Thursday, 16 December 2021

सच को सब मालूम है पर सच की सुनेगा कौन ? सच की गवाही कौन देगा ? सच के चेहरे की लकीरों को कौन पढ़ेगा ?

आदमी हजार बार मरता है और  जो कहता है कि जी रहा है, तो झूठ कहता है. उसका ये कौनसा जनम  है ,वो खुद नहीं जानता ! मुखौटे लेकर सच की दुहाई देते लोगों के बीच , झूठ की फसल को सींचते लोग , दिन ब दिन बदलते , बहलाते ,खुद को फुसलाते लोग......... जिन्दा हैं क्या ? 

तुमको अच्छा लगता होगा , चमके -उजले -दमकते चेहरों से उतरते रंगों का दरिया , बातों में जमीर घोल कर पीने -पिलाने का चलन , अच्छा है ! सब अच्छा है ! सबको अच्छा कहते रहना भी अच्छा है | 

अच्छा तो है ही ये सब, पर जब मर ही जाना है एक दिन सबने तो फिर किसके लिए इतने स्वांग रचने हैं ?  सबको सबका सच पता है ! कितना हासिल हो जाएगा ,कितना संग ले जायेगा कोई....  

बेवज़ह अब कुछ नहीं होता , वजह सरकारी होती हैं , कुछ भी ढूंढने से ज्यादा , क्या वजह बतायी जाए ,यही ध्यान रखना जरूरी है  ! नकली मुस्कुराहट चस्पा कर लोग कोई अपना सा ढूंढ रहे हैं ,अपना कह देने भर को मर रहे हैं ? क्या मंज़र है , लाशों के इस ढेर में सबको किसी से प्यार करना है ,सबको खुद से मुलाकत करनी है ? 

कितनी लाचारगी ,कितनी बेचारगी है...... सच जानते हुए भी इस स्वांग का हिस्सा सबको बनना है  | 

इस खेल में हंसना ,रोना ,गाना -बजाना सब होगा |  बस जिस रोज़ सच विदा होगा , असल खेल उसी दिन होगा !!

आंसुओं से आईने को पिघलते देखा है क्या आपने ? 

ये उस दिन देखना ........देखना कि झूठ की भी रस्मअदायदगी होती है , उसकी भी सवारी निकलती है | लोग तख्त पर बिठाते हैं , जयकारे होते हैं , शहर में मुनादी होती है कि झूठ अब गद्दी पर बिठाया जायेगा ,झूठ अब शासन संभालेगा | 

सच को सब मालूम है पर सच की सुनेगा कौन ? सच की गवाही कौन देगा ? सच के  चेहरे की लकीरों को पढ़ेगा कौन  ? 

इस तरह हजार झूठ के बीच जीते हुए मर जाने की कल्पना कीजिये और फिर हर जन्म में फिर इन्हीं के बीच ,इन्हीं आवाज़ों के बीच खुद को देखिए ...... क्या लगता है , फिर लौटना चाहेंगे ? फिर से उसी शहद से पगी खंजर सी जुबान से खुद को आज़ाद कर सकेंगे ? 

सीने में कुछ धंसता है ये सब देख के , बहुत गहरा सा........ किरचे सा झूठ है पर जन्मों का घाव है !

हर कोई कोशिश कर रहा है  , झूठ के महल को सपनों सा सच देखूं , कोई परिकथा सा खेल जानूं ,उसे अमराई की गोद में खेलती धूप -छाहँ देखूं...... 

मैं भी हैरान हूँ कि सच को सच देखूं या  झूठ के तिलिस्म को अपना ठिकाना मानूँ ? 

एक कलम लेकर उसे तोड़ दो .... बात खत्म हो जायेगी ! 

अपने हिस्से का सच वहीं तक रह जाएगा , उसके सच उसके साथ रह जायेंगे.........

वक़्त फैसला करेगा कि कलम लाना सच था या कलम तोड़ देने से सच को झूठ लिख सकने की संभावना को खत्म कर देना ही सच था ? 

सच तो ये है कि सच कुछ होता नहीं ,झूठ कुछ है नहीं | सबको गुड्डे -गुड्डी ब्याहने हैं और बिदा कर देने हैं | 

आप भी खेलते रहिये , हमने भी खेल लिया !!

जय राम जी की ! 

Wednesday, 15 December 2021

एक दिन ऐसे ही सब कहा - सुना धरा रह जाएगा। ........

मन किसी बिगड़ैल बच्चे सा है , जिद करता है कभी रूठता कभी मानता कभी मनाने बैठ जाता है !! बात बात पर पसरने की उसकी आदत जाती नहीं है |  संसार की अपनी गति है ,अपनी सी आदते हैं और मन की अपनी .. किसी पल लठैत बन कर उसके सिर पर सवार हो जाओ तो उस घड़ी दो घड़ी गर्दन लटका काट बैठ जाता है जैसे ही अक्ल ने मुहं फेरा वो फिर से कहीं और निकल जाता है.... दिन भर इस गली उस गली भटकेगा फिर कहेगा कि पाँव दर्द कर रहे हैं , जब समझाया तब मानेगा नहीं | ऐसा कैसे चलेगा ?
एक रोज़ चोट खा बैठा , इतना खून बहा कि कोई दवा काम न आयी न अस्पताल खाली मिले ......... अच्छा ही हुआ , अपने आप घाव भरा ,अपने आप लड़ने की सीख ले ली |

नहीं सीखा उसने, तो वो था सम्भलना ..... 

सम्भलने के लिए साथ भी कोई दे तो कितना दे ?
चलना उसे खुद है , चलानी भी उसे अपनी ही है...ड़र लगता है पर उसे रोक नहीं सकती ,उसे बाँध के रखना भी मुनासिब नही ना ?

