Wednesday, 25 November 2015

दर्द जब रूह से आज़ाद हुआ जाता है तो नफ़रत किससे करूँ...........

एक वक्त आता है जब लगता है कि सब हिसाब बराबर हो जाना चाहिए ,कभी जिंदगी बेहिसाब हो जाती है। कभी नफ़रतों का दौर, कभी मोहब्बत का दौर........ बेहिसाब कभी मैं -कभी वक्त की दरियादिली। वक्त की ईमानदारी ये कि कभी कोई मिला ही नहीं जिससे बेहिसाब नफरत करूँ , चाहती हूँ कि क्यों न करूँ पर चाह कर भी नहीं कर पाती किसी से भी नहीं।

जख़्म पक कर रिसने लगे हैं , काँटा जिस्म से खींच कर लाख निकाल दिया जाये लेकिन वो मंज़र अक्सर दीवारों से परछाई बन उतर आते हैं। हाथ अनचाहे ही उस दर्द को महसूस करता है जिसने वक्त को नासूर बना सफ़र की रूह पर सजा दिया। 

सजा भोगने के लिए कितने जन्म लेने होते हैं कौन जाने ,लेकिन किसी एक जन्म में दर्द का जलजला भी कितने जन्मों की खुशियां बहा ले जाता है। 
जिसे कभी कोई ऐसा मिला ही ना हो जिसने छला हो उसे कोई एक छल का पल मिल जाए तो नई परिभाषा समझने के लिए नया जन्म ही लेना होता है। जन्म भी ऐसा  मनो इंसान के बीच फ़िल्टर लगा के देखने की मजबूरी बन जाए। 

हादसे कम नहीं होते दुनिया में ,हर रोज लोग दो चार होते होंगे ,किसी रोज़ तमाशा बन जाओगे तो पूछना खुद से किस को हादसे में धकेल आये थे। दर्द की प्रतिक्रिया में दर्द ही नसीब होना होता है। 
बोझ कभी उतरता कभी चढ़ता है , बोझ भी कर्ज है..... जन्मों की लेनदारी -देनदारी रही होती है। इसे भी उतरना होगा। 

आवारगी ने कितने ही मंज़र देख लिए ,अब रंगों में बस आसमान बसता है। किसी की गीत की धुन पर रंग भी उसी आसमान से बरसने लगते हैं। पल जादू से गुज़र रहे हैं। होने न होने में फ़ासला न रहा है , दर्द जब रूह से आज़ाद हुआ जाता है तो नफ़रत किससे करूँ। 

ऐसी ही रह जाना चाहती हूँ ,अब थम जाना चाहती हूँ .......  आवारगी के अपने सफर में अपने खुश ख्याल सपनों के साथ , सात समंदर पार बसे अपने वजूद के साथ मोहब्बतों के दौर में ही दफन हो जाऊं किसी रोज़। 

हिसाब सब यहीं पूरा होना है ...... हादसा हूँ तो भुलाना भी नामुमकिन है ,वक्त मेरे होने की गवाही हर मोड़ पर देगा। नासूर भी भर जाएगा बाकि बस निशां होंगे। सफ़र उस निशां से होकर गुज़रेगा ,यही नियति है सो चलते रहिये ........ हादसों से बचना लेकिन हों तो उस टीस के साथ उन चीखों को याद करना जो उन दीवारों में आज भी कैद हैं।

ये दौर ऐसा जब देने को कोई दुआ भी नहीं .....  बाकि नसीब में तो जो है सो हइये ही। 





Saturday, 21 November 2015

उत्तराखंड का वो एक सफर यादगार सफर था ….

जिंदगी कि मारामारी में कुछ पल सूकूँ के मिल जाएँ ,किसे तलाश नहीं होती। मरीचिका सा सुकून मृग सी मेरी तृष्णा ……भटकते -भटकते उत्तराखंड ले आयी। कारण कुछ भी बने हों पर इस तलाश में उन जगहों को ढूंढ पायी जो अक्सर तस्वीरों और ख्वाबों में देखे थे। 

