Tuesday, 29 November 2016

नोटबंदी "आईटम" है ! नचाइये -गम भूल जाइये !

आगे कुछ भी लिखने से पहले बता दूं कि मुझे नहीं पता की नोटबंदी से किसी को क्या फायदा होगा और किसी को क्या नुकसान , ना ही मुझे इसका अर्थशास्त्र पता है ना ही मैं नीति की ज्ञाता ! इस शोर से बस इतना समझ पायी हूं कि ये भी राष्ट्रभक्ति  का कोई  "आईटम"  है जो देश के सामने उसके दुःख दर्दों को भुलाने में एनेस्थीसिया का असर करेगा |

ऐसा होता आया है ,पिछले तमाम अनुभव बताते हैं कि जब- जब समाज जीवन के बुनियादी प्रश्नों पर सत्ता को घेरता है, तब तब सत्ता पर काबिज चन्द रसूखदार उन प्रश्नों को चट कर जाने के लिए अपनी सेना सड़कों पर उतार देते हैं।

संघर्ष के जिस दौर से ये नेता बनते हैं ,उसी संघर्ष का ऑमलेट बना देते हैं। संघर्ष का वो दौर इनको वो सब हथियार चलाना सिखा देता है, जिसे हम आप अनैतिक और अमान्य करार देते रहे हैं।

नोटबंदी भी ऐसा ही "आईटम" बन के सामने आया है , जिसे गली- गली इन्हीं कम्पनियों की बदौलत नचाया जा रहा है | इस "आईटम"  को नोट में तब्दील करने के लिए मीडिया की  टीआरपी से लेकर तमाम टेलीकम्युनिकेशन कम्पनियों के जरिये उगाही हो रही है |

आप बताएं कि इस "आईटम"  का डांस कैसा लगा ? पसन्द आया तो एक दबाएं  और दूसरा गाने पे नचाना है तो दो दबाएं , जैसे विकल्प देकर एक सर्वे करवाया गया है।

अब बताइये जब आप ने उस एप्प को बनवाया तो उसको क्या सफेद में पैसा दिया , दिया तो क्यों दिया ? फिर जब आपने उसे डाउनलोड किया तो नेट का बिल भरा , क्यों भरा ? नाच देखने के लिए ही ना ! वो पैसा सफेद का था जो काला होने चला गया और ये काला लिबास पहने वो नोटबंदी का "आईटम" आपसे भरपूर सीटी बजवायेगा |

मजदूर को दिहाड़ी नहीं मिली लेकिन "आईटम" उसके सामने है , शाम को रोटी नहीं मिली तो "आईटम"  उसके सामने है ! जिनको लगता है इस आईटम से देश सेवा कर रहे हैं , वे दरसल वे लोग हैं जो गणेश जी को दूध पिला कर उनके गली -गली घूमने में उनकी मदद कर चुके हैं। अब "आईटम" देख उस थकान को मिटायेंगे , कमीशन ले कर दिन भर लाइन में  खड़े होंगे , पौवा दाब सो जाएंगे !

देश के नाम पर धर्म ,संस्कृति के नाम पर गाय और अब भ्र्ष्टाचार के नाम पर इस "आईटम" का इस्तेमाल देखिये ,सराहिए और लपलपाइये। मौका ...मौका........ चुनाव नजदीक हैं , इसको भुना लीजिये ,इसको नचा लीजिये ताकि पब्लिक ये ना पूछे कि नौकरी नहीं मिली ,डिग्री फर्जी क्यों हैं , लोकपाल कहाँ गया , माल्या भागा  कैसे , घोटाले के मुजरिम कहाँ हैं , चन्दे का हिसाब कहां है , बेटी मेरी क्यों , सिपाही शहीद क्यों ?

इसी "आईटम"  के बीच नजीब का सवाल भी गुम गया ? मां भी एटीएम की कतार में लगी होगी और बहन बैंक गयी होगी !