फिर मन को ये आज़ादी भी मैंने ही दी है ,मन को उड़ान का हौसला भी मैंने दिया फिर मैं ही उसे लेकर असमंजस में आती भी हूँ !! 
ये भरोसा है कि वो सही राह चलेगा फिर अगले ही पल लगता है, ये मेरा अति आत्मविश्वास है .. भटकते देखा है उसे मैंने कई बार !
 
ये शंका भी जायज़ है ,हर बार उसको लौटा लाना थका देता है ,वो हर बार उसी ऊर्जा से दौड़ पड़ता है  ! तारों की छाहँ में उसे नींद नहीं आती , दिन में उसे चैन नहीं  ? 

ये खेल बढ़ता ही जा रहा है | क्या मैं उसके थक जाने का इंतज़ार कर रही हूँ ? क्या मैं उसे मर जाने देना चाहती हूँ ? क्या मुझे उसका साथ पसंद नहीं ..... ऐसे तमाम सवालों के अनगिनित जवाब है और उन जवाबों से उपजे अनगिनित सवाल। जब सवाल भी अपने हों और जवाब भी अपने तो क्या और किसे क्या-क्या सुनाना है.......

एक दिन ऐसे ही सब कहा - सुना धरा रह जाएगा , सब तरफ का शोर थम जाएगा | उस दिन न मन होगा न मन का होगा  .... तब सब वही होगा जो तमाम उम्र होना चाहिए था , शांत और दृष्टा भाव......... उस नीरवता में जोर से हंसना चाहूंगी अपनी मूर्खताओं पर ,अपने पछ्तावों पर ,अपनी ध्रष्टताओं पर ,खुद को झिझोड़ के जगा देने का वक़्त चाहिए | 
तो .....अब उस सफर का रुख करना चाहिए जो भीतर ले जाए , अब उस मोड़ को छोड़ देना चाहिए जो फिर फिर बुलाता ,लुभाता और बरगलाता है, भटक जाने को........ अब नहीं जाना , अब लौटना मुमकिन नहीं है ये मन को समझना होगा वरना वापसी होगी नहीं , मंजिल मिलेगी नहीं ,रास्ते साथ देंगे नहीं ... कब तक ,कहाँ तक ले जाये ये रेत का सागर कौन जाने .... मन की मरीचिका का हासिल कुछ नहीं। फिर खुद को भरमाना भी क्या ? अबुझी प्यास से मरना तो नियति नहीं मेरी ?

 !!
सफर मन से मन का ही हो | बाहर निकल कर जाएंगे तो धूल ,धक्के ,शोर और बदहवासी की सिवा कुछ हासिल नहीं , जो हासिल हुआ भी तो तन मैला , मन खाली ही जायेगा !

सो मन से बतिआइये , उसे खुद में लौटा लाईये !

Tuesday, 30 November 2021

पापा बगीचे के वो हरे भरे दरख्त थे जिसकी हर डाल पर बचपन पसरा था ....

आज फिर नींद नहीं आयी | अब नींद का नहीं आना ,आकर लौट जाना या आते हुए भी न आने सा महसूस होना सामान्य सी बात हो गई है | मैं अवसाद में नहीं हूँ ,ये यकीन दिलाते रहना और सहज बने रहने के लिए जूझते रहना ,आदत में शुमार हो गया है | नींद से दोस्ती हमेशा से बहुत अच्छी नहीं रही लेकिन साल 2021 ,अप्रेल-मई-जून के महीनों के कोरोना युद्ध ने उसे और बेमना कर दिया |

सच कहूं तो इस सब को लिखने से भागती रही मैं.. नहीं लिखना चाहती थी ,नहीं चाहती थी कि कोई और उस दर्द का सहभागी बने ,नहीं चाहती थी कि वो काली रातें ,स्याह दिन फिर -फिर आँखों के सामने से गुजरें लेकिन छः महीने बीत जाने पर भी वो टीस रह -रह कर उठती है ,जख्म फिर हरे हो जाते हैं | नींद फिर आँखों से दूर हो जाती है | इस कमरे से उस कमरे में , कभी भीतर -कभी बाहर भागते हुए सुबह हो जाती है | रात डराती है , डर से गुजर जाने पर भी डर लगना अजीब है | ये शायद डर नहीं है ,ये मलाल है कि पापा को उनके हिस्से की ऑक्सीजन ,उनके हिस्से की साँसे मैं उनको हजार कोशिशों के बाद भी न दे सकी | 

उनके जाने के बहाने हो सकते हैं लेकिन उनके न होने के बहानों से दिल राजी नहीं होता | सब तर्क -वितर्क ,ज्ञान का हर पन्ना वो खिलौना लगता है जिसे देख कर भी उठाने का मन नहीं करता | 

पापा को उम्मीद नहीं थी कि वो पॉजिटिव आ सकते हैं ,डर जरूर था उनके मन में | जिसका मन सिर्फ उसके बगीचे में लगता हो वो आईसोलेशन में कैसे रहते ? फिर भी उन्होंने कोशिश की , वो फिर भी बिना सहारे मुकाबला करते रहे | खुद चल कर पहला सीटी स्कैन करवाया , खुद चलकर अप्रेल की 23 तारीख को आईसीयू के बिस्तर तक पहुंचे | दिन में उनको वहाँ छोड़ा , रात तक वे घबरा गए | पास के मरीज से फोन करवाया ,सामने बैड पर कोई आखिर साँसे ले रहा था | उनको मोबाईल पसंद नहीं था ,चलाना सीखा नहीं | माँ के बिना रह नहीं सकते थे , बगीचा भी साथ नहीं था | डाक्टर वार्ड में रहने से मना कर रहा था | हम भाई -बहन उन्हें समझा -बुझा के लौट आए | सुबह फिर जिद कर ली ,घर लौटने की | कैसे लौटा लाती ? पापा भर्ती हुए उसके तीसरे दिन छोटे भाई की सांस भारी होने लगी | वो घर पर ऑक्सीजन सपोर्ट पर था ,पापा अस्पताल में | मैं 103 बुखार में, डॉक्टर को रेमेडेसीवर समेत जो चढ़ना था ,चढ़ता .. हाथ में कैनूला लगा रहता .. सुबह पापा के पास भागती , पापा बिटिया को बुलाया दो कि जिद किये रहते थे ! उनको बिठाना ,स्पंज करना ,मालिश करना , खिलाना.. 