सालों पहले अल्मोड़ा से इस सफ़र की शुरुआत की थी। रेत के टीलों से पहाड़ों तक का सफ़र इस कदर सुहाना होगा कभी सोचा नहीं था। काठगोदाम से उतर कर लोकल बस पकड़ी , जो लोकल सवारियों से ठसाठस भरी थी। पता चला कि कुछ कॉलेज में पढ़ने हल्द्वानी से नैनीताल और कुछ अल्मोड़ा  जा रहे हैं तो कुछ रोजमर्रा की जरूरतों का सामान लेने पहाड़ से नीचे उतरे थे। भाषा समझ नहीं आ रही थी पर उनको हिन्दी भी आती थी। गोल गोल चक्कर खाती बस में आगे बैठ कर लगता रहा कि ये अंतिम सफर न हो। नीचे झांक कर देखा तो लगा कि ईश्वर मेरे पास बैठा है। 

अल्मोड़ा के एस एस जे विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में एक माह रुकी थी। उस प्रवास ने समझा दिया कि पहाड़ कि जिंदगी उतनी सरल भी नहीं जितनी कि दिखाई देती है। सब्जियों की उतनी वैरायटी नहीं , मनोरंजन के लिए ढेरों मॉल और शॉपिंग कॉम्लेक्स भी नहीं लेकिन सुख इतना मनो इनमें से किसी की कोई जरूरत भी नहीं। लोकल कन्वेंस भी आसान नहीं , सब शार्ट कट इस पहाड़ से उतरो उस पर चढ़ जाओ। बेहद आसान सी लगने वाली चढ़ाई मुश्किल लगी लेकिन कुछ दिन बाद उसी ने शरीर की पुरानी सभी शिकायतों को दूर भी कर दिया। 

एक सुबह दोस्तों ने बताया कि कुछ दूर एक मंदिर है चाहो तो चलो। घर से निकली थी तो माँ ने बताया था कि अल्मोड़ा के जंगलों में सुमित्रा नंदन पंत की रचनाएँ बसती हैं। मैं कभी पंत को सुनती कभी साथियों के कुमाऊंनी -गढ़वाली गीतों को। गोलू देवता का मंदिर है ये , असंख्य चिट्ठियां लटकी थी। किसी ने बताया कि ये सबकी सुनते हैं। मैंने कोई पाती नहीं लिखी ,पता नहीं क्यों। हमारी श्रद्धा का प्रवाह कितना निर्मल है ना ....

इसी रास्ते से कुछ और आगे बढ़ते गए तो जंगल मंत्र मुग्ध करता जा रहा था। मैं उन गुफाओं कंदराओं में महावतार बाबाजी और योगानंद जी की कहानियां ढूंढती तो कभी शिव लीला की कल्पना में खो जाती। देवदार के जंगल नहीं थे वो किसी दूसरी ही दुनिया का पता हैं। जागेश्वर मंदिर के  उस समूह में रहा महाकाल और कुबेर का वो मंदिर मेरी स्मृतियों में आज भी जस का तस है। 

जागेश्वर के उसी रास्ते से कुछ दिन बात मुनस्यारी ,पिथौरागढ़ भी जाना हुआ। सड़क किनारे के जंगल ,खेत ,पहाड़ों से गिरते झरने , भेड़ों के झुण्ड सब कुछ कांच जैसा साफ़। मुनस्यारी के रास्ते की चढ़ाई ने दम जरूर निकाल दिया लेकिन आल्टो चलाने वाले भैया के लोकल किस्सों और दोनों ओर की धुंध की चादर ने आँख झपकने भी न दी। सवेरा पंचाचूली के सामने हुआ। सामने सोने से मढे पर्वत शिखर थे। ईश्वर ने ये सुख दिखाकर मुझे शिकायत करने के सब अधिकार ले लिए। मुनस्यारी से लौटते पताल भैरव गए। गुफा में ब्रह्माण्ड बसा है , जब जाईयेगा तभी समझ पाएंगे कि ऐरावत के पैर और कल्प वृक्ष की जड़ें वहां क्या कर रही हैं। 

लौट के अल्मोड़ा और अल्मोड़ा से लौटते हुए कैंची धाम रुकी। बाबा नीम करोरी के दर्शन और अध्यात्म के उस अनुभव के बिना ये सफर अधूरा रहता। 

काठगोदाम से लौटते  हुए लगा कि मेरी रूह वहीं रह गयी है बस अब जिस्म को ढो रही हूँ । देवभूमि में मेरे प्राण बसे हैं , मुझे वहीं लौट जाना है……कभी ,कहीं ,किसी रोज़ एक बार फिर हमेशा के लिए किसी जंगल में गुम जाने के लिए। 

बातें और भी हैं यादें भी अनगिनित है। फिर किसी दिन मिल बैठेंगे तो याद करेंगे कि रानीखेत के गोल्फ के मैदान और चौबटिया के आगे चिरियानौला का वो अंग्रेजों का मंदिर कितना ख़ास है। लौटने की वजह यादें और बतियाने के लिए बस बहाना चाहिए ! है ना ....... 