आप भी भूल जाइये , नोटबंदी के आईटम का मजा लें और अपना श्रम और गाढ़ी मेहनत की कमाई को रूप बदल के लटके -झटके दिखाते देखें ! चुनाव आएं तो इस "आईटम" को वोट में बदलते देखें फिर सरकार और फिर "आईटम" बनते देंखे।

यही नोटतंत्र है- यही नोटबंदी है।

विपक्ष को ऐसा लगता है लेकिन आप इसके ईमानदार पक्ष को देखिये और भ्र्ष्टाचार मुक्त भारत की सुंदर तस्वीर के लिए अपने घर का कौना-कोना तैयार कर लीजिये ! आखिर जीत तो इस भरोसे की ही होगी। आशावादी बने रहना ही लोकतंत्र की जीत है।

Sunday, 27 November 2016

जिंदगी तेरा समंदर होना मेरी आवारगी को भाने लगा है....

जिंदगी भी दिलचस्प है। पीछा छुड़ाओ तो दौड़ती आती है और उसके पीछे दौड़ो तो पीछे छोड़ जाती है। साया बन के चलती है पर साये सी ही बनी रखती है ! कभी सोचा ही नहीं ऐसे सवाल दे जाती है और कभी ऐसे जवाब दे जाती है जिन्हें मैंने कभी पूछा ही नहीं .......

वो ऐसे ही किसी सवाल सा है या जवाब है , नहीं पता पर वो जो भी है, साया बन लिपटा रहता है ... मेरे वजूद के साथ.......समंदर सा खामोश दिखने वाला उसका होना समंदर सा ही शोर करता है। एक पल में किनारों को तोड़ता चला आता है और मुझे बहा ले जाता है ..... दूसरे ही पल मैं फिर खुद को उसी किनारे पर खड़ा पाती हूँ। 

शाम जब सूरज पनाहों में आता है तो उसकी उलझने ,उसकी ख्वाहिशें परवान चढ़ने लगती हैं। चांद और उसके बीच की दूरी का हिसाब लगाने लहरें उफ़ान पे आ जाती हैं ...... पूनम से अमावस तक और फिर अमावस से पूनम तक यही खेला चलता रहता है। न चाँद समंदर का न समंदर चाँद तक की दूरी को माप पाता है। बची रहती तो जिद......... खलिश जो जाती ही नहीं !

नंगे पैर रेत में धंसाए, मैं भी चलती जाती हूँ , लहरें आती हैं और मेरे निशान समंदर के सिरहाने छोड़ आती हैं। अब मेरे आँचल की इतनी भी थाह कहां कि समंदर को उसमें ढांप लूं ...... वो मुझे आगोश में लिए जाना चाहता है और मैं , अपनी हदों से वाकिफ लहरों का आना जाना देख रही हूँ। 

वो जुल्फों से खेलता है ,कभी अपनी उंगलियां उलझाता है.... इस खेल में वो हंसता है , गुनगुनाता है और गुम जाता है ! ये उसकी आदत है, वो अपनी थाह लेने नहीं देना चाहता ..... मैं कभी चाँद बन उसके किनारे  की बालू रेत हो, उसे महसूस करती हूँ तो कभी स्याह रात में उसके साथ गुपचुप शोर किया करती हूं ! हम दोनों पागल हैं ,हम दोनों जिद्दी हैं। दोनों उलझे हैं और दोनों ही इश्क में हैं......

जिंदगी तेरा समंदर होना मेरी आवारगी को भाने लगा है...... मेरे  साथ यूँ ही सफर पर रहना , इस छोर से उस छोर तक तुम्हीं मिलना ! इस आवाज़ ने सांसों को रफ्तार दी है , अब मेरी माथे पर बिंदिया बन के दमकते रहना , मुझे गुनगुनाते रहना !

Tuesday, 18 October 2016

इस नाम से अब परेशानी होती है............

कई बार महसूस होता है जिंदगी घर के किसी कोने में रखी कोई ऐसी किताब है जिस के पहले पन्ने पर मेरा नाम तो लिखा है पर पढा इसे मैंने भी नहीं है। 
उलझते उलझते शाम हो चली है मैं फिर उलझ जाती हूँ और फिर उस किताब को देखने लगती हूँ.......उसे उठाती हूँ ,पन्ने पलटती हूँ पर सवालों के जवाब उसमें कभी मिले ही नहीं ! बेकार की कवायद है। इस किताब का क्या कीजे , इस नाम का क्या कीजे ? मेरी पहचान ने मेरी निजता निगल ली है | 

इस नाम से अब परेशानी होती है। लापता हो जाया जाए और कोई ऐसी जगह जाया जाए जहाँ मेरी कोई पहचान न हो। लोग जितना पहचानने लगते हैं उतने  ही खुद से अजनबी होते जाते हैं। पहचान के साथ जुड़े रिश्ते और उन रिश्तों की अपेक्षाएं अक्सर सलाखें लगने लगती हैं। ये अपेक्षाएं भी समंदर हैं ,खारा पानी किसकी प्यास बुझा पाया है ? 