वार्ड में किसी को पानी पिलाना ,किसी आंटी को बाथरूम तक ले जाना ,किसी को खिलाना .. सब किया ,सबको  उम्मीद रहती थी कि बिटिया आएगी .. पापा के पास वाले बैड पर एक भाई जिसे तीन दिन तक संभाला ,सामने हाथ जोड़ कर चला गया , कोई अपने घरवालों को पुकारते चले गए  .. प्यार भरे स्पर्शों को प्लास्टिक के बैग में सिमटते देखा मैंने  .. 

दोपहर फिर घर लौटना भाई के लिए सिलेंडरों का इंतजाम करना फिर वापिस पापा के पास लौटना.. रात फिर से घर के आईसी यू में खुद को भर्ती करना , बाल्टी भर दवाओं के डिब्बे .. एक पलंग पर भाई ,एक पर मैं !! रातभर भाई खांसी से सो नहीं पाता था | माँ को कह सुन के सुला देती थी | वे भी सहमी सी हिम्मत दिखाती रहीं | भतीजा सिलेंडर के इंतजाम के लिए रात भर लाईनों में लगा रहता.. सुबह हो जाती !! 

एक रोज अस्पताल के वार्ड के बाहर चर्चा सुनी कि जो ऑक्सीजन लाइन आईसी यू में या रही है उसमें ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम है | सुनते ही अंदर भागी तो समझ आया कि अपने पेशेंट के लिए घरवाले सिलेंडरों का इंतजाम कर रहे हैं | 

जिंदगी में पहली बार खुद को इतना निराश ,इतना हताश पाया | सिलेंडर कहाँ से लाऊँ ? दोस्तों -शुभचिंतकों की मदद से 21 सिलेंडर इकट्ठे किये 15 दिनों में , भाई और पापा दोनों को उसकी जरूरत थी .. सिलेंडर भरवाना हर रात संजीवनी लाने से कम न था | इस बीच पापा को ब्रेन स्ट्रोक आ गया | एक हिस्सा काम नहीं कर रहा था ,नजर आना बंद हो गया | आवाज भी जाने लगी | वे पेन मांगते लिखते तो  घर में सबका हालचाल पूछते | कहते कि घर ले चले .. एक रोज उन्होंने लिखा " बिटिया खूब खुश रहना ,मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है | सबका ध्यान रखना | "

मैं नहीं जानती ,कैसे खुद को संभाला .. 7  तारीख को पापा को घर ले आयी कि अब जो हो सो हो कम से कम माँ के आँखों के सामने ,अपने -घर -बगीचे से रुखसत हों !! पापा मास्क खींच देते थे ,सो हाथ बांधना पड़ता था | आखिरी दिन उन्होनें मुझसे हाथ खोलने जिद की ,मैंने मना किया .. उनका देखना ऐसा था जैसे कह रहे हों कब तक बाँधेगी.. 

शाम को देह के बंध से वो मुक्त हो गए ! कोई रो भी न सका .. भाई के सामने से उनकी देह अंतिम यात्रा पर थी वो कंधा न दे सका | 

इधर पापा का जाना हुआ उधर भाई की साँसे जवाब देने लगीं | शाम 5 बजे खुद ही गाड़ी में सिलेंडर समेत भाई -भतीजे के साथ शहर के पाँच अस्पतालों के दरवाजे खटखटाए .. रात 11 बजे जाकर जगह मिली !

भाई जीत गया | 15 दिन बाद घर लौटा फिर महीने भर बाद पापा के फूल मां गंगा की गोद में रख आया | पापा दो महीने अपने ही बगीचे के ,अपने ही सँवारे आसापाला के आलिंगन में रहे |

इस सब के बीच मैं कब ठीक हो गई ,पता नहीं चला ! कब मुझे कोरोना हुआ ,कैसे कब गया, नहीं पता | 

मैं चाहती थी कि मुझे ये सब याद न रहे , स्लेट -पट्टी पर लिखे की तरह इसे भी सूखा दूँ .. नहीं सूख रहा है | एक -एक कर कितने ही चेहरे ,कितनी बातें , कितने मलाल दिमाग को सुन्न किये जाते हैं | 

आज फिर सुबह हो गयी ! एक दिसंबर 2021 .. अब जब फिर तीसरी लहर की आशंका उठने लगी है ,दिल फिर से घबराने लगा है ! कहते हैं ,ब्रह्म मुहूर्त में ईश्वर जल्दी सुनते हैं .. मैंने आज सब लिख दिया है ,मैं चाहती हूँ ईश्वर इसे पढ़ें ,हमसे जो भी गलत हुआ हुआ हो उसे क्षमा करें .. कुछ न दें बस अपनों को आसपास रहने दें ,उनकी साँसों पर उनका हक रहने दें !

