Friday, 2 December 2016

जंगल और ताल ..... गजब का पागलपन है मुझमें !

जंगल में हूँ। उम्मीदों का जंगल ,ख्वाहिशों का जंगल , अमरबेल से लिपटे ख्वाब ,पेड़ दर पेड़ -झाडी दर झाडी...... ये पगडंडी किसी के कदमों से बनी है पर नहीं पता कि किस ओर ले जा रही है। ऐसे रास्तों को भी चुन लेना चाहिये जो किसी नामालूम सी जगह पर ले जाएँ , जिसका पता सिर्फ और सिर्फ आपको ही पता हो। पैरों के नीचे सूखे पत्तों की चरमर और बदन को छूकर गुजरती दिसम्बर की हवा ...... जंगल में और क्या चाहिए !

तालाब को झुक कर चूमते पेड़ और उनपर इठलाती सुनहरे पंखों वाली तितलियां..... एक और बार -एक और बार के स्पर्श के आनंद में डूबे पाखी , छपाक से पानी पर उतरते हैं और फुर्र से उड़ जाते हैं। जो उसे नहीं छू पा रहे वो उसमें खुद को देख रहे हैं .... वो टुकड़ा गुजर रहा है न बादलों का , हां  वही जिसको देख महसूस होगा कि आसमान में हिरन भागा जा रहा है ! हां वही .....  ताल में कुलांचे भर रहा है।

कुछ उलझ गया झाड़ियों में , कदम ठिठके तो याद आया और मुस्कुरा दी ! ताल ....... मुझे मुक्त नहीं करेगा शायद ! शायद कभी नहीं .... करेगा भी कैसे ? अब मैं ही वो जंगल हूँ जो उस ताल के किनारे उग आयी हूँ और धीरे धीरे फैलती जा रही हूं , घनी और गहरी होती जा रही हूँ। मुझमें कितनी पगडंडियां बन गयी हैं ,कितने वजूद मेरे ही मुझमें लापता हो गए हैं।

मुझे अच्छा लगता है ,कभी ताल को पेड़ बन चूमना और कभी उसके इर्दगिर्द उग के जंगल हो जाना ! मेरी आवारगी ने मुझे उसके आसपास ही समेट दिया है..... हर एक सफर में उसके साथ सैंकड़ों सफर करती हूं। जिंदगी हर बार किसी फूलों से लदी डाल को मेरे रास्ते पर झटक देती है और मैं फिर से इश्क़ की खुशबू से लबरेज उसके इश्क़ में नंगे पैर दौड़ पड़ती हूं।

जंगल और ताल .....  गजब का पागलपन है मुझमें ! अब जो भी है इश्क़ में सब जायज है... जंगल हो जाना भी और ताल हो जाना भी !
आप भी इश्क़ में रहिये और खिलखलाते रहिये ! चलते रहिये !

शेष -

एक साथ
एक दर्द
वही राह
वही चाह

नहीं है तो -
मन

है भी तो -
जीवन

शेष -
सांसे
आंसू
आक्रोश
प्रश्न
प्रतीक्षा
मृत्यु 

ख्वाहिशों की लपट जिंदगी के दरिया होने का भरम जिलाये रखती है......

मरीचिका देखें हैं क्या कभी ? देखें होंगे ,वो जो तपती सड़क पर लपट सी , दरिया का भरम बनता है न ,वही ! जिंदगी वैसी ही लगती है कभी ...... दरिया ,लपट की दरिया ! अंतहीन प्रतीक्षा और अंतहीन प्यास.... निष्ठुर कहीं की ! छलना है और छल के आगे फिर प्रेम -वेदना का ताना बाना है। सांसों का ऐसा बुनघट कभी देखे हैं जिसमें जिस्म ही ढका हो और रूह उघड़ी हो ... हाँ ,ये वैसी ही है। इसके आरपार वो सब है जो दीखता नहीं लेकिन जनम -जनम से है ...... सांसें सफर करती हैं , कभी इसकी शक्ल में कभी उसकी शक्ल में !
कोई अधिकार नहीं, कोई प्रतिकार भी नहीं .... जो मेरा है ही नहीं उससे शिकायतों का व्यवहार भी नहीं .....जिंदगी से रिश्ते की ये शर्त भी मान ली है।

उंडेल दिया है खुद को उसी प्याले में ....... जहर हो या अमृत कौन जाने ! फर्क भी क्या पड़ता है अब ! निष्कर्षों का  दौर बीत चुका है। हर निष्कर्ष बेमानी निकला और मुझे ही मूर्ख साबित करके चला गया ....... नहीं पता ,जिंदगी क्या चाहती है ,क्या मन चाहता है !