Saturday, 7 November 2015

ये डिजिटल बलात्कार का युग है। असंख्य भैरवियां हैं जिनके पीछे कुत्सित मानसिकता दौड़ रही है.……

अजब समाज है अजब संस्कार हैं हमारे। बचपन इसी संस्कार के साथ बीता कि आसपास का हर बुजुर्ग परिवार का बुजुर्ग और हर बच्चा परिवार के बच्चे के समान ही स्नेह का अधिकारी है। आंटी कहने का  रिवाज आज भी दूरदराज में नहीं है ,मौसी ,बुआ ,चाची ,ताई …इन्हीं सम्बोधनों के बीच उम्र बीत गयी।

सोशल मीडिया ने सिखाया कि आंटी और मौसी वो उम्रदराज महिला जिसका चरित्रहनन आप जायज तरीके से नहीं कर पा रहे हैं तो इन सम्बोधनों से कर लें और अधिक साहसी हैं तो रं… ,वेश्या , माँ -बहन की गालियां और ठरक की ऊर्जा से पैदा हुए भतेरे क्रियात्मक शब्द हैं जिनका उपयोग आप समय के अनुसार कर सकते हैं। 

ये किस तरह की संताने हैं जो अपनी माँ -बहन -भाभी के हाथों से बना खाना खाकर ,उनका दुलार पाकर ,पत्नी -प्रेयसी के स्नेह के आँचल से एक क्षण में दूर हो , दूसरी महिला के चरित्र को बेच देना अपना परमधर्म समझते  हैं । नैतिकता के ये ठेकेदार एक पल भी ये नहीं सोचते कि वे जिस पर उंगली  उठा रहे हैं वे भी किसी रिश्ते में बंधी हैं , किसी सूत्र से वे आपसे भी एक प्रेम का रिश्ता रखती हैं।  क्यों आप हर उस स्त्री को नहीं झेल पाते जो आपकी अपेक्षाओं और आपके नैतिक मानदंडों पर खरी नहीं उतरती ? 

कितने ही ऐसे पुरुष हैं जो घर के बाहर सम्पर्क में आने वाली महिलाओं के साहस का सम्मान करते हैं लेकिन घर की महिलाओं के साहस को दुस्साहस करार देते हैं। कुछ ऐसे भी देखे हैं जो अपनी बेटी की आज़ादी के लिए लड़े लेकिन पत्नी ताउम्र उन्हीं अधिकारों के लिए उनका मुहं ताकती रही.…… विडंबनाओं से भरपूर समाज है ये !

अनुपम खेर आज असहिष्णुता की बात को लेकर मार्च करने निकले , अच्छा है। उनके मार्च को लेकर वे सभी रचनाकार सहिष्णु हैं जिन्होंने सत्ता के गलत निर्णयों के प्रति असहिष्णुता दिखायी। इसी मार्च में एक महिला पत्रकार के पीछे भीड़ दौड़ी। ये कहती हुई कि वो वेश्या है ……  कमाल है ना ! दौड़े भी वही लोग होंगे जो दिन रात संस्कारों की दुहाई देते हैं। गाय को माँ न मानने वालों की भर्त्सना करते हैं और असल जिंदगी में एक महिला की कोख को गाली  देते हैं। 

इस समाज में असंख्य भैरवियां हैं जिनके पीछे कुत्सित मानसिकता दौड़ रही है। सोशल मीडिया पर रोज इन भैरवियों के साथ मानसिक बलात्कार होता है ,रोज इनका चीरहरण होता है। 

आप इतना विचलित न होईये।  ये समाज अब मोमबत्ती जलाने का अभ्यास कर चुका है…… सत्ता ने स्वार्थ के ऐसे बीज बोये हैं कि अब आँगन में चिरैया नहीं वेश्याएं जनी जा रही हैं। 

सहते रहिये -देखते रहिये , लपट आपके आँगन तक नहीं आएगी ,मुग़ालते मुबारक रखिये !

