के लिए कितने जन्म लेने होते हैं कौन जाने ,लेकिन किसी एक जन्म में दर्द का जलजला भी कितने जन्मों की खुशियां बहा ले जाता है। 
जिसे कभी कोई ऐसा मिला ही ना हो जिसने छला हो उसे कोई एक छल का पल मिल जाए तो नई परिभाषा समझने के लिए नया जन्म ही लेना होता है। जन्म भी ऐसा  मनो इंसान के बीच फ़िल्टर लगा के देखने की मजबूरी बन जाए। 

हादसे कम नहीं होते दुनिया में ,हर रोज लोग दो चार होते होंगे ,किसी रोज़ तमाशा बन जाओगे तो पूछना खुद से किस को हादसे में धकेल आये थे। दर्द की प्रतिक्रिया में दर्द ही नसीब होना होता है। 
बोझ कभी उतरता कभी चढ़ता है , बोझ भी कर्ज है..... जन्मों की लेनदारी -देनदारी रही होती है। इसे भी उतरना होगा। 

आवारगी ने कितने ही मंज़र देख लिए ,अब रंगों में बस आसमान बसता है। किसी की गीत की धुन पर रंग भी उसी आसमान से बरसने लगते हैं। पल जादू से गुज़र रहे हैं। होने न होने में फ़ासला न रहा है , दर्द जब रूह से आज़ाद हुआ जाता है तो नफ़रत किससे करूँ। 

ऐसी ही रह जाना चाहती हूँ ,अब थम जाना चाहती हूँ .......  आवारगी के अपने सफर में अपने खुश ख्याल सपनों के साथ , सात समंदर पार बसे अपने वजूद के साथ मोहब्बतों के दौर में ही दफन हो जाऊं किसी रोज़। 

हिसाब सब यहीं पूरा होना है ...... हादसा हूँ तो भुलाना भी नामुमकिन है ,वक्त मेरे होने की गवाही हर मोड़ पर देगा। नासूर भी भर जाएगा बाकि बस निशां होंगे। सफ़र उस निशां से होकर गुज़रेगा ,यही नियति है सो चलते रहिये ........ हादसों से बचना लेकिन हों तो उस टीस के साथ उन चीखों को याद करना जो उन दीवारों में आज भी कैद हैं।

ये दौर ऐसा जब देने को कोई दुआ भी नहीं .....  बाकि नसीब में तो जो है सो हइये ही। 





Saturday, 21 November 2015

उत्तराखंड का वो एक सफर यादगार सफर था ….

जिंदगी कि मारामारी में कुछ पल सूकूँ के मिल जाएँ ,किसे तलाश नहीं होती। मरीचिका सा सुकून मृग सी मेरी तृष्णा ……भटकते -भटकते उत्तराखंड ले आयी। कारण कुछ भी बने हों पर इस तलाश में उन जगहों को ढूंढ पायी जो अक्सर तस्वीरों और ख्वाबों में देखे थे। 

सालों पहले अल्मोड़ा से इस सफ़र की शुरुआत की थी। रेत के टीलों से पहाड़ों तक का सफ़र इस कदर सुहाना होगा कभी सोचा नहीं था। काठगोदाम से उतर कर लोकल बस पकड़ी , जो लोकल सवारियों से ठसाठस भरी थी। पता चला कि कुछ कॉलेज में पढ़ने हल्द्वानी से नैनीताल और कुछ अल्मोड़ा  जा रहे हैं तो कुछ रोजमर्रा की जरूरतों का सामान लेने पहाड़ से नीचे उतरे थे। भाषा समझ नहीं आ रही थी पर उनको हिन्दी भी आती थी। गोल गोल चक्कर खाती बस में आगे बैठ कर लगता रहा कि ये अंतिम सफर न हो। नीचे झांक कर देखा तो लगा कि ईश्वर मेरे पास बैठा है। 

अल्मोड़ा के एस एस जे विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में एक माह रुकी थी। उस प्रवास ने समझा दिया कि पहाड़ कि जिंदगी उतनी सरल भी नहीं जितनी कि दिखाई देती है। सब्जियों की उतनी वैरायटी नहीं , मनोरंजन के लिए ढेरों मॉल और शॉपिंग कॉम्लेक्स भी नहीं लेकिन सुख इतना मनो इनमें से किसी की कोई जरूरत भी नहीं। लोकल कन्वेंस भी आसान नहीं , सब शार्ट कट इस पहाड़ से उतरो उस पर चढ़ जाओ। बेहद आसान सी लगने वाली चढ़ाई मुश्किल लगी लेकिन कुछ दिन बाद उसी ने शरीर की पुरानी सभी शिकायतों को दूर भी कर दिया। 

एक सुबह दोस्तों ने बताया कि कुछ दूर एक मंदिर है चाहो तो चलो। घर से निकली थी तो माँ ने बताया था कि अल्मोड़ा के जंगलों में सुमित्रा नंदन पंत की रचनाएँ बसती हैं। मैं कभी पंत को सुनती कभी साथियों के कुमाऊंनी -गढ़वाली गीतों को। गोलू देवता का मंदिर है ये , असंख्य चिट्ठियां लटकी थी। किसी ने बताया कि ये सबकी सुनते हैं। मैंने कोई पाती नहीं लिखी ,पता नहीं क्यों। हमारी श्रद्धा का प्रवाह कितना निर्मल है ना ....