बावरा है, सपने देखता है , बातें करता है , हंसता है और फिर खुद ही रो देता है ! अब ये सोचना भी अच्छा लगता है कि आप ठगे गए ...... ठग लिया, सांसों ने ठग लिया। न ठगे जाते तो सफर कैसे होता ? गठरी कांधे पर रखी है ,अब प्रतिवाद भी नहीं होता ! जी करता है.....खुद ही सौंप दूं "ले जा,अब ये भी ले जा " ........शेष कुछ न रहे ,कुछ मुझमें और कुछ उसमें भी न रहे जो कहता है कि ना दे !

इस सब खेले में एक ही सच है , वो इश्क़ है ! जो लम्हे चांदनी में घुल अमृत बन बरसे हैं बस उतना सा जीवन है ...... मन की डोर और सांसों के इस बुनघट के बीच उसका होना ही मेरा होना है। रात सी जिंदगी है और दिन उगते से गुम जाती है ! दिन सब ख़लिश में बीतता है और ख्वाहिशों की लपट जिंदगी के दरिया होने का भरम जिलाये रखती है। 

मुझे चाँद ही भाता है , भरम नहीं भरोसा देता है। उसकी मुस्कुराहटों से सांसे तर हुई जातीं हैं ,मन के किसी कोने में जिंदगी दमकती है और कहती है मैं मरीचिका नहीं हूँ ,दरिया हूँ , इश्क़ का दरिया..... बाँध लो मुझे , आओ मेरे करीब आओ !

मैं उतर रही हूं और अब दरिया के बीच में हूं ...... डूबी तो भी पार और उतरी तो भी पार !

चल मेरे मांझी ले चल अब जहां तेरा दिल कहे , नदी भी तेरी है और सांसे भी तेरी ! मेरा होना केवल भ्रम है।

Tuesday, 29 November 2016

नोटबंदी "आईटम" है ! नचाइये -गम भूल जाइये !

आगे कुछ भी लिखने से पहले बता दूं कि मुझे नहीं पता की नोटबंदी से किसी को क्या फायदा होगा और किसी को क्या नुकसान , ना ही मुझे इसका अर्थशास्त्र पता है ना ही मैं नीति की ज्ञाता ! इस शोर से बस इतना समझ पायी हूं कि ये भी राष्ट्रभक्ति  का कोई  "आईटम"  है जो देश के सामने उसके दुःख दर्दों को भुलाने में एनेस्थीसिया का असर करेगा |

ऐसा होता आया है ,पिछले तमाम अनुभव बताते हैं कि जब- जब समाज जीवन के बुनियादी प्रश्नों पर सत्ता को घेरता है, तब तब सत्ता पर काबिज चन्द रसूखदार उन प्रश्नों को चट कर जाने के लिए अपनी सेना सड़कों पर उतार देते हैं।

संघर्ष के जिस दौर से ये नेता बनते हैं ,उसी संघर्ष का ऑमलेट बना देते हैं। संघर्ष का वो दौर इनको वो सब हथियार चलाना सिखा देता है, जिसे हम आप अनैतिक और अमान्य करार देते रहे हैं।

नोटबंदी भी ऐसा ही "आईटम" बन के सामने आया है , जिसे गली- गली इन्हीं कम्पनियों की बदौलत नचाया जा रहा है | इस "आईटम"  को नोट में तब्दील करने के लिए मीडिया की  टीआरपी से लेकर तमाम टेलीकम्युनिकेशन कम्पनियों के जरिये उगाही हो रही है |

आप बताएं कि इस "आईटम"  का डांस कैसा लगा ? पसन्द आया तो एक दबाएं  और दूसरा गाने पे नचाना है तो दो दबाएं , जैसे विकल्प देकर एक सर्वे करवाया गया है।

अब बताइये जब आप ने उस एप्प को बनवाया तो उसको क्या सफेद में पैसा दिया , दिया तो क्यों दिया ? फिर जब आपने उसे डाउनलोड किया तो नेट का बिल भरा , क्यों भरा ? नाच देखने के लिए ही ना ! वो पैसा सफेद का था जो काला होने चला गया और ये काला लिबास पहने वो नोटबंदी का "आईटम" आपसे भरपूर सीटी बजवायेगा |

मजदूर को दिहाड़ी नहीं मिली लेकिन "आईटम" उसके सामने है , शाम को रोटी नहीं मिली तो "आईटम"  उसके सामने है ! जिनको लगता है इस आईटम से देश सेवा कर रहे हैं , वे दरसल वे लोग हैं जो गणेश जी को दूध पिला कर उनके गली -गली घूमने में उनकी मदद कर चुके हैं। अब "आईटम" देख उस थकान को मिटायेंगे , कमीशन ले कर दिन भर लाइन में  खड़े होंगे , पौवा दाब सो जाएंगे !