चलते हैं ! हम अपनी जिंदगी जी चुके हैं ,बहुत देख -सुन चुके ,अब इन सब का असर नहीं होता नहीं कहती लेकिन अब उतना विचलित भी नहीं होती ,जितना कभी सुन भर के रो लेती थी। 

वक्त सबको सब दिखा रहा है , सब सिखा रहा है।  मैं भी सीख रही हूँ…… पर अब खुश हूँ कि शायद बेअसर सी हो गयी हूँ !

Friday, 23 October 2015

बस मैं और मेरी आवारगी बाकी होंगे और निशां कुछ नहीं …

सबकुछ अपनी गति से चलता रहता है तभी एकाएक मन उचाट हो जाता है ……अक्सर हो जाता है।  खुद को फिट नहीं कर पाता है या खुद को ढूंढ नहीं पाता।  मैं गुम सी गयी हूँ , अक्सर भाग कर किसी पहाड़ ,किसी झील और जंगल का रुख करने का ख्याल इतनी तेजी से उठता है कि लगता है बस ये आखिरी पल है इस झाड़ से जीवन के।

प्रकृति से दूर का असहज जीवन कितना कठिन है …… असहज हंसी ,असहज बातें ,असहज इच्छाएं। दूर नीले आसमान के नीचे पसरी किसी नदी या झील का ख्याल भी आ जाये तो मन में लहरों की किलोल सुनायी देने लगती है , सब कांच सा दिखने लगता है। कदमों में पडी रवायतों की जंजीरें तोड़ भाग जाने के मन करता है।  विद्रोह कर देता है उस जीवन को जीने के लिए जहाँ मैं मैं न रहूँ ....... प्रकृति में एकाकार हो जाऊं।

जागेश्वर, अल्मोड़ा के जंगल ख्यालों में बसे हैं।  महावतार बाबा की तप वाली गुफा देखने का मन है ,उन पगडंडियों को नापने के लिए बैचेन हो उठती हूँ जो मुझे उस जंगल में गुम कर दें। स्वप्न भी अब वहीं ले जाते हैं …… नीम करोरी बाबा के धाम गयी थी ! दो बार हो आयी हूँ ……… तमाम अश्रु वहीं के लिए सिंचित रहते हैं। सब उस खाली ,शांत कुटिया में समा जाते हैं और मन एक बार फिर से खाली बर्तन बन जाता है।

अध्यात्म के आगे और उसकी दिशा में जाने के लिए कितने झंझावातों से गुज़रना होता होगा ,नहीं पता लेकिन ये यात्रा अभिभूत कर देने वाली है। किसी तप से कतई कम नहीं है।

सब जी लिया , सब जान लिया पर दूसरे ही पल कोई कान में फुसफुसा जाता है कि अभी कुछ नहीं देखा !

मैं लौट जाना चाहती हूँ.…… आवारगी के इस सफर में झील ,जंगल और पहाड़ के अलावा कुछ न हो ,कुछ भी नहीं !! तुम भी नहीं .......

अकेले निकल चला है मन ....... बस मैं और मेरी आवारगी बाकी होंगे और निशां कुछ नहीं !

Thursday, 22 October 2015

आप सत्ता में हैं ,जवाब दें या षड्यंत्रों में उलझाये रखें आपकी मर्जी !

आजकल रातें कुछ जगी सी और दिन उनींदा सा गुज़र रहा है। कुछ है जो पीछा कर रहा है ,कुछ है जो पीछा छोड़ नहीं रहा है …मन उचाट सा है। खुद से दो -चार हो जाने का मन करता है तो कभी तमाम हथियार डाल घुटनों पर आ जाता है। समझाइश की भी सीमा होती है , कितना लड़िएगा खुद से और उस व्यवस्था से भी जिसमें सांस लेना आपकी नियति है।

मैं कुछ नहीं हूँ। एक पात्र ,एक सूत्रधार किसी कहानी की....... उस कहानी के सच ने मुझे राजनैतिक षड्यंत्रों के बीच ला पटका है। हर रोज नए ताने  बाने के साथ मुझ तक कोई फुसफुसाहट पहुंचाई जाती है मानो कि मैं उन सब पर भरोसा कर बैठूंगी। ये किस्से अब असर नहीं करते ,अब कोई सच असर नहीं कर रहा। 

ब्लॉग की एक मामूली सी पोस्ट ने समाज और राजनीति का जो चेहरा सामने ला के रखा है उसने भरम के कई जाले उतारे हैं। जो लोग संवेदनशीलता का स्वांग रचते हैं वे किस सीमा तक असंवेदनशील हैं ,अंदाजा भर लगाना मुश्किल है। मैंने वो लिखा जो मैंने जिया और उस सच का सामना किया जिसके लिए मैं खुद भी तैयार नहीं थी....... 