पेड़ ,पहाड़ ,जंगल हो जाना चाहती हूँ। झील से आजाद हो दरिया हो जाना चाहती हूँ। सामान के समंदर में फेंक दी जाने वाली जिंदगी से क्या खोज निकालने की सम्भावना है। सामान ने भी चन्द महीनों बाद कबाड़ ही होना होता है और सामान के साथ आयी खुशी भी उसको अबेरते अबेरते कबाड़ में बदलने लगती है। 

मोह के कुछ धागे रंगे हैं ,कुछ कच्चे -कुछ पक्के हैं ! देह के मिट्टी होने तक इन धागों में बंधे रहना भी नियति है। मन की मिट्टी गीली है ,दरकने लगती है। जो ये भरम पाले हैं कि वो सहारा हैं ,वे भी धसक जाते हैं तो नए सहारे उग आते हैं और फिर कोई फिर से खड़ा हो जाता है। 

 सब सलाखों ने अपने इर्दगिर्द सलाखें उगा ली हैं ! किसी को रिश्तों का, किसी को संस्कारों का, किसी को समाज का नाम दे दिया है। आप बेशक तर्क दें कि नियम बिना समाज नहीं चलता पर मैं समाज नहीं "मैं " होकर जीने की आजादी चाहती हूँ। हम सब चाहते हैं पर देना नहीं चाहते इसलिए कि आजाद करने में सुरक्षा घेरा टूट जाता है और इसलिए भी कि सबके भीतर गुम हो जाने का ड़र है। 

........पर मैं गुम जाना चाहती हूं ऐसे कि किसी को न मिलूं। आसमान पार  की रूहानी दुनिया  और चाँद  सिरहाना चाहिए मुझे ! 

ख्वाहिशें ऐसी हैं कि खानाबदोश हूँ कोई ........ इस यायावरी ने कितने मंजर देखे हैं और और कितने और बाकी हैं ,पता नहीं पर ये तय है कि इसी दुनिया , इन्हीं रिश्तों के बीच मेरा अपना एक इमरोज , मेरा अपना कोई साहिर है। अमृता हो जाना कितना मुश्किल रहा होगा पर नामुमकिन तो नहीं था ना.......... !

नज़्म गुनगुनाइए और चलिए साथ उस सतरंगे आसमान के नीचे , उसके पार किसी पगडंडी पर आज़ाद कदमों से...... जिंदगी के हाथों में हाथ दीजिये और हवाओं में उसके जिस्म को भर लीजिये ! 

चलते रहिये , मिलेंगे हम किसी रोज किसी अनजानी सी जगह और उंगलियों को उलझाये चाय साझा करेंगे !


Monday, 3 October 2016

क्या जवाब दूं निमिषा को ? गैजेट्स ने जिंदगी को कोनों में धकेल दिया है .......

वो कल मिली तो कहने लगी कि कि कभी फुर्सत में हो तो बैठेंगे ,बताईयेगा ! आज वो फिर मिली तो कहने लगी कि कुछ कहना है आपसे। मैं उसका हाथ थाम बैठ गयी। लगा कि रोना चाहती है पर वो मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी। कहने लगी डॉक्टर ने सब टेस्ट करा लिए ,दिक्कत कहीं नहीं पर सर में तेज दर्द रहता है और जी करता है कि कहीं जा के जी भर के रो लूं।

मैं हैरान नहीं थी और मन में सवाल भी नहीं थे , क्यों नहीं थे इसका जवाब मेरे पास नहीं है। खैर , कहना उसको था और वो कहती जा रही थी।

जिंदगी इससे अच्छी क्या होगी दी कि मकान की जगह बंगला ,गाड़ी की जगह गाड़ियां मिलीं। पति ऐसे कि ये भी नहीं पूछते कि पैसा कब ,कहाँ ,कितना खर्च किया ,क्यों किया और ये भी नहीं कि ये क्यों नहीं किया या वो क्यों नहीं ! सास ऐसी कि पूछती हैं कि शाम को सब्जी क्या बनाएंगे ! बेटियां भी इन दिनों मेरा गुस्सा झेल रही हैं ! घर में सब कुछ मन का है पर मन ही नहीं लगता ?

