Monday, 3 October 2016

क्या जवाब दूं निमिषा को ? गैजेट्स ने जिंदगी को कोनों में धकेल दिया है .......

वो कल मिली तो कहने लगी कि कि कभी फुर्सत में हो तो बैठेंगे ,बताईयेगा ! आज वो फिर मिली तो कहने लगी कि कुछ कहना है आपसे। मैं उसका हाथ थाम बैठ गयी। लगा कि रोना चाहती है पर वो मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी। कहने लगी डॉक्टर ने सब टेस्ट करा लिए ,दिक्कत कहीं नहीं पर सर में तेज दर्द रहता है और जी करता है कि कहीं जा के जी भर के रो लूं।

मैं हैरान नहीं थी और मन में सवाल भी नहीं थे , क्यों नहीं थे इसका जवाब मेरे पास नहीं है। खैर , कहना उसको था और वो कहती जा रही थी।

जिंदगी इससे अच्छी क्या होगी दी कि मकान की जगह बंगला ,गाड़ी की जगह गाड़ियां मिलीं। पति ऐसे कि ये भी नहीं पूछते कि पैसा कब ,कहाँ ,कितना खर्च किया ,क्यों किया और ये भी नहीं कि ये क्यों नहीं किया या वो क्यों नहीं ! सास ऐसी कि पूछती हैं कि शाम को सब्जी क्या बनाएंगे ! बेटियां भी इन दिनों मेरा गुस्सा झेल रही हैं ! घर में सब कुछ मन का है पर मन ही नहीं लगता ?

क्या लगता है ,क्या चाहती हो ?
मैं चाहती हूँ कि कोई कहे कि ऐसा क्यों नहीं किया ? कैसे क्या करना है मुझसे पूछे ,मुझसे सवाल करे ? पति मुझसे कहें कि क्या है ये सब ? क्यों किया ,क्यों न किया ? सास ये क्यों नहीं कहतीं कि आज रात खाने में यही बनेगा !
ऐसा हो जाये तो क्या सब ठीक होगा ?
पता नहीं पर मुझे कुछ ठीक नहीं  लग रहा ! डॉक्टर तनाव बता रहे हैं ,सब पूछते हैं दिक्कत क्या है ,बताओ ! अब क्या बताऊं ?

मैं ऐसी नहीं थी दी ! कभी भी नहीं ! मैं क्या करुं ? मैं इससे निकलना चाहती हूँ !

वो कहती जा रही थी। मैंने पूछा ,कभी इश्क़ किया है क्या जिंदगी में ?

हंस पड़ी वो ! कहने लगी ,आप भी ना ! अरे ऐसा तो कभी सोचा भी नहीं ,घर और कॉलेज बस और दोनों जगह दोस्तों और घरवालों के साथ ही समय अच्छा बीत गया। कभी कोई ख्याल भी नहीं आया फिर घरवालों की पसन्द से शादी हो गयी ,पति और परिवार में "खुश " हूँ।

सोशल मीडिया पर हो ? फेसबुक ,ट्विटर या वाहट्सएप्प वगैहरा ?

फेसबुक ,वाहट्सएप्प  पर हूं पर उसमें मन नहीं लगता ! क्यों बताऊं किसी को मैं कहाँ गयी , किसको मिली ,बच्चों के नम्बर कितने आये क्यों आये ?

पढ़ने के अलावा और क्या शौक था ,क्या पैशन था ,क्या ख्वाब देखा था जिंदगी को लेकर ?

अरे इतना कौन सोचता है ? शादी से पहले पेंटिंग का शौक था , कई साल इसमें खर्च किये ! मजा आता था। अब सब छोड़े अरसा हुआ !

तो अब करो ,वो सब करो जिसे छोड़े अरसा हुआ ,जिसे फिर करने का कभी सोचा नहीं ! वो सोचो !

एक गहरी उदासी फिर से पसर गयी उसकी आँखों में।

कर पाउंगी क्या फिर से ? लगता है जिंदगी खत्म सी हो गयी है .......