ये एक ऐसी लड़ाई बन गयी है जहाँ अब मेरा अपना जमीर ही दांव पर लग गया है। वे लोग जो सामजिक सरोकारों के बूते राजनैतिक ताकत बन के उभरे हैं वही सामाजिक यथार्थ के प्रमाण मांग रहे हैं ?
वही लोग चारों ओर पसरे सामजिक सच को निजी मसला बता कर अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं। जी करता है आसमान से प्रश्न पूछूँ कि मेरी पैदाइश और मेरा इस दुनिया में होना ही मेरा निजी मसला है तो फिर ये समाज मुझे मेरे हाल पर छोड़ क्यों नहीं देता ?

मेरा परिवार ,मेरा आचरण मेरे इर्दगिर्द की दुनिया में कहने के लिए सब निजी है पर ताकाझांकी की कोई भी सम्भावना समाज बाकि भी नहीं रखता। …… फिर सब सवाल निजी कैसे हुए ??

घर की चारदीवारी में कोई अपनी पत्नी को मारे या कोई पत्नी अपने पति के साथ बलात्कार करे तो उसे पारस्परिक मामला माना जाना चाहिए। दहेज दो परिवारों के बीच का मसला है , बेटी चाहिए या नहीं ये भी निजी मसला है तो इन सब मसलों पर किसी भी राजनैतिक दल को चुप्पी साधे  रखनी चाहिए। 

औरत की अस्मिता और बीफ के बवाल में कोई अंतर नहीं है। दोनों वोट और नोट की आंच पर खूब सेंके जाते रहे हैं। प्रश्न के बदले प्रश्न करना अब हमारी आदत है क्यूंकि उत्तर अब कोख से पैदा नहीं हो रहे हैं।  ये समाज अब केवल प्रश्न जन रहा है। उत्तर जानने  के लिए जन्म भर इंतज़ार कीजिए। 

मैं भी इंतज़ार में हूँ ....... आप सत्ता में हैं ,जवाब दें या षड्यंत्रों में उलझाये रखें आपकी मर्जी ! फर्क पड़ने की भी सीमा होती है। भावुकता और निज बनके जो सत्ता तक पहुंचे हैं वे वोट की राजनीति करने लगेंगे तो उन जड़ों को पोषण मिलना बंद हो जाएगा जिसके आधार पर ये पेड़ उगा है। 

हम सब सीख रहे हैं। आप भी सीख लीजिये ,नहीं सीखना चाहते तो भी कोई बात नहीं ,प्रकृति बख्शेगी किसी को नहीं। 
किसी मोड पर हम फिर मिलेंगे ,दुआ -सलाम फिर होगी।  मैं तब भी आपकी खैरियत ही चाहूंगी , रही नींद की सो कब तक न आयेगी। मन बेचैन जरूर है पर आपसे नाराज भी नहीं है ,किसी से भी नहीं !

Sunday, 18 October 2015

कद की कद्र में सबका फायदा होता है........

सुबह से फोन घनघनाने  लगा है , ट्वीटर पर DM भरा है ! सबका एक ही सवाल है " तुम्हारे पास कहाँ से आयी " …… मैं  हैरान हूँ कि कहाँ से आयी ? मैंने  किसी से माँगी नहीं ,मैं कहीं गयी नहीं  …… DM जरूर था ,मेल चेक करने का ,देख लिया सो मिल गयी !