आप सब भी अपना ध्यान रखना ,अपनों के साथ रहना .. पापा बगीचे के वो हरे भरे दरख्त थे जिसकी हर डाल पर बचपन पसरा था ! माँ देहरी हैं , बस वही हैं जो हिम्मत बँधायें हैं कि एक दिन सब अच्छा होगा .. आप भी दुआ करें कि सब के साथ ,सबके पास सब अच्छा रहे !

चलते हैं ,फिर मिलेंगे ! निराश फिर भी मत होना ,जीवन है सब चलता रहेगा .. 

Monday, 16 August 2021

मैं न कर सकी पर आप जो विद्रोह कर सकते हैं, जरूर कीजिएगा | इश्क की सतरंगी दुनिया में लौट आने की उम्मीद मत छोड़िएगा ....

 

बहुत बार मुझे ऐसा लगता था

अगर विद्रोह करने पर मजबूर कर दी जाऊँ

तो मैं बहुत जोर से चीख सकती हूँ

दीवार को भड़भड़ा के गिरा सकती हूँ

आसमान को पीछे धकेल सकती हूँ

और

अततः उन सब चीजों को बदल सकती हूँ जो मुझे असहज कर रही हैं |

पर ये सब निहायत बचकाना सिद्ध हुआ

विद्रोह की हर स्थिति में

मैं बच निकली

कभी ये कहते हुए कि मेरे ही लड़ने से क्या होगा

कभी ये मान कि मुझसे पहले भी कई चले गए

जो सोचते थे

आसमान में सुराख कर देंगे |

 

हाई स्कूल में आयी , तीसरी भाषा के रूप में उर्दू पढ़ने का ऐलान कर दिया |

घर वालों ने विरोध नहीं किया लेकिन जब उर्दू की क्लास में जाकर बैठी

टीचर के साथ साथ क्लास की बाकी लड़कियों ने भी समझा दिया कि ये उनके लिए भी अजीब है |

मैंने संस्कृत पढ़ी ,बेमन से |

मन उर्दू की किताब में था

 

ये विद्रोह भी वहीं दब गया |

 

मेरी सबसे पक्की सहेली फिरोजा दसवीं में ही पाकिस्तान के किसी लड़के से ब्याह दी गयी|

फिरोजा चली गयी | पक्की सहेलियों का विद्रोह कच्चा साबित हो गया |

 

ईद की सिवईयों का स्वाद लेते , शरारा –कुर्ते और चुन्नी को संभालते

गज़लों वाली रातों और मुशायरों के साये में बचपन बीत गया |

उस दौर को रोक लेने की जिद भी बहुत की

पर विद्रोह तब भी नहीं कर सकी |

 

वो दौर आया जब दिल बल्ले पर धड़कने लगा !

पाकिस्तान की टीम जयपुर आयी थी

सनक की इंतिहा ये कि इमरान के ऑटोग्राफ के लिए कॉरीडोर पार कर उसे सीढ़ियों पर ही घेर लिया |

तब वो सिर्फ इमरान था | इमरान खान नहीं !!!

हॉस्टल की दीवार पर चस्पा दसियों पोस्टर वाला हीरो !!

एक दिन कर्फ्यू लग गया | सब हिन्दू –मुसलमान हो गए |

भीतर का इंसान , विद्रोह के स्वर में चिल्लाया

बंद करो ये खेल !!

सुनो सब एक से नहीं हैं

आवाज मेरी बस मैंने ही सुनी

पर विद्रोह मैं तब भी नहीं कर सकी |

 

लोगों ने कहा तुम मासूम हो, तुम सच नहीं जानती |

न जानने,

न बता पाने,

न सुने जाने का आक्रोश समझते हैं ना ?

मैं तब भी कुछ बदल नहीं सकी |

मैं उन सबको तब भी कुछ समझा न सकी |

विद्रोह तब भी नहीं कर सकी |

 

फिर एक रोज इंदिरा का खून बहा....

गोधरा हुआ , गुजरात हुआ.........दिल खूब रोया !

वो संभलता कि राजीव गए ,सफ़दर झुंड में घेर के मारे गए

फिर ये दर्द आदत में शुमार हो गया..

फिर क्या आईसीस और क्या RSS

विद्रोह तो मैं तब भी नहीं कर सकी |

 

सच तो ये है

मैंने ही इश्क में तर

खूबसूरत नज़्म सी दुनिया की तमन्ना की थी

ये और बात है कि

लहू में तरबतर दुनिया मुझे हासिल हुई |

ये जान समझ लिया है मैंने

विद्रोह मैं अब भी नहीं कर सकी |

 

अब कुछ नहीं सूझता मुझे

बस एक खामोश उम्मीद बाकी है

कोई दिन ऐसा आएगा जब सब एक दूसरे को देख बाहें फैलाएंगे

मुस्कुरा कर कहेंगे कि तुम सब मेरे अज़ीज़ हो !

 

दिल का एक हिस्सा कहीं और बस रहा है,एक हिंदुस्तान में धड़क रहा है |

मैं खुद को दुनिया के हर हिस्से में , उसकी बनायी हर शह में जीती हूँ |

हर किसी के दर्द में रो लेती हूँ

हर किसी की मुस्कुराहट पर मर जाती हूँ

गीता में जब कृष्ण कहते हैं कि आत्मा लंबे सफर पर है

ऐसा है तो मैं कहती हूँ कि फिर हम उसे वीज़ा देने वाले हैं कौन ?

ये नियम, ये शर्तें ,ये पाबंदियाँ बस साँसों की गुलाम हैं....

कितना रोक लीजिएगा !

देह के रंग-ईमान ,उस पर कानून बनाने

बेकार की वजहों से

छोटी सी जिंदगी में जहर भर देने का ये सिलसिला थम जाना चाहिए !!