देश के नाम पर धर्म ,संस्कृति के नाम पर गाय और अब भ्र्ष्टाचार के नाम पर इस "आईटम" का इस्तेमाल देखिये ,सराहिए और लपलपाइये। मौका ...मौका........ चुनाव नजदीक हैं , इसको भुना लीजिये ,इसको नचा लीजिये ताकि पब्लिक ये ना पूछे कि नौकरी नहीं मिली ,डिग्री फर्जी क्यों हैं , लोकपाल कहाँ गया , माल्या भागा  कैसे , घोटाले के मुजरिम कहाँ हैं , चन्दे का हिसाब कहां है , बेटी मेरी क्यों , सिपाही शहीद क्यों ?

इसी "आईटम"  के बीच नजीब का सवाल भी गुम गया ? मां भी एटीएम की कतार में लगी होगी और बहन बैंक गयी होगी !

आप भी भूल जाइये , नोटबंदी के आईटम का मजा लें और अपना श्रम और गाढ़ी मेहनत की कमाई को रूप बदल के लटके -झटके दिखाते देखें ! चुनाव आएं तो इस "आईटम" को वोट में बदलते देखें फिर सरकार और फिर "आईटम" बनते देंखे।

यही नोटतंत्र है- यही नोटबंदी है।

विपक्ष को ऐसा लगता है लेकिन आप इसके ईमानदार पक्ष को देखिये और भ्र्ष्टाचार मुक्त भारत की सुंदर तस्वीर के लिए अपने घर का कौना-कोना तैयार कर लीजिये ! आखिर जीत तो इस भरोसे की ही होगी। आशावादी बने रहना ही लोकतंत्र की जीत है।

Sunday, 27 November 2016

जिंदगी तेरा समंदर होना मेरी आवारगी को भाने लगा है....

जिंदगी भी दिलचस्प है। पीछा छुड़ाओ तो दौड़ती आती है और उसके पीछे दौड़ो तो पीछे छोड़ जाती है। साया बन के चलती है पर साये सी ही बनी रखती है ! कभी सोचा ही नहीं ऐसे सवाल दे जाती है और कभी ऐसे जवाब दे जाती है जिन्हें मैंने कभी पूछा ही नहीं .......

वो ऐसे ही किसी सवाल सा है या जवाब है , नहीं पता पर वो जो भी है, साया बन लिपटा रहता है ... मेरे वजूद के साथ.......समंदर सा खामोश दिखने वाला उसका होना समंदर सा ही शोर करता है। एक पल में किनारों को तोड़ता चला आता है और मुझे बहा ले जाता है ..... दूसरे ही पल मैं फिर खुद को उसी किनारे पर खड़ा पाती हूँ। 

शाम जब सूरज पनाहों में आता है तो उसकी उलझने ,उसकी ख्वाहिशें परवान चढ़ने लगती हैं। चांद और उसके बीच की दूरी का हिसाब लगाने लहरें उफ़ान पे आ जाती हैं ...... पूनम से अमावस तक और फिर अमावस से पूनम तक यही खेला चलता रहता है। न चाँद समंदर का न समंदर चाँद तक की दूरी को माप पाता है। बची रहती तो जिद......... खलिश जो जाती ही नहीं !

नंगे पैर रेत में धंसाए, मैं भी चलती जाती हूँ , लहरें आती हैं और मेरे निशान समंदर के सिरहाने छोड़ आती हैं। अब मेरे आँचल की इतनी भी थाह कहां कि समंदर को उसमें ढांप लूं ...... वो मुझे आगोश में लिए जाना चाहता है और मैं , अपनी हदों से वाकिफ लहरों का आना जाना देख रही हूँ। 

वो जुल्फों से खेलता है ,कभी अपनी उंगलियां उलझाता है.... इस खेल में वो हंसता है , गुनगुनाता है और गुम जाता है ! ये उसकी आदत है, वो अपनी थाह लेने नहीं देना चाहता ..... मैं कभी चाँद बन उसके किनारे  की बालू रेत हो, उसे महसूस करती हूँ तो कभी स्याह रात में उसके साथ गुपचुप शोर किया करती हूं ! हम दोनों पागल हैं ,हम दोनों जिद्दी हैं। दोनों उलझे हैं और दोनों ही इश्क में हैं......