ऐसा अक्सर होता है करने क्या निकलती  हूँ और मिलता क्या है। नेता जी के दरबार से मुलाक़ात भी कुछ ऐसी थी …… सम्मोहित करने वाली ! सबने ऐसे ही घेरा था , मने आत्मीयता ऐसी जैसे भूखे को भोजन मिला हो। वे खुश थे , सब खिल के मिले, लगा सब दिल से मिले …हम कई बार मिले हर बार और गर्मजोशी से मिले। सोचा कि दुनिया  इतनी बुरी भी ना है , पाया कि चेहरे सब अपने से हैं।

दरबार में सबका कोई कद होता है और कद की कद्र में सबका फायदा होता है। देख रहे थे कि सब कद के कायदे में कसीदे पढ़ रहे थे , कायदे की शान में कालीन बन बिछे थे। पीठ घूमते ही फुसफुसाहटों के सिलसिले और चेहरे सामने आते ही वाहवाही का सामान …… " यहाँ राजनीति नहीं परिवार सा है सब " ! हैरान भी थी और परेशान भी ,समझना भी नहीं चाहती थी  यूँ कि ख़्वाबों के महल के भरभराने की कल्पना ही सिहर भर देती है।

शाम फोन बजा " दी ,मैं बोल रहा हूँ …… कैसी हैं !"

बढ़िया !  सुनाईये कैसे याद किया....
कुछ बताना है , उसने कहा ! मैं हैरान थी कि इसे क्या कहना है ?
दी ,कुछ नाम और कुछ चेहरे और भी हैं आपकी कहानी में .......
मैं चुप थी।  ये सिलसिला खत्म क्यों नहीं हो रहा ? मैं कोई कहानी नहीं कहना चाहती थी ,मैं कुछ पाना -खोना नहीं चाहती थी ,मैं कोई लड़ाई नहीं लड़ना चाहती थी ..........  अब हर कोई अपने तथ्य ,अपने साक्ष्य मेरे बिना मांगे मुझे दे रहा है ! क्या रिश्ता है उनका मुझसे ? ये भरोसा अब सांस को भारी कर रहा है .......

कड़वे सच को परोसूं कैसे ? सब कोई नई व्यवस्था से जो दिल लगाये बैठे हैं उनको क्या बताऊँ कि ईमान और ईनाम में मामूली हेरफेर है लेकिन इस मासूमियत में कितनों के आस की इमारत खड़ी है।

उसने सब सुना दिया , सब भेज दिया ! अब ये सिलसिला सा हो गया है ,मनो मैं कोई मिशन पर हूँ जिसे लोग तीर -तमंचों से लैस कर रहे हैं।

मैंने कब ये सब चाहा था ! झील -जंगल और पखडंडी की दुनिया थी मेरी और मेरी चाह का अंतिम ठिकाना भी …… ये सब कौन तय कर रहा है ,पता नहीं !

मैं दरबार की उस हकीकत से मायूस हूँ। वो जो कह रहे हैं वो हैं नहीं ,जो वो हैं वो ,वो कहते नहीं ....... हर कोई रेवड़ी के इंतज़ार में क्यों लग गया है …… सबको ईनाम की तमन्ना है। सब अपनी मेहनत और ईमानदारी की कहानी सुना रहे हैं और सब कोई उसे भुना रहे हैं। कुछ अब भी आदर्शों और नैतिकता को पीठ पर लादे भटक रहे हैं।

मैं क्या सोच के निकली थी , मैं कहाँ आ गयी ! ऐसा भी क्या है कि अपनी ही सांसों पर अपना ही हक नहीं होता ? ये कौन इशारे हैं कुदरत के ?

दरबार से शिकायत नहीं पर अब सब पर तरस आता है।   किसी को नहीं पता कि दिन भर साये की तरह साथ रहने वाला आपकी साँसों का हिसाब किसी के DM किसी के मेल बॉक्स में पोस्ट कर आया है !

ये जिंदगी का दरबार बड़ा जालिम है दोस्तों ,अपने सारथी से भी संभल के रहिएगा ! रफ़्तार कहीं उड़ा न दे …… सबकी सलामती  की दुआ कीजे …… चलते हैं !

Thursday, 15 October 2015

न कोख उसकी न देह उसकी !……

चार -पांच दिन हुए आर टी आई की एक अर्जी आयी।  सूचना मांगने वाले ने किसी लड़की की साल 2000 में कॉलेज में नियमित छात्रा होने से संबंधित दस्तावेज मांगे थे …… आवेदन देख के समझ में आ रहा था कि कहीं कोई कानूनी पेच है जो ये सूचना माँगी गयी है !

तबियत ठीक नहीं थी ,कॉलेज नहीं गयी। फोन बजा की सूचना जल्दी चाहिए .... " क्या जल्दी है ?" कोर्ट में तारीख है ,जल्दी दें तो मेहरबानी होगी ! समझ आ गया कि मामला वही कुछ है …… कल दोपहर मिलियेगा , कह के फोन बंद कर दिया !