क्या लगता है ,क्या चाहती हो ?
मैं चाहती हूँ कि कोई कहे कि ऐसा क्यों नहीं किया ? कैसे क्या करना है मुझसे पूछे ,मुझसे सवाल करे ? पति मुझसे कहें कि क्या है ये सब ? क्यों किया ,क्यों न किया ? सास ये क्यों नहीं कहतीं कि आज रात खाने में यही बनेगा !
ऐसा हो जाये तो क्या सब ठीक होगा ?
पता नहीं पर मुझे कुछ ठीक नहीं  लग रहा ! डॉक्टर तनाव बता रहे हैं ,सब पूछते हैं दिक्कत क्या है ,बताओ ! अब क्या बताऊं ?

मैं ऐसी नहीं थी दी ! कभी भी नहीं ! मैं क्या करुं ? मैं इससे निकलना चाहती हूँ !

वो कहती जा रही थी। मैंने पूछा ,कभी इश्क़ किया है क्या जिंदगी में ?

हंस पड़ी वो ! कहने लगी ,आप भी ना ! अरे ऐसा तो कभी सोचा भी नहीं ,घर और कॉलेज बस और दोनों जगह दोस्तों और घरवालों के साथ ही समय अच्छा बीत गया। कभी कोई ख्याल भी नहीं आया फिर घरवालों की पसन्द से शादी हो गयी ,पति और परिवार में "खुश " हूँ।

सोशल मीडिया पर हो ? फेसबुक ,ट्विटर या वाहट्सएप्प वगैहरा ?

फेसबुक ,वाहट्सएप्प  पर हूं पर उसमें मन नहीं लगता ! क्यों बताऊं किसी को मैं कहाँ गयी , किसको मिली ,बच्चों के नम्बर कितने आये क्यों आये ?

पढ़ने के अलावा और क्या शौक था ,क्या पैशन था ,क्या ख्वाब देखा था जिंदगी को लेकर ?

अरे इतना कौन सोचता है ? शादी से पहले पेंटिंग का शौक था , कई साल इसमें खर्च किये ! मजा आता था। अब सब छोड़े अरसा हुआ !

तो अब करो ,वो सब करो जिसे छोड़े अरसा हुआ ,जिसे फिर करने का कभी सोचा नहीं ! वो सोचो !

एक गहरी उदासी फिर से पसर गयी उसकी आँखों में।

कर पाउंगी क्या फिर से ? लगता है जिंदगी खत्म सी हो गयी है .......

बात कर ही रही थी कि फोन बजा ,क्लास का समय हो चला था ! बात अधूरी रह गयी।

कल फिर बैठेंगे ,तुम आज जाओ और सोचना कि तुम एक बार फिर वो करो जो कभी सोचा नहीं कि कभी  फिर से करोगी ।

वो चली गयी ,मैं सोच रही थी कि जिंदगी की मासूमियत भी कातिलाना है। वो ऐसे सवाल उठा देती है कि खुद को झूठे जवाब देने में हम खुद को मार डालने पर मजबूर हो जाते हैं और वो साफ़ बरी हो जाती है।

निमिषा कल फिर आएगी ,मैं आपसे फिर हमारी मुलाकात साझा करूंगी । आप भी बताना कि उसके सवालों का मैं क्या जवाब दूं ?

चलते रहिये ,जिंदगी से सम्वाद करते रहिये !




Tuesday, 20 September 2016

रिश्ते कभी सहूलियत के लिए गढे जाते हैं और कभी सहूलियतें रिश्तों को मुकर्रर करती हैं........