बात कर ही रही थी कि फोन बजा ,क्लास का समय हो चला था ! बात अधूरी रह गयी।

कल फिर बैठेंगे ,तुम आज जाओ और सोचना कि तुम एक बार फिर वो करो जो कभी सोचा नहीं कि कभी  फिर से करोगी ।

वो चली गयी ,मैं सोच रही थी कि जिंदगी की मासूमियत भी कातिलाना है। वो ऐसे सवाल उठा देती है कि खुद को झूठे जवाब देने में हम खुद को मार डालने पर मजबूर हो जाते हैं और वो साफ़ बरी हो जाती है।

निमिषा कल फिर आएगी ,मैं आपसे फिर हमारी मुलाकात साझा करूंगी । आप भी बताना कि उसके सवालों का मैं क्या जवाब दूं ?

चलते रहिये ,जिंदगी से सम्वाद करते रहिये !




Tuesday, 20 September 2016

रिश्ते कभी सहूलियत के लिए गढे जाते हैं और कभी सहूलियतें रिश्तों को मुकर्रर करती हैं........

आसान नहीं होता दीवार हो जाना या सड़क बन जाना ,चाहने से कुछ होता भी नहीं ! होना ही होता है तो वक्त के हाथ से ही होता है ,हमें सिर्फ हमारे होने का भरम होता है पर होना कुछ और ही होता है।

जिंदगी की तेज रफ्तारी में पलों को बरस और बरसों को जन्मों में बदलते देखा है। विडम्बना ये है कि जितना बदलते देखा है उसमें से बदला कुछ भी नहीं , सिवा चेहरों के ! किरदार बदल के हर बार वही चेहरे किसी नए मुखौटे के साथ हमारे सामने आ खड़े होते हैं।

तुमने सही कहा है , मैं रिश्तों पर बहुत कुछ लिखती हूँ ......... पर समझती नहीं हूँ। ये सच है कि हम में से हर कोई इस सच को जानता है पर मानता फिर भी नहीं और माने भी कैसे ? रिश्ते कभी सहूलियत के लिए गढे जाते हैं और कभी सहूलियतें रिश्तों को मुकर्रर करती हैं। मुकम्मल दोनों ही नहीं होते ! ईमानदारी दोनों ही परिस्थितियों में नहीं होती। बेईमानी की परिभाषा किसी के लिए सहूलियतों की वो छत है जिसे हम अपने निज की चाह के आधार पर गढ़ते हैं और किसी के लिए जीवन मृत्य का प्रश्न !

छलना जीवन की परछाई है और अनवरत शोर करने वाली वो तन्हाई है जिसकी चीखें अक्सर सोने नहीं देतीं। अक्सर लोग शिकायतें करते मिलते हैं और अपने अपनी किसी उलझन से दूर भाग , किसी सच से पीछा छुड़ा लेना चाहते हैं। कन्धा ढूंढने की चाह में एक बार फिर अपनी लिए एक और चाहना की चिता सजा लेते हैं।

एक ही उम्र में हजार बार मरना और हर बरस उतनी ही धूम से जनम दिन मना लेना, कैसे करते हैं लोग ?

हकीकत से  कोसों दूर ख्वाहिशों का संसार बस जाता है।  ख्वाबों की परियां अक्सर मेरी उंगली थाम मुझे तुम तक ले जाती हैं। मैं जागने पर भटकती नहीं हूँ ,हाँ सोते हुए भटकने के ड़र से अक्सर उस ख्वाब को खो बैठती हूँ। तुम हकीकत में एक ख्वाब हो जो मुझे मेरी उम्र से बहुत दूर ले आया है। ये खूबसूरत एहसास है और उंगलियों में उलझे तुम्हारे सवालों और तुम्हारी खामोशियों में दीवार बन गया है।

मेरी चाहना इस दीवार के टेक लिए बैठी है। सड़क हो गयी हूँ मैं...... तुम तक पहुंची भी और नहीं भी , आगे बढ़ गयी हूँ और पीछे कुछ छोड़ के भी नहीं आयी। तुम मेरे साथ चले आये हो ये जानते हुए भी की सड़क का कोई छोर नहीं होता।

सुनो , जिंदगी चाय का प्याला नहीं है ,न शराब की बोतल ! नशे के चढ़ने से उतरने के बीच मैं हूँ पर उसके सिवा मेरा होना और तुम्हारा ना होना भी उतना ही सच है जितना तुम्हारा हर वक्त नशे में रहने की चाह रखना !

ये सफर है दोस्त , साथ चलो न चलो...... कोई विकल्प वक्त मर्जी से नहीं देता। कदम और रूह हमेशा एक साथ हों इसकी जाँच का कोई पैमाना  दुनिया बना ही नहीं सकती। साथ के लिए तुम कोई क़ानून बना सकते हो पर किन पलों में कौन साथ होता है इसकी सच्चाई को कोई जज महसूस भी नहीं कर सकता ....... इसीलिये दोस्त, दीवार बनकर कोई निर्णय की लकीर खींच भी दो तो भी सड़क उस दीवार को किसी और दीवार से जोड़ ही देती है।

कभी शाम बन के आंगन में उतर जाना और मेरे आँचल पर ग़ज़ल का कोई मिसरा लिखना फिर देखना कि असल  होने और असल जीने में उतना ही फर्क है जितना मेरे मरने और हर रोज जिन्दा होकर एक चाँद बन खिड़की में टिकने में है।

सवालों को छोड़ अब जवाब में आसमां होना सीख लो , मेरी तुम्हारी मुलाकात अब हर रोज वहीं होती है जहाँ सुबह तक हम ख्वाहिशों के सितारे लपेटे अपने लिए नया सूरज गढ़ लेते हैं ! यही हमारा सच है , जितना जल्दी स्वीकार कर लोगे रास्ता उतना आसान हो जाएगा।




Sunday, 18 September 2016

मैं वहीं मिलूंगी और तुमको एक बार फिर से थाम लूंगी ......... मैं जिन्दगी हूँ तुम्हारी !

कोई भी सफर पूरा नहीं होता और अधूरा भी नहीं रहता। कुछ चेहरे ,कुछ बातें ,कुछ लम्हे ,कुछ सच और कुछ झूठ,अधूरे -अनगढ़ से हम सबके बीच तमाम उम्र बसे रहते हैं।

नाम भूल सकते हैं , बातें धुंधली हो सकती हैं लेकिन रास्ते के हर पत्थर पर किसी पुरानी हवेली की तरह उनका होना झुठलाया नहीं जा सकता। अतीत से आजाद होना आसां नहीं है पर नामुमकिन भी नहीं बशर्ते उसे धारा के विरुद्ध न मोड़ा जाए। अपने आप को ,अपने अपनों को ,अपनी कमजोरियों को और अपने सपनों को अपनी ढाल बनाये बिना हम जीत सकते हैं ,आगे बढ़ सकते हैं। 

ये कहाँ जरूरी है कि टूट जाया जाए ,ये कहाँ जरूरी है कि तोड़ दिया जाए ? कुछ सबक याद करने के लिए होते हैं जिन्हें याद कर लेना ही काफी है , वजन लेकर कब तक दौड़ लगाईयेगा ? मुस्कुराईये कि वक्त वो बीत गया ,सूरज फिर निकला है और वक्त ने फिर मोहलत दी है। 

नाइन्साफी की शिकायत कब तक कीजियेगा और किससे कीजियेगा ? यहाँ हर कोई मसरूफ है ,हर कोई अपनी ही उलझनों और ख्वाहिशों में कैद है। जाने दीजिये , बहने दीजिये !  

मैं पढ़ रही हूँ और उसकी उलझनों को जी रही हूँ। ये दौर मुश्किल जरूर है पर संभलने के रास्ते किसी के लिए पेटेंट नहीं हैं। हम गलतियों की माटी से गढ़े पुतले में अपनी जान फूंक उसे खुद की शक्ल देने में उम्र जाया कर देते हैं , जिसका हासिल निल बटा सन्नाटा होता है। एक के बाद एक ........ और फिर कोई एक ख्वाब शॉर्टकट दिखा जाता है जो असल से फिर दूर ले जाता है और एक बार फिर एक और गलती ! हर बार भाग्य को भी क्या दोष दीजियेगा और खुद को भी क्या कहियेगा ? 

मन भोला पंछी है खुद ही खुद को बहला लेता है और खुद ही खुद को आज़ाद मान बैठता है। रात को परिंदे को आज़ाद किया भी तो क्या किया ,उजालों में नीड़ ढूंढते तो बात थी। 

तुम्हारे सपनों की दौड़ तुमसे ही हार रही है। जीतने की जंग क्या लडनी है, जीने के लिए जिओ पर उनके लिए भी जियो जो तुम्हारी जीत के लिए सपना देख रहे हैं। वक्त दरिया की मानिंद है , बहता रहता है उस पर अपना नाम मत लिखो ! किश्ती बन जाओ और बह निकलो दूर वहां जहाँ जमीन और आसमान एक हो रहे हैं। 

मैं वहीं मिलूंगी और तुमको एक बार फिर से थाम लूंगी ......... मैं जिन्दगी हूँ तुम्हारी ! चले आओ !

रवीश से बेहतर कोई नहीं है !

आजकल रवीश ट्विटर पर नहीं हैं , फेसबुक से भी गायब हैं। एक क्षण को अच्छा नहीं लगता रवीश का दोनों जगह से गायब होना पर दूसरे  ही क्षण लगता है कि अच्छा ही है यहाँ नहीं होना !

क्यों किसी की वजह से वो अपनों पर ,अपने आप को लोगों की गन्द से तरबतर करें ? उनकी गन्दी भाषा और घटिया स्तर से अपने चरित्र को बाजार की चीज बना दें ? सोशल मीडिया पर लोकप्रियता की कीमत ने उन लोगों को हमारी पहुंच से दूर कर दिया जो वास्तव में पढ़ने ,सुनने और जीने लायक हैं। 

140 शब्दों में बारामुला के फ्लाईओवर से गाज़ियाबाद के जाम के किस्से और उनके घर लौटे हुए FM पर बजते हुए गाने , सब कुछ ख़ूबसूरत सा आँखों के सामने से गुजरता रहता था। 

चीन की खबरें मैं भी पढ़ सकती हूँ पर गुरूजी पाठ पढाते थे तो पाठ जल्दी समझ आता था........ हाहाहाहा ! सच में नोट्स बने बनाये मिलें तो मेहनत कौन करे।  रवीश के प्राइमटाइम का इंट्रो भी ऐसा ही होता है ,जब वो एक साँस में , बिना पानी पीये पूरी लीलावती - कलावती सुना जाते हैं....... मैं पानी पी लेती हूँ ,इंट्रो सुनकर ! 

ये भी कमाल है और वो भी कमाल है , बात वही होती  है जो हर चैनल पर हो रही होती है पर रवीश जब उसी बात को  कहते हैं तो बात वो नहीं होती जो हो रही होती है। निष्पक्षता की उम्मीद में रवीश से नहीं रखती , क्यों रखूँ ? पत्रकार हैं  ,सवाल करना और हर एक से सवाल ,तीखे सवाल भी करते हैं पर कुछ एक अनुभवों से वो भी गुज़रे होंगे जैसे आप हम गुज़रते हैं तो राय बन ही जाती है और न भी बने तो कहीं न कहीं कोई सच हमारे भीतर पलता बढ़ता है ही। 

भाषा की मर्यादा और भाषा के चयन में सावधानी बरतने में रवीश से बेहतर कोई नहीं। वो मना करते हैं कि प्रशंसक न बनिये पर मैं प्रशंसा तो कर ही सकती हूँ न । 

कोई कितनी भी आलोचना करे पर ये स्वीकार करने में किसी भी स्वस्थ मानस को तकलीफ नहीं होनी चाहिये कि पत्रकारिता के दिन ब दिन गिरते स्तर में रवीश आज भी उन मूल्यों को जिन्दा रखे हैं जिनको जिन्दा रखने में वे खुद कितने  मुश्किल दौर से गुज़रे होंगे , कल्पना करना भी कठिन है। 

रवीश , आप भले ही ट्विटर -फेसबुक से गायब रहें पर हमतक आपकी बात पहुंच ही जाती है । नीली कमीज -सुर्ख टाई और ग्रे मेरा पसन्दीदा सम्वाद है। आप के अनकहे शब्द उनसे उपजी आपकी उलझन भी कैमरा पढ़ के हम तक पहुंचा ही देता है । 

रवीश की रिपोर्ट को भी मिस कर रही हूँ। कभी प्रेम नगर की उन गलियों में जहाँ चुनावों से पहले आप गए थे और उन बस्तियों में जहाँ कोई और नहीं जाता ,एक बार फिर ले चलिए , इसलिए नहीं कि क्या बदला इसलिए कि कुछ नहीं बदलता । हवा किसी की भी हो , राजनीति में जिंदगी के सवाल टिक नहीं पाते। 

इंतज़ार रहेगा , मैं रवीश कुमार का प्राइम टाइम में ......... अरे हाँ ! साउंड क्लाउड पर भी लम्बे समय से आपकी कोई रिकॉर्डिंग नहीं है। 

अब इतनी सारी जगह रवीश हैं पर नहीं हैं। कुछ और रवीश चाहिए ,कुछ और आवाज़ें चाहिये इस व्यवस्था को जो उनको आवाज़ दे जिनकी आवाज़ को कोई सुनना नहीं चाहता। क्या पता ऐसा कब हो और हो भी तो कब सामने आये ?

खैर ,चलते रहिये ! टीवी कम देखिये और देखिये भी तो केवल प्राइम टाइम देखिये और वो भी रवीश के साथ ! प्रणाम !

Saturday, 27 August 2016

हम शिकायकतों के पहिये पर उम्र को धकेलते रहते हैं। जीते कब हैं ? मैं खुश हूँ कि मैंने वो किया जो दिल ने कहा.........

अरसे से कुछ नहीं लिखा ! सोचा कई बार पर रुक गयी ......... अनकहा कुछ नहीं पर अनसुना बहुत कुछ रह गया। उसे लिख दूं या उसको लिख दूं ,इसी कशमकश में उलझ गए सवाल भी और जवाब भी।

वो नीले आसमान को टिकटिकी लगा के देख रहीं थी ! मैं उनको पढ़ने की कोशिश कर रही थी। कहने लगी तुमको देखा तो लगा कि तुमसे कुछ देर बात करूँ। मैं मुस्कुरा के उनके पास बैठ गयी। परिचय पुराना कुछ नहीं था , कुछ घण्टे पहले डीन के कमरे में  मुलाकत हुई ,दोनों ही एग्जामिनर थे। वो एम पी से थीं। रिटायर हुए कुछ साल हुए ,यूनिवर्सिटी में अब भी पढ़ा रही हैं ! उम्रदराज  लेकिन ऊर्जा से भरपूर महिला की आवाज़ में कुछ ख़ास था ! मैं रुक गयी , ठीक है कुछ पल इनके साथ भी सही...........

आपके परिवार में और कौन है ?
दो बेटियां हैं ,दोनों की शादी हो गयी है !
पति ?
वो अब नहीं हैं !
ओह्ह ! मुझे लगा कि नहीं पूछना चाहिए था !
उन्होंने मुझे पढ़ लिया और बोलीं हम साथ नहीं रहते थे !
मने  डिवोर्स ?
नहीं ,पर साथ नहीं रहे !
कारण ?
कुछ नहीं ! बच्चा नहीं हुआ तो सब ट्रीटमेंट के बाद में गोद लेने के नतीजे पर पहुंची। सोचा परिवार का नहीं समाज के किसी जरूरतमंद को अब अपनी ममता दूं !
फिर ?
पति खुश नहीं थे ! जब तीसरी बार उन्होंने अनाथालय से गोद  लिए बच्चे को मेरी नाजायज औलाद बताया तो मैंने तय कर लिया कि अब चौथी बार नहीं सुनूँगी !
फिर ?
उस बार मैंने सामान लिया और घर से निकल गयी !
कहाँ गयीं ?
पापा से पूछा कि कुछ दिन आपके साथ रहूंगी ,उन्होंने कहा आ जाओ।
फिर ?
दूसरे शहर के सरकारी कॉलेज में तबादला करवा लिया। पति जानेमाने पत्रकार थे ,CM का घर आना जाना था , कह दिया कि आखिरी  मदद कीजिये और शहर से दूर भेज दें।
फिर ?
चली आयी !
तो फिर वो आपको लेने नहीं आये ?
आये ,एक दिन ! फोन किया, मैं सामान और बच