बहुत परेशान हूँ मैडम ! 498 कर दिया है , कई बार बंद हो आया हूँ ! वो तलाक नहीं दे रही है।
तो आप दे दें ? मैंने कहा।
वो बच्चा लौटा दे और 5 लाख के गहने लौटाए तो मैं दे दूँ।
वो बच्चा आपको क्यों दे ?
बच्चा मेरा है।
बच्चा तो उसका भी है ,मैंने कहा।
वो इन्द्राणी है , मैं आपको क्या बताऊँ ! बदचलन है …
ओह्ह्ह …… तो वो बच्चा आपका है ये आप कैसे कह सकते हैं ,छोड़ दीजिये ऐसी बदचलन औरत को !
नहीं , बच्चा तो मेरा ही है। हम 15 साल साथ रहे , बच्चा कैसे छोड़ दूँ !
आप करते क्या हैं ?
थर्ड ग्रेड टीचर की तैयारी !
वो ?
नर्स है।  बदचलन है , खराब है।
आप काम क्या करते हैं ?
उसको नौकरी कराई।
नौकरी कैसे कराई ?
नर्स थी ,पांच गांव लाता -ले जाता था।
मने ,ड्राइवर थे ?
नहीं , उसको साथ ले जाता था ,साथ लाता था ! वो बेकार औरत है।
कैसे ?
केरल की साथी नर्सों से बात करती थी।
अच्छा ,और…?
हंसती थी , सबके साथ बात करती थी !
ओह्ह !
वही समझाता था कि चुपचाप काम करो और घर आ जाओ ! दुनिया खराब है मैडम।
हम्म ,सो तो है पर आप अच्छे हैं  ?
वो बदचलन है !
आपने उसकी बदचलनी पकड़ी ?
नहीं ,मैं साथ रहता था ना , कैसे करती।
हम्म !
पर वो बेकार है।
अच्छा , तो अब क्या चाहिए ?
बच्चा और गहने।
क्या करोगे दोनों का ?
वो तो नाते जायेगी तो उसके पास तो और आ जायेंगे।
और बच्चा क्यों चाहिए ?
बुढ़ापे का सहारा चाहिए।
उसको भी तो चाहिए?
वो बेकार औरत है।
बच्चा कितने साल का है ?
8 साल का है।
15 साल बाद उसने या उसकी बहू ने आपके साथ रहने से मना कर दिया तो दूसरा मुकदमा फिर लड़ना पड़ेगा ?
ऐसा नहीं होगा।
कैसे पता ?
देख के लाऊंगा !
अभी नहीं देखा था ?
देखा था....... पर वो बेकार थी !!!

मैं अब चुप थी।  देख रही थी कि औरत के चरित्र को तराजू लेकर तोलने का ठेका क्या सब कोख से  ले कर आये हैं ! उसकी साँस -सांस पर पहरेदारी पर भी वही बदचलन।  जिस दिन पति के साथ नहीं रहने या किसी और के साथ संबंध रखने का निर्णय ले लिया तो समाज पर पहाड़ टूट पड़ेगा।

न  कोख उसकी न देह उसकी !

सूचना का अधिकार आपको सूचना का वैधानिक हकदार  बना रहा है ! आईये , वर्तमान तो आपका है ही ,भूत और भविष्य भी आपको सौंप दे रहे हैं ........

वाह री नियति ? जन्नत सी कोख के साथ पहाड़ सी लज्जा काहे दे दी ?

प्रश्नों का अंतहीन सिलसिला है। बेमियादी सज़ा सी जिंदगी बना देता है ये समाज …… गाना याद आ गया " ओ री कठपुतली गोरी कौन संग बांधी डोर ....... "

ये पर्दा भी गिरेगा किसी रोज जब अंगना से चिरइया फुर्र हो जाएगी ....... सफर कब थमता है ! कभी इस खूंटे कभी उस खूंटे !

रवायतों ने खुशियों पर पहरेदार बिठा रखे हैं …मन पाखी साथी ढूंढता है ,समाज चौकीदार ढूंढ के देता है ! अजब नज़ारे देखें हैं मेरी आवारगी ने !

आप भी देखिये ,और सोचिये कि आपके आसपास कितने चौकीदार हैं ! हम चलते हैं ……