मैं न कर सकी पर आप जो विद्रोह कर सकते हैं, जरूर कीजिएगा |

इश्क की सतरंगी दुनिया में लौट आने की उम्मीद मत छोड़िएगा !

हम कहीं न कहीं ,कभी न कभी उसे जरूर पा लेंगे !

हम उस पार रोशनी की दुनिया में फिर से मिलेंगे

उम्मीद मत हारना !!

 

Monday, 17 August 2020

दिल्ली की राजनीति में बधाई की राजनीति के मायने क्या हैं ?







दिल्ली की राजनीति बड़ी दिलचस्प है | शीला दीक्षित का राजकाज हो , साहिब सिंह वर्मा हों या अब अरविन्द केजरीवाल , इन सब की राजनीति में केन्द्रीय सत्ता की भूमिका अन्य राज्यों की तुलना में अलग रही है | स्पष्ट कर दूं कि मैं राजनैतिक मसलों की कोई जानकार नहीं हूँ | एक सामान्य नागरिक की तरह जो सामने घटता दिख रहा है उसी आधार पर ये विश्लेषण कर रही हूँ |

कल अरविन्द केजरीवाल का जन्मदिवस था | नरेंद्र मोदी से लेकर छोटे –बड़े भाजपा नेताओं तक ने उनको बधाई दी | राजनीति में मूलतः विरोधी कोई नहीं होता ये बात जग जाहिर है इसलिए इन संदेशों से कोई अर्थ निकालना प्रथम द्रष्टया अनुचित है लेकिन ऐसा जब बीते सालों में ना हुआ हो तो कुछ अटपटा जरूर लगता है | क्या अरविन्द केजरीवाल भाजपा के करीब जा रहे हैं या भाजपा अरविन्द के करीब आ रही है ? दिल्ली की राजनीति में बधाई की राजनीति के मायने क्या हैं ?

कोरोना दौर की दोस्ती के मायने

कोरोना संकट के शुरुआती दौर में हमने देखा है की दिल्ली भाजपा के नेताओं से लेकर गोदी मीडिया तक के स्वर अरविन्द केजरीवाल को कोसने के थे | हमने ये भी देखा कि दिल्ली सरकार ने कोरोना संकट से जूझने के लिए जो प्रयास किये उसका केंद्र ने शुरुआती दौर में जबर्दस्त विरोध किया | जिसमें होम आईसोलेशन का मुद्दा खूब गर्माया पर वही बाद में देश भर में लागू करने पर भाजपा सरकार ने मंशा दिखाई |

लेकिन जब अमित शाह ने दिल्ली के सरकारी अस्पतालों का दौरा किया , उनकी प्रशंसा की , राधा स्वामी सत्संग हॉल को कोविड उपचार केंद्र में बदलने का रास्ता साफ़ किया तब से मीडिया की भी भाषा बदली और भाजपा नेताओं की जुबान पर भी लगाम लगी | क्या ये उतना ही सहज है जितना दिख रहा है ?

अरविन्द केजरीवाल सरकार की मंशा दिल्ली में कोरोना पर काबू पाने की थी ,उसने यह कर दिखाया भले उसके लिए उसे अपने क्रेडिट कार्ड में सेंध लगवानी पडी |

दिल्ली दंगों पर चुप्पी

यही बात दिल्ली के दंगों में दिल्ली सरकार की भूमिका को लेकर उठे प्रश्नों पर भी लागू होती है | दिल्ली जल रही थी तब आरोप लगे की अरविन्द केजरीवाल की सरकार चुप क्यों है ? सब जानते थे कि दिल्ली के चुनाव होने वाले थे और जल्द ही स्पष्ट भी हो गया था कि भाजपा चुनावों में शाहीन बाग़ का इस्तेमाल साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए कर रही थी | 

चुनाव खत्म होने के साथ ही शाहीन बाग़ की खुनस और हार की रार दंगों में कैसे बदली , ये सबने देखा पर फिर भी आज तक लोग जवाब ढूंढ रहे हैं कि “आप “ चुप क्यों रहे ? ये जानते हुए कि जांच कमेटी “आप” के नियन्त्रण से बाहर है , “आप” की दखल की मांग करते रहे ?

अब जब शाहीन बाद में सक्रीय शहजाद अली को भाजपा ने अपने घर में बुला लिया है तो लोगों को समझ आ जाना चाहिए की अरविन्द केजरीवाल चुप क्यों रहा ? सत्ता हर नागरिक आन्दोलन को येनकेन हाईजैक करवा ही लेती है , शाहीन बाग़ का संघर्ष भी अंततः इसी तरह बंधक बना कर सत्ता ने अपने हितों को साधने के लिए काम में लिया |

जानते हुए कि दिल्ली पुलिस ,जिसका नियंत्रण अमित शाह के हाथ में है वही जेएनयू हिंसा के फरार दोषियों को नहीं पकड़ सकी तो भी आप पूछ रहे हैं की अरविन्द केजरीवाल चुप क्यों रहा ?

दंगों और सरकारों को गिराने का इतिहास किस दल का है , सब जानते हैं , सबको मालूम है | सब ये भी जानते हैं कि शहर में आग लगेगी तो आग उनके घर तक भी आयेगी ...... सब जानते बूझते भी अगर लोग भीड़ का हिस्सा बना कर अपनों की ही जमापूंजी को आग के हवाले कर देना चाहते हैं तो कठपुतली पुलिस किस किस को रोकेगी ? क्यों रोकेगी ?

विपक्ष की तैयारी अरविन्द केजरीवाल को दंगों के खेल में फंसा कर चुनावी रण जीतने की थी | केजरीवाल सरकार जानती थी कि न पुलिस उसकी सुनेगी ना विपक्ष के गुंडे उसकी मानेंगे !!