आसान नहीं होता दीवार हो जाना या सड़क बन जाना ,चाहने से कुछ होता भी नहीं ! होना ही होता है तो वक्त के हाथ से ही होता है ,हमें सिर्फ हमारे होने का भरम होता है पर होना कुछ और ही होता है।

जिंदगी की तेज रफ्तारी में पलों को बरस और बरसों को जन्मों में बदलते देखा है। विडम्बना ये है कि जितना बदलते देखा है उसमें से बदला कुछ भी नहीं , सिवा चेहरों के ! किरदार बदल के हर बार वही चेहरे किसी नए मुखौटे के साथ हमारे सामने आ खड़े होते हैं।

तुमने सही कहा है , मैं रिश्तों पर बहुत कुछ लिखती हूँ ......... पर समझती नहीं हूँ। ये सच है कि हम में से हर कोई इस सच को जानता है पर मानता फिर भी नहीं और माने भी कैसे ? रिश्ते कभी सहूलियत के लिए गढे जाते हैं और कभी सहूलियतें रिश्तों को मुकर्रर करती हैं। मुकम्मल दोनों ही नहीं होते ! ईमानदारी दोनों ही परिस्थितियों में नहीं होती। बेईमानी की परिभाषा किसी के लिए सहूलियतों की वो छत है जिसे हम अपने निज की चाह के आधार पर गढ़ते हैं और किसी के लिए जीवन मृत्य का प्रश्न !

छलना जीवन की परछाई है और अनवरत शोर करने वाली वो तन्हाई है जिसकी चीखें अक्सर सोने नहीं देतीं। अक्सर लोग शिकायतें करते मिलते हैं और अपने अपनी किसी उलझन से दूर भाग , किसी सच से पीछा छुड़ा लेना चाहते हैं। कन्धा ढूंढने की चाह में एक बार फिर अपनी लिए एक और चाहना की चिता सजा लेते हैं।

एक ही उम्र में हजार बार मरना और हर बरस उतनी ही धूम से जनम दिन मना लेना, कैसे करते हैं लोग ?

हकीकत से  कोसों दूर ख्वाहिशों का संसार बस जाता है।  ख्वाबों की परियां अक्सर मेरी उंगली थाम मुझे तुम तक ले जाती हैं। मैं जागने पर भटकती नहीं हूँ ,हाँ सोते हुए भटकने के ड़र से अक्सर उस ख्वाब को खो बैठती हूँ। तुम हकीकत में एक ख्वाब हो जो मुझे मेरी उम्र से बहुत दूर ले आया है। ये खूबसूरत एहसास है और उंगलियों में उलझे तुम्हारे सवालों और तुम्हारी खामोशियों में दीवार बन गया है।

मेरी चाहना इस दीवार के टेक लिए बैठी है। सड़क हो गयी हूँ मैं...... तुम तक पहुंची भी और नहीं भी , आगे बढ़ गयी हूँ और पीछे कुछ छोड़ के भी नहीं आयी। तुम मेरे साथ चले आये हो ये जानते हुए भी की सड़क का कोई छोर नहीं होता।

सुनो , जिंदगी चाय का प्याला नहीं है ,न शराब की बोतल ! नशे के चढ़ने से उतरने के बीच मैं हूँ पर उसके सिवा मेरा होना और तुम्हारा ना होना भी उतना ही सच है जितना तुम्हारा हर वक्त नशे में रहने की चाह रखना !

ये सफर है दोस्त , साथ चलो न चलो...... कोई विकल्प वक्त मर्जी से नहीं देता। कदम और रूह हमेशा एक साथ हों इसकी जाँच का कोई पैमाना  दुनिया बना ही नहीं सकती। साथ के लिए तुम कोई क़ानून बना सकते हो पर किन पलों में कौन साथ होता है इसकी सच्चाई को कोई जज महसूस भी नहीं कर सकता ....... इसीलिये दोस्त, दीवार बनकर कोई निर्णय की लकीर खींच भी दो तो भी सड़क उस दीवार को किसी और दीवार से जोड़ ही देती है।

कभी शाम बन के आंगन में उतर जाना और मेरे आँचल पर ग़ज़ल का कोई मिसरा लिखना फिर देखना कि असल  होने और असल जीने में उतना ही फर्क है जितना मेरे मरने और हर रोज जिन्दा होकर एक चाँद बन खिड़की में टिकने में है।

सवालों को छोड़ अब जवाब में आसमां होना सीख लो , मेरी तुम्हारी मुलाकात अब हर रोज वहीं होती है जहाँ सुबह तक हम ख्वाहिशों के सितारे लपेटे अपने लिए नया सूरज गढ़ लेते हैं ! यही हमारा सच है , जितना जल्दी स्वीकार कर लोगे रास्ता उतना आसान हो जाएगा।




Sunday, 18 September 2016

मैं वहीं मिलूंगी और तुमको एक बार फिर से थाम लूंगी ......... मैं जिन्दगी हूँ तुम्हारी !