जिंदगी तेरा समंदर होना मेरी आवारगी को भाने लगा है...... मेरे  साथ यूँ ही सफर पर रहना , इस छोर से उस छोर तक तुम्हीं मिलना ! इस आवाज़ ने सांसों को रफ्तार दी है , अब मेरी माथे पर बिंदिया बन के दमकते रहना , मुझे गुनगुनाते रहना !

Tuesday, 18 October 2016

इस नाम से अब परेशानी होती है............

कई बार महसूस होता है जिंदगी घर के किसी कोने में रखी कोई ऐसी किताब है जिस के पहले पन्ने पर मेरा नाम तो लिखा है पर पढा इसे मैंने भी नहीं है। 
उलझते उलझते शाम हो चली है मैं फिर उलझ जाती हूँ और फिर उस किताब को देखने लगती हूँ.......उसे उठाती हूँ ,पन्ने पलटती हूँ पर सवालों के जवाब उसमें कभी मिले ही नहीं ! बेकार की कवायद है। इस किताब का क्या कीजे , इस नाम का क्या कीजे ? मेरी पहचान ने मेरी निजता निगल ली है | 

इस नाम से अब परेशानी होती है। लापता हो जाया जाए और कोई ऐसी जगह जाया जाए जहाँ मेरी कोई पहचान न हो। लोग जितना पहचानने लगते हैं उतने  ही खुद से अजनबी होते जाते हैं। पहचान के साथ जुड़े रिश्ते और उन रिश्तों की अपेक्षाएं अक्सर सलाखें लगने लगती हैं। ये अपेक्षाएं भी समंदर हैं ,खारा पानी किसकी प्यास बुझा पाया है ? 

पेड़ ,पहाड़ ,जंगल हो जाना चाहती हूँ। झील से आजाद हो दरिया हो जाना चाहती हूँ। सामान के समंदर में फेंक दी जाने वाली जिंदगी से क्या खोज निकालने की सम्भावना है। सामान ने भी चन्द महीनों बाद कबाड़ ही होना होता है और सामान के साथ आयी खुशी भी उसको अबेरते अबेरते कबाड़ में बदलने लगती है। 

मोह के कुछ धागे रंगे हैं ,कुछ कच्चे -कुछ पक्के हैं ! देह के मिट्टी होने तक इन धागों में बंधे रहना भी नियति है। मन की मिट्टी गीली है ,दरकने लगती है। जो ये भरम पाले हैं कि वो सहारा हैं ,वे भी धसक जाते हैं तो नए सहारे उग आते हैं और फिर कोई फिर से खड़ा हो जाता है। 

 सब सलाखों ने अपने इर्दगिर्द सलाखें उगा ली हैं ! किसी को रिश्तों का, किसी को संस्कारों का, किसी को समाज का नाम दे दिया है। आप बेशक तर्क दें कि नियम बिना समाज नहीं चलता पर मैं समाज नहीं "मैं " होकर जीने की आजादी चाहती हूँ। हम सब चाहते हैं पर देना नहीं चाहते इसलिए कि आजाद करने में सुरक्षा घेरा टूट जाता है और इसलिए भी कि सबके भीतर गुम हो जाने का ड़र है। 

........पर मैं गुम जाना चाहती हूं ऐसे कि किसी को न मिलूं। आसमान पार  की रूहानी दुनिया  और चाँद  सिरहाना चाहिए मुझे ! 

ख्वाहिशें ऐसी हैं कि खानाबदोश हूँ कोई ........ इस यायावरी ने कितने मंजर देखे हैं और और कितने और बाकी हैं ,पता नहीं पर ये तय है कि इसी दुनिया , इन्हीं रिश्तों के बीच मेरा अपना एक इमरोज , मेरा अपना कोई साहिर है। अमृता हो जाना कितना मुश्किल रहा होगा पर नामुमकिन तो नहीं था ना.......... !

नज़्म गुनगुनाइए और चलिए साथ उस सतरंगे आसमान के नीचे , उसके पार किसी पगडंडी पर आज़ाद कदमों से...... जिंदगी के हाथों में हाथ दीजिये और हवाओं में उसके जिस्म को भर लीजिये ! 

चलते रहिये , मिलेंगे हम किसी रोज किसी अनजानी सी जगह और उंगलियों को उलझाये चाय साझा करेंगे !


Monday, 3 October 2016

क्या जवाब दूं निमिषा को ? गैजेट्स ने जिंदगी को कोनों में धकेल दिया है .......