हर राजनैतिक दल ऐसे समर्थकों और कार्यकर्ताओं की फ़ौज बना लेना चाहता है जो उसके कमांडर के हर गलत को सही सिद्द करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद के गुप्तकालीन नियमों का पालन करे | नैतिकता के मारे ये मासूम लोग पोस्टर चिपकाने , नारे लगाने , सोशल मीडिया पर ट्रोलगिरी करने , भीड़ बन जाने को ही जीवन की सार्थकता मान लेते हैं | दिल्ली में आम आदमी पार्टी , कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी तीनों के पास कार्यकर्ताओं की कमी नहीं लेकिन तीनों में अंतर साफ़ दिखाई देता है | ये अंतर उनकी तर्किकता, भाषाई मर्यादा , कार्यशैली , सामाजिक सरोकारों में स्पष्ट रूप से दखा जा सकता है | आम आदमी पार्टी के अधिकाँश कार्यकर्ता / समर्थक सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक पर भाजपा कार्यकर्ताओं/ समर्थकों की गुंडई से जूझते-उलझते दीखते हैं | दुष्प्रचार और प्रोपगेंडा मशीनरी के इस्तेमाल में सबसे अधिक चंदा उगाही करने वाली पार्टी अव्वल नम्बर पर है | बेरोजगार नवयुवक –युवतियों को आसान मेहनताना/भावुक झांसे देकर कुछ भी लिखवाया-बुलवाया जा सकता है |

केन्द्रीय सत्ता के परोकारों ने व्हाट्सएप्प से लेकर फेसबुक तक सब पर कभी अरविन्द केजरीवाल की खांसी तो कभी उनके ऑड इवन के फार्मूले , मोहल्ला क्लीनिकों तक का मजाक उड़ाया | बाकी चुनावों की तरह दिल्ली के आमचुनावों में बड़े दलों ने धन बल से लेकर भुज बल तक का खूब इस्तेमाल किया | अमित शाह की रैलियां और उनके नेताओं के कड़वे बोल किसे याद नहीं होंगे ? किसे ये याद नहीं होगा कि अरविन्द केजरीवाल भी भाजपा और कांग्रेस की जमकर आलोचना किया करते थे |




सब नजारा यकायक कैसे बदल गया ? क्या दुश्मनी यारी में बदल गयी या दोनों खेमों ने विरोधी की ताकत को भांप के राजनीति बदली है ?

मुझे दूसरा वाला विकल्प ज्यादा करीब लगता है | अरविन्द केजरीवाल अब राजनीति में पहले से ज्यादा परिपक्व व्यवहार करने लगे हैं | जनता की नब्ज समझने में उनका कोई सानी नहीं है | मोदी की आलोचना से ज्यादा वक्त वो अपनी विकास योजनाओं को अमल में लाने में लगा रहे हैं | दिल्ली MCD के चुनाव जीतना उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहा है | महामारी के इस दौर में दिल्ली की बीमार MCD अरविन्द केजरीवाल के योग्य सिपहसालारों की निगरानी में आ जाए उससे बेहतर उनके लिए कुछ नहीं हो सकता | दिल्ली सरकार जानती है की उनकी ये विजय जनता तक सीधे पहुंचने और निचले स्तर पर भाजपा के सियासी दखल को कम करने में मदद ही करेगी इसलिए सीधे टकराव को जितना टाला जा सके अच्छा है |

भाजपा जानती है “आप” के पास कांग्रेस का वोट बैंक है , अगर वो ये सिद्ध कर दे कि “आप” भाजपा साथ हैं तो उन वोटों में सेंध लग सकती है | दिल्ली में कांग्रेस वैसे ही नगण्य स्थिति में है , भाजपा के लिए केवल “आप” चुनौती है | “आप” जनता के हित में जितने साधन –संसाधन जुटा सकती है ,जुटाने की जुगत में है भले उसके लिए उनको विरोधियों से फीते कटवाने पड़ें या बधाई की राजनीति से दो चार होना पड़े |

इस सब में भी ‘आप ’ ने लाभ दिल्ली की जनता को ही पहुंचाया है | केजरीवाल की मांग पर अगर एक दिन में 30 हजार ऑक्सीमीटर जनता के लिए उपलब्ध हो जाते हैं तो ये राजनीति सकारात्मक है |

स्कूलों –अस्पतालों और जन सुविधाओं को लेकर अगर कोई सरकार गम्भीर है तो उसकी इस गुरिल्ला राजनीति से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए | अन्य दल अगर इसी राजनीति की आड़ में दिल्ली की सत्ता पर नज़र लगाये हैं तो उनको अपने चश्मे के नम्बर में सुधार की दरकार है |

...............बाकि तो दलों के दलदल में राजा-रंक सब नंगे है , सब चंगे हैं ,सब रंगेपुते हैं, इससे ज्यादा क्या कहें !!

Saturday, 20 June 2020

बालकनियों में उतरती शामों के किस्से हमेशा रूमानी नहीं होते .....