इसी रास्ते से कुछ और आगे बढ़ते गए तो जंगल मंत्र मुग्ध करता जा रहा था। मैं उन गुफाओं कंदराओं में महावतार बाबाजी और योगानंद जी की कहानियां ढूंढती तो कभी शिव लीला की कल्पना में खो जाती। देवदार के जंगल नहीं थे वो किसी दूसरी ही दुनिया का पता हैं। जागेश्वर मंदिर के  उस समूह में रहा महाकाल और कुबेर का वो मंदिर मेरी स्मृतियों में आज भी जस का तस है। 

जागेश्वर के उसी रास्ते से कुछ दिन बात मुनस्यारी ,पिथौरागढ़ भी जाना हुआ। सड़क किनारे के जंगल ,खेत ,पहाड़ों से गिरते झरने , भेड़ों के झुण्ड सब कुछ कांच जैसा साफ़। मुनस्यारी के रास्ते की चढ़ाई ने दम जरूर निकाल दिया लेकिन आल्टो चलाने वाले भैया के लोकल किस्सों और दोनों ओर की धुंध की चादर ने आँख झपकने भी न दी। सवेरा पंचाचूली के सामने हुआ। सामने सोने से मढे पर्वत शिखर थे। ईश्वर ने ये सुख दिखाकर मुझे शिकायत करने के सब अधिकार ले लिए। मुनस्यारी से लौटते पताल भैरव गए। गुफा में ब्रह्माण्ड बसा है , जब जाईयेगा तभी समझ पाएंगे कि ऐरावत के पैर और कल्प वृक्ष की जड़ें वहां क्या कर रही हैं। 

लौट के अल्मोड़ा और अल्मोड़ा से लौटते हुए कैंची धाम रुकी। बाबा नीम करोरी के दर्शन और अध्यात्म के उस अनुभव के बिना ये सफर अधूरा रहता। 

काठगोदाम से लौटते  हुए लगा कि मेरी रूह वहीं रह गयी है बस अब जिस्म को ढो रही हूँ । देवभूमि में मेरे प्राण बसे हैं , मुझे वहीं लौट जाना है……कभी ,कहीं ,किसी रोज़ एक बार फिर हमेशा के लिए किसी जंगल में गुम जाने के लिए। 

बातें और भी हैं यादें भी अनगिनित है। फिर किसी दिन मिल बैठेंगे तो याद करेंगे कि रानीखेत के गोल्फ के मैदान और चौबटिया के आगे चिरियानौला का वो अंग्रेजों का मंदिर कितना ख़ास है। लौटने की वजह यादें और बतियाने के लिए बस बहाना चाहिए ! है ना ....... 

Saturday, 7 November 2015

ये डिजिटल बलात्कार का युग है। असंख्य भैरवियां हैं जिनके पीछे कुत्सित मानसिकता दौड़ रही है.……

अजब समाज है अजब संस्कार हैं हमारे। बचपन इसी संस्कार के साथ बीता कि आसपास का हर बुजुर्ग परिवार का बुजुर्ग और हर बच्चा परिवार के बच्चे के समान ही स्नेह का अधिकारी है। आंटी कहने का  रिवाज आज भी दूरदराज में नहीं है ,मौसी ,बुआ ,चाची ,ताई …इन्हीं सम्बोधनों के बीच उम्र बीत गयी।

सोशल मीडिया ने सिखाया कि आंटी और मौसी वो उम्रदराज महिला जिसका चरित्रहनन आप जायज तरीके से नहीं कर पा रहे हैं तो इन सम्बोधनों से कर लें और अधिक साहसी हैं तो रं… ,वेश्या , माँ -बहन की गालियां और ठरक की ऊर्जा से पैदा हुए भतेरे क्रियात्मक शब्द हैं जिनका उपयोग आप समय के अनुसार कर सकते हैं। 

ये किस तरह की संताने हैं जो अपनी माँ -बहन -भाभी के हाथों से बना खाना खाकर ,उनका दुलार पाकर ,पत्नी -प्रेयसी के स्नेह के आँचल से एक क्षण में दूर हो , दूसरी महिला के चरित्र को बेच देना अपना परमधर्म समझते  हैं । नैतिकता के ये ठेकेदार एक पल भी ये नहीं सोचते कि वे जिस पर उंगली  उठा रहे हैं वे भी किसी रिश्ते में बंधी हैं , किसी सूत्र से वे आपसे भी एक प्रेम का रिश्ता रखती हैं।  क्यों आप हर उस स्त्री को नहीं झेल पाते जो आपकी अपेक्षाओं और आपके नैतिक मानदंडों पर खरी नहीं उतरती ? 