कोई भी सफर पूरा नहीं होता और अधूरा भी नहीं रहता। कुछ चेहरे ,कुछ बातें ,कुछ लम्हे ,कुछ सच और कुछ झूठ,अधूरे -अनगढ़ से हम सबके बीच तमाम उम्र बसे रहते हैं।

नाम भूल सकते हैं , बातें धुंधली हो सकती हैं लेकिन रास्ते के हर पत्थर पर किसी पुरानी हवेली की तरह उनका होना झुठलाया नहीं जा सकता। अतीत से आजाद होना आसां नहीं है पर नामुमकिन भी नहीं बशर्ते उसे धारा के विरुद्ध न मोड़ा जाए। अपने आप को ,अपने अपनों को ,अपनी कमजोरियों को और अपने सपनों को अपनी ढाल बनाये बिना हम जीत सकते हैं ,आगे बढ़ सकते हैं। 

ये कहाँ जरूरी है कि टूट जाया जाए ,ये कहाँ जरूरी है कि तोड़ दिया जाए ? कुछ सबक याद करने के लिए होते हैं जिन्हें याद कर लेना ही काफी है , वजन लेकर कब तक दौड़ लगाईयेगा ? मुस्कुराईये कि वक्त वो बीत गया ,सूरज फिर निकला है और वक्त ने फिर मोहलत दी है। 

नाइन्साफी की शिकायत कब तक कीजियेगा और किससे कीजियेगा ? यहाँ हर कोई मसरूफ है ,हर कोई अपनी ही उलझनों और ख्वाहिशों में कैद है। जाने दीजिये , बहने दीजिये !  

मैं पढ़ रही हूँ और उसकी उलझनों को जी रही हूँ। ये दौर मुश्किल जरूर है पर संभलने के रास्ते किसी के लिए पेटेंट नहीं हैं। हम गलतियों की माटी से गढ़े पुतले में अपनी जान फूंक उसे खुद की शक्ल देने में उम्र जाया कर देते हैं , जिसका हासिल निल बटा सन्नाटा होता है। एक के बाद एक ........ और फिर कोई एक ख्वाब शॉर्टकट दिखा जाता है जो असल से फिर दूर ले जाता है और एक बार फिर एक और गलती ! हर बार भाग्य को भी क्या दोष दीजियेगा और खुद को भी क्या कहियेगा ? 

मन भोला पंछी है खुद ही खुद को बहला लेता है और खुद ही खुद को आज़ाद मान बैठता है। रात को परिंदे को आज़ाद किया भी तो क्या किया ,उजालों में नीड़ ढूंढते तो बात थी। 

तुम्हारे सपनों की दौड़ तुमसे ही हार रही है। जीतने की जंग क्या लडनी है, जीने के लिए जिओ पर उनके लिए भी जियो जो तुम्हारी जीत के लिए सपना देख रहे हैं। वक्त दरिया की मानिंद है , बहता रहता है उस पर अपना नाम मत लिखो ! किश्ती बन जाओ और बह निकलो दूर वहां जहाँ जमीन और आसमान एक हो रहे हैं। 

मैं वहीं मिलूंगी और तुमको एक बार फिर से थाम लूंगी ......... मैं जिन्दगी हूँ तुम्हारी ! चले आओ !

रवीश से बेहतर कोई नहीं है !

आजकल रवीश ट्विटर पर नहीं हैं , फेसबुक से भी गायब हैं। एक क्षण को अच्छा नहीं लगता रवीश का दोनों जगह से गायब होना पर दूसरे  ही क्षण लगता है कि अच्छा ही है यहाँ नहीं होना !