                           

नींद जब नहीं आती तो नहीं आती और जब आती है तो सुबह आती है जब जागना होता है ..... उठने – सोने का वक्त बदलता रहा !! पहले अपने स्कूल की बस निकल जाने का डर जगा देता था फिर बच्चों की स्कूल बस का, उसके बाद आदत बन गयी और चाहने पर भी देर तक सोना नहीं हो पाया |

पिछले तीन महीने में व्यवस्थाएं बदलीं !! बच्चे हॉस्टल से घर आ गये और संजय ने भी घर को दफ्तर बना लिया था ! बदलना केवल मुझे था , मुझे सबको वैसा ही माहौल देना था जैसा उनके कॉलेज –हॉस्टल –ऑफिस में होता है | घर का एक कोना जो नहीं बदला वो थी रसोई .....सारे स्विच बोर्ड चार्जर से लदे रहते , बिस्तरों पर ,सोफे –कुर्सी ,मेज पर लैपटॉप –पावरबैंक ,किताबें .... कपड़े कहीं और सिरहाने पानी की बोतलों का जमावड़ा !! इस बेतरतीबी से झुंझला कर कलह करने से भी कुछ नहीं होना था क्योंकि मोबाइल और कंप्यूटर से गर्दन उठाने का वक्त किसी के पास नहीं था |

नाश्ता क्या बनाऊं ?
बना लो , जो बनाना है !!
पोहे ?
नहीं कुछ और ?
इस और का जवाब ढूँढने का वक्त किसी और के पास नहीं था, वो मेरा धर्म था, मुझे ही निभाना था |
नाश्ते के बर्तन धोना फिर खाने की तैयारी के बीच सीमा के ना आने का मलाल करते करते झाडू –पोंछा....
करती क्या हो सारा दिन ?
ये काम नहीं है क्या  ?
कोई कुछ कहता नहीं, जैसा जचे जब जचे कर लिया करो क्यों परेशान रहती हो ?

संजय की आवाज़ की तल्खी मुझे हर बार ये बात बताने से रोक देती कि परेशानी काम से नहीं है, उस वक्त से थी जिसमें मैं कहीं हूँ ही नहीं ! पत्नी और मां होने के अलावा मेरा कोई वजूद है क्या ? कुछ देर मोबाइल हाथ में ले लो तो संजय की गर्दन ऐसे घूमती है , जैसे मैं कोई गुनाह कर रही हूँ !

क्या देखती रहती हो इसमें ?
व्हाट्सएप्प है , कानपुर वाली बुआ के पोता हुआ है !!
हुआ होगा , हमें क्या ? ये ग्रुप छोड़ दो, बेकार गॉसिप और पोलिटिकल बातें हैं, दिमाग खराब करती हैं |
मैं सिर्फ देखती हूँ , कहती कुछ नहीं !
बेकार टाइम खराब करना है |
तो क्या करूँ ?
पढ़ा करो !
क्या ?
जो पढ़ना चाहो !!

याद आया पढ़ने के लिये पिछले मेले से कुछ किताबें लाई थी | एक रोज उठाईं, कुछ पन्ने पलटे कि संजय कहने लगे कि ये बेकार ऑथर है , सनसनी के लिए लिखता है |

किताब उस दिन से शेल्फ से बाहर नहीं निकली |

तुम घूम आया करो , वजन बढ़ जाएगा !!
ठीक है , शाम को जाउंगी !
शाम को तो बच्चों के स्नैक्स का टाइम होता है ,कैसे जाओगी ?
तो सुबह चली जाउंगी !!
देख लेना ऐसे जाना कि 7 बजे तक लौट आओ, मुझे 8 बजे रिपोर्ट करनी होती है !!
उसके बाद वो सुबह भी आज तक नहीं आयी |

ना घूमने जाना हुआ ,ना पढना ,ना सोना ,ना जागना ......
इस सब का अभ्यास हो गया है मुझे , अब यही जिन्दगी है | मैं नहीं समझ पाती कि 14 दिन के क्वारेंनटीन से या होम आईसोलेशन से लोग डरते क्यों हैं ? ये होम आईसोलेशन तो मैं 28 बरस से जी रही हूँ !!!! चुप्पी का एक मास्क ओढ़े रिश्तों को बचाते, जी रही हूँ |
क्या पहनना है ,क्या बनना है ,क्या लाना है, किससे रिश्ते रखने हैं और किसके साथ कितनी दूरी रखने है सब गाईडलाइन जी ली हैं मैंने |

बच्चों को क्या खुद में शामिल करूं , मैं अब मेरे साथ नहीं रहती !!
तो, ऐसे कब तक चलेगा ?
चलेगा, सबका चल ही रहा है | बच्चों की अपनी दुनिया है, अपनी परेशानियाँ हैं..... उनको और क्या परेशान करना !! सबको अपने हिस्से की चक्की चलानी हैं– अपना पेट भरना है| भाड़ है दुनिया – फूंक मारते जाओ !!

आभा कहती जा रही थी ...... धाराप्रवाह , सांस की फ़िक्र किये बिना !!
फेसबुक पर तुम्हारी तस्वीरें देखकर मुझे लगता था कि तुम अपने परिवार में खुश हो ?
हाँ ,खुश हूँ मना कब किया ?
फिर खुद में नहीं होना क्या है ?
कुछ नहीं बस ज़िंदा रहना है , साँसों के खेल को मेले में बदलना भर है | इसका ख़ुशी या नाखुशी से कोई वास्ता नहीं है !! जो ख़ुशी है तो बस इतनी कि अब दर्द नहीं होता ना किसी से झगड़ने का मन करता है | संजय की कर्कशता और मेरे प्रति उनका दोयम प्रेम मुझमें अब ऊब और गुस्सा भी नहीं भरता !! वो जब  कभी कहता भी है कि तुमको लोगों से तौर तरीके सीखने चाहियें तो लगता है कि इतना दोगला होने से बेहतर है चुप रह जाना , अकेले रह जाना |

आभा कहते कहते चुप हो गयी ....पीछे से आवाज़ आ रही थी “किससे इतनी देर तक बातें कर रही हो ? समय देखो, ये फोन करने का वक्त है क्या ?