कितने ही ऐसे पुरुष हैं जो घर के बाहर सम्पर्क में आने वाली महिलाओं के साहस का सम्मान करते हैं लेकिन घर की महिलाओं के साहस को दुस्साहस करार देते हैं। कुछ ऐसे भी देखे हैं जो अपनी बेटी की आज़ादी के लिए लड़े लेकिन पत्नी ताउम्र उन्हीं अधिकारों के लिए उनका मुहं ताकती रही.…… विडंबनाओं से भरपूर समाज है ये !

अनुपम खेर आज असहिष्णुता की बात को लेकर मार्च करने निकले , अच्छा है। उनके मार्च को लेकर वे सभी रचनाकार सहिष्णु हैं जिन्होंने सत्ता के गलत निर्णयों के प्रति असहिष्णुता दिखायी। इसी मार्च में एक महिला पत्रकार के पीछे भीड़ दौड़ी। ये कहती हुई कि वो वेश्या है ……  कमाल है ना ! दौड़े भी वही लोग होंगे जो दिन रात संस्कारों की दुहाई देते हैं। गाय को माँ न मानने वालों की भर्त्सना करते हैं और असल जिंदगी में एक महिला की कोख को गाली  देते हैं। 

इस समाज में असंख्य भैरवियां हैं जिनके पीछे कुत्सित मानसिकता दौड़ रही है। सोशल मीडिया पर रोज इन भैरवियों के साथ मानसिक बलात्कार होता है ,रोज इनका चीरहरण होता है। 

आप इतना विचलित न होईये।  ये समाज अब मोमबत्ती जलाने का अभ्यास कर चुका है…… सत्ता ने स्वार्थ के ऐसे बीज बोये हैं कि अब आँगन में चिरैया नहीं वेश्याएं जनी जा रही हैं। 

सहते रहिये -देखते रहिये , लपट आपके आँगन तक नहीं आएगी ,मुग़ालते मुबारक रखिये !

चलते हैं ! हम अपनी जिंदगी जी चुके हैं ,बहुत देख -सुन चुके ,अब इन सब का असर नहीं होता नहीं कहती लेकिन अब उतना विचलित भी नहीं होती ,जितना कभी सुन भर के रो लेती थी। 

वक्त सबको सब दिखा रहा है , सब सिखा रहा है।  मैं भी सीख रही हूँ…… पर अब खुश हूँ कि शायद बेअसर सी हो गयी हूँ !

Friday, 23 October 2015

बस मैं और मेरी आवारगी बाकी होंगे और निशां कुछ नहीं …

सबकुछ अपनी गति से चलता रहता है तभी एकाएक मन उचाट हो जाता है ……अक्सर हो जाता है।  खुद को फिट नहीं कर पाता है या खुद को ढूंढ नहीं पाता।  मैं गुम सी गयी हूँ , अक्सर भाग कर किसी पहाड़ ,किसी झील और जंगल का रुख करने का ख्याल इतनी तेजी से उठता है कि लगता है बस ये आखिरी पल है इस झाड़ से जीवन के।

प्रकृति से दूर का असहज जीवन कितना कठिन है …… असहज हंसी ,असहज बातें ,असहज इच्छाएं। दूर नीले आसमान के नीचे पसरी किसी नदी या झील का ख्याल भी आ जाये तो मन में लहरों की किलोल सुनायी देने लगती है , सब कांच सा दिखने लगता है। कदमों में पडी रवायतों की जंजीरें तोड़ भाग जाने के मन करता है।  विद्रोह कर देता है उस जीवन को जीने के लिए जहाँ मैं मैं न रहूँ ....... प्रकृति में एकाकार हो जाऊं।

जागेश्वर, अल्मोड़ा के जंगल ख्यालों में बसे हैं।  महावतार बाबा की तप वाली गुफा देखने का मन है ,उन पगडंडियों को नापने के लिए बैचेन हो उठती हूँ जो मुझे उस जंगल में गुम कर दें। स्वप्न भी अब वहीं ले जाते हैं …… नीम करोरी बाबा के धाम गयी थी ! दो बार हो आयी हूँ ……… तमाम अश्रु वहीं के लिए सिंचित रहते हैं। सब उस खाली ,शांत कुटिया में समा जाते हैं और मन एक बार फिर से खाली बर्तन बन जाता है।

अध्यात्म के आगे और उसकी दिशा में जाने के लिए कितने झंझावातों से गुज़रना होता होगा ,नहीं पता लेकिन ये यात्रा अभिभूत कर देने वाली है। किसी तप से कतई कम नहीं है।

सब जी लिया , सब जान लिया पर दूसरे ही पल कोई कान में फुसफुसा जाता है कि अभी कुछ नहीं देखा !

मैं लौट जाना चाहती हूँ.…… आवारगी के इस सफर में झील ,जंगल और पहाड़ के अलावा कुछ न हो ,कुछ भी नहीं !! तुम भी नहीं .......

अकेले निकल चला है मन ....... बस मैं और मेरी आवारगी बाकी होंगे और निशां कुछ नहीं !