वो कल मिली तो कहने लगी कि कि कभी फुर्सत में हो तो बैठेंगे ,बताईयेगा ! आज वो फिर मिली तो कहने लगी कि कुछ कहना है आपसे। मैं उसका हाथ थाम बैठ गयी। लगा कि रोना चाहती है पर वो मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी। कहने लगी डॉक्टर ने सब टेस्ट करा लिए ,दिक्कत कहीं नहीं पर सर में तेज दर्द रहता है और जी करता है कि कहीं जा के जी भर के रो लूं।

मैं हैरान नहीं थी और मन में सवाल भी नहीं थे , क्यों नहीं थे इसका जवाब मेरे पास नहीं है। खैर , कहना उसको था और वो कहती जा रही थी।

जिंदगी इससे अच्छी क्या होगी दी कि मकान की जगह बंगला ,गाड़ी की जगह गाड़ियां मिलीं। पति ऐसे कि ये भी नहीं पूछते कि पैसा कब ,कहाँ ,कितना खर्च किया ,क्यों किया और ये भी नहीं कि ये क्यों नहीं किया या वो क्यों नहीं ! सास ऐसी कि पूछती हैं कि शाम को सब्जी क्या बनाएंगे ! बेटियां भी इन दिनों मेरा गुस्सा झेल रही हैं ! घर में सब कुछ मन का है पर मन ही नहीं लगता ?

क्या लगता है ,क्या चाहती हो ?
मैं चाहती हूँ कि कोई कहे कि ऐसा क्यों नहीं किया ? कैसे क्या करना है मुझसे पूछे ,मुझसे सवाल करे ? पति मुझसे कहें कि क्या है ये सब ? क्यों किया ,क्यों न किया ? सास ये क्यों नहीं कहतीं कि आज रात खाने में यही बनेगा !
ऐसा हो जाये तो क्या सब ठीक होगा ?
पता नहीं पर मुझे कुछ ठीक नहीं  लग रहा ! डॉक्टर तनाव बता रहे हैं ,सब पूछते हैं दिक्कत क्या है ,बताओ ! अब क्या बताऊं ?

मैं ऐसी नहीं थी दी ! कभी भी नहीं ! मैं क्या करुं ? मैं इससे निकलना चाहती हूँ !

वो कहती जा रही थी। मैंने पूछा ,कभी इश्क़ किया है क्या जिंदगी में ?

हंस पड़ी वो ! कहने लगी ,आप भी ना ! अरे ऐसा तो कभी सोचा भी नहीं ,घर और कॉलेज बस और दोनों जगह दोस्तों और घरवालों के साथ ही समय अच्छा बीत गया। कभी कोई ख्याल भी नहीं आया फिर घरवालों की पसन्द से शादी हो गयी ,पति और परिवार में "खुश " हूँ।

सोशल मीडिया पर हो ? फेसबुक ,ट्विटर या वाहट्सएप्प वगैहरा ?

फेसबुक ,वाहट्सएप्प  पर हूं पर उसमें मन नहीं लगता ! क्यों बताऊं किसी को मैं कहाँ गयी , किसको मिली ,बच्चों के नम्बर कितने आये क्यों आये ?

पढ़ने के अलावा और क्या शौक था ,क्या पैशन था ,क्या ख्वाब देखा था जिंदगी को लेकर ?

अरे इतना कौन सोचता है ? शादी से पहले पेंटिंग का शौक था , कई साल इसमें खर्च किये ! मजा आता था। अब सब छोड़े अरसा हुआ !

तो अब करो ,वो सब करो जिसे छोड़े अरसा हुआ ,जिसे फिर करने का कभी सोचा नहीं ! वो सोचो !

एक गहरी उदासी फिर से पसर गयी उसकी आँखों में।

कर पाउंगी क्या फिर से ? लगता है जिंदगी खत्म सी हो गयी है .......

बात कर ही रही थी कि फोन बजा ,क्लास का समय हो चला था ! बात अधूरी रह गयी।

कल फिर बैठेंगे ,तुम आज जाओ और सोचना कि तुम एक बार फिर वो करो जो कभी सोचा नहीं कि कभी  फिर से करोगी ।

वो चली गयी ,मैं सोच रही थी कि जिंदगी की मासूमियत भी कातिलाना है। वो ऐसे सवाल उठा देती है कि खुद को झूठे जवाब देने में हम खुद को मार डालने पर मजबूर हो जाते हैं और वो साफ़ बरी हो जाती है।

निमिषा कल फिर आएगी ,मैं आपसे फिर हमारी मुलाकात साझा करूंगी । आप भी बताना कि उसके सवालों का मैं क्या जवाब दूं ?

चलते रहिये ,जिंदगी से सम्वाद करते रहिये !