आभा ने रिसीवर रख दिया , उसका फोन आना कम हो गया है ! उसका होम आईसोलेशन अंतहीन है , उसके लिए इस जिन्दगी से जूझने के सिवा कोई विकल्प नहीं !! उसके प्रश्नों का मेरे पास समाधान नहीं और मेरे समाधानों को वो अपने सवालों में फिट कर पाए उसके पास उतनी स्पेस नहीं |

ये हर बंद दरवाजे के पीछे की कहानी है .... समन्दर की स्याही से रेत पर लिखी कहानी !! फेसबुकिया तस्वीरों से किसी की तकलीफ , भीतर चल रहे संघर्ष और इन्कलाब की करवटों को जान लेना आसान नहीं | प्रेम का परिंदा उड़ान चाहता है पर हमने उसे दुनियादारी की और कभी अपने कम्फर्ट जोन की सलाखों के पीछे धकेला है |


बंद दरवाजों और बालकनियों में उतरती शामों के किस्से हमेशा रूमानी नहीं होते ...... इनके किरदार अपने वजूद की लड़ाई - लड़ते , समझौते करते करते लम्बी नींद सो जाते हैं !! इनके ख्व़ाब बहुत खूबसूरत होते हैं , मौका मिले कभी आपको तो इनके सोने से पहले उनको जगा के पूछियेगा, खुद से और दुनिया से आपकी भी शिकायतें कम हो जायेंगी  !!!!

Sunday, 28 April 2019

लेकिन फिर मन कहता है नोटा नहीं , उम्मीद को चुनना !!

दम घोटू चुनाव प्रचार और  उथले - कुंठित नवोदित नेताओं की सुनामी ने लोकतंत्र के इस महापर्व को कचरे का ढेर बना डाला है |

मन नहीं करता कि घर से बाहर जाकर झाँका भी जाए कि कौन वोट मांगने आया है,कौन जाने वो किस बहाने से आपके सुख  की रेकी कर के चला जाए | बहसों से बच के निकल जाती हूँ , आएगा तो मोदी ही - या पप्पू की मम्मी या फिर केजरीवाल ......... कान में सब कुछ पड़ता है पर मन जाने क्यों सब से निर्लिप्त है | 

ये अजीब उत्साहहीनता का दौर है ,  वैसा ही जैसा हमेशा से रहता था | 

छोटे थे तो हर दल की रैली के झंडे - बिल्ले लगा कर घूम लेते थे | पापा कट्टर कांग्रेसी थे सो पंजे पर जोर रहता था लेकिन जयपुर ग्रामीण से बीजेपी सांसद गिरधारी लाल भार्गव जो सात बार जीते थे , उजला अरोड़ा जो विधायक थीं पारिवारिक सदस्य ही थे ,के साथ कमल भी कहीं साथ चलता था |  वो दौर अटल बिहारी वाजपेयी ,वीपी सिंह और इंदिरा -राजीव का था |  सबका साथ रहता था , जनसंघियों का भी खूब आनाजाना था | 

राजीव गांधी को सुना था मैंने ,इंदिरा को भी....... अरविन्द केजरीवाल के शपथ ग्रहण में रामलीला मैदान की भीड़ का हिस्सा भी थी !!

सब देख सुन लिया और जी लिया ....... उम्मीदों को बनते बिगड़ते ,जोश को उठते -बिखरते -ठहरते देख लिया | सत्ता कैसे सपनों को छलती है और उम्मीदों को कैसे वोट में बदलती है ,सब देख लिया | 

आप चुनते किसी और को हैं वो निकलता कुछ और है , आप चलते उसके साथ हैं पर वो मंजिल बदल लेता है !! अब आधे रास्ते से लौट जाने या वहां रुक कर उसके लौटने ,पीछे मुड़ कर देखने की उम्मीदें भी जाती रहती हैं | कारवाँ बढ़ता रहता है , तारीखें बदलती रहती हैं और सरकारें भी | 

नहीं बदलता है कुछ तो वो है हमारी नियति !! 

तमाम तरह के हथकंडे अपना कर मोदी भले सरकार बना लें लेकिन ये बात वो भी जानते हैं कि देश को उन्होंने धर्म -जाति -समाज -देशद्रोही -देशभक्त में बाँट दिया है | इतना बैर -इतनी कटुता .......आप देश को बाँट कर उस पर राज कर सकते हैं लेकिन उसके दिल में जगह नहीं बना सकते | कांग्रेस की नीतिगत विफलताओं और भीतरघात ने देश को कमजोर विपक्ष  दे दिया जिसका परिणाम अब मोदी के रूप में सबको भोगना  पड़ रहा है | 

किसी भाषण में ,किसी परिचर्चा में वो देश के मुखिया नहीं लगे | बीजेपी के प्रवक्ता से ज्यादा इस व्यक्ति की कोई हैसियत नहीं है | फर्जी आंकड़े और फर्जी दावों के बूते पर अगर मोदी ही आएगा तो आ जाए !! कम से कम मेरी पीढ़ी इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराई जा सकेगी | 

देश जिम्मेदार है ,लोग जिम्मेदार हैं अपने गलत निर्णय के लिए !! हम काम नहीं देख रहे ,काम के नाम पर हो रहे प्रचार से भर्मित किये जा रहे हैं कि लगे कि अथाह काम हो रहा है | 

अब ऐसे में क्या देखना है ,क्या सुनना है ,किसे चुनना है सब कुछ नोटा हो गया है | 

लेकिन फिर मन कहता है नोटा नहीं ,  उम्मीद को चुनना !! 

कल वोटिंग है ,मैं वोट दूंगी आप भी वोट जरूर देना  भले मन हो या ना हो !! चुप रहे या बैठे रहे तो हम भी कहीं गुनहगार ही ठहराए जाएंगे | 

जय लोकतंत्र -जय जनतंत्र !!!