क्यों किसी की वजह से वो अपनों पर ,अपने आप को लोगों की गन्द से तरबतर करें ? उनकी गन्दी भाषा और घटिया स्तर से अपने चरित्र को बाजार की चीज बना दें ? सोशल मीडिया पर लोकप्रियता की कीमत ने उन लोगों को हमारी पहुंच से दूर कर दिया जो वास्तव में पढ़ने ,सुनने और जीने लायक हैं। 

140 शब्दों में बारामुला के फ्लाईओवर से गाज़ियाबाद के जाम के किस्से और उनके घर लौटे हुए FM पर बजते हुए गाने , सब कुछ ख़ूबसूरत सा आँखों के सामने से गुजरता रहता था। 

चीन की खबरें मैं भी पढ़ सकती हूँ पर गुरूजी पाठ पढाते थे तो पाठ जल्दी समझ आता था........ हाहाहाहा ! सच में नोट्स बने बनाये मिलें तो मेहनत कौन करे।  रवीश के प्राइमटाइम का इंट्रो भी ऐसा ही होता है ,जब वो एक साँस में , बिना पानी पीये पूरी लीलावती - कलावती सुना जाते हैं....... मैं पानी पी लेती हूँ ,इंट्रो सुनकर ! 

ये भी कमाल है और वो भी कमाल है , बात वही होती  है जो हर चैनल पर हो रही होती है पर रवीश जब उसी बात को  कहते हैं तो बात वो नहीं होती जो हो रही होती है। निष्पक्षता की उम्मीद में रवीश से नहीं रखती , क्यों रखूँ ? पत्रकार हैं  ,सवाल करना और हर एक से सवाल ,तीखे सवाल भी करते हैं पर कुछ एक अनुभवों से वो भी गुज़रे होंगे जैसे आप हम गुज़रते हैं तो राय बन ही जाती है और न भी बने तो कहीं न कहीं कोई सच हमारे भीतर पलता बढ़ता है ही। 

भाषा की मर्यादा और भाषा के चयन में सावधानी बरतने में रवीश से बेहतर कोई नहीं। वो मना करते हैं कि प्रशंसक न बनिये पर मैं प्रशंसा तो कर ही सकती हूँ न । 

कोई कितनी भी आलोचना करे पर ये स्वीकार करने में किसी भी स्वस्थ मानस को तकलीफ नहीं होनी चाहिये कि पत्रकारिता के दिन ब दिन गिरते स्तर में रवीश आज भी उन मूल्यों को जिन्दा रखे हैं जिनको जिन्दा रखने में वे खुद कितने  मुश्किल दौर से गुज़रे होंगे , कल्पना करना भी कठिन है। 

रवीश , आप भले ही ट्विटर -फेसबुक से गायब रहें पर हमतक आपकी बात पहुंच ही जाती है । नीली कमीज -सुर्ख टाई और ग्रे मेरा पसन्दीदा सम्वाद है। आप के अनकहे शब्द उनसे उपजी आपकी उलझन भी कैमरा पढ़ के हम तक पहुंचा ही देता है । 

रवीश की रिपोर्ट को भी मिस कर रही हूँ। कभी प्रेम नगर की उन गलियों में जहाँ चुनावों से पहले आप गए थे और उन बस्तियों में जहाँ कोई और नहीं जाता ,एक बार फिर ले चलिए , इसलिए नहीं कि क्या बदला इसलिए कि कुछ नहीं बदलता । हवा किसी की भी हो , राजनीति में जिंदगी के सवाल टिक नहीं पाते। 

इंतज़ार रहेगा , मैं रवीश कुमार का प्राइम टाइम में ......... अरे हाँ ! साउंड क्लाउड पर भी लम्बे समय से आपकी कोई रिकॉर्डिंग नहीं है। 

अब इतनी सारी जगह रवीश हैं पर नहीं हैं। कुछ और रवीश चाहिए ,कुछ और आवाज़ें चाहिये इस व्यवस्था को जो उनको आवाज़ दे जिनकी आवाज़ को कोई सुनना नहीं चाहता। क्या पता ऐसा कब हो और हो भी तो कब सामने आये ?

खैर ,चलते रहिये ! टीवी कम देखिये और देखिये भी तो केवल प्राइम टाइम देखिये और वो भी रवीश के साथ ! प्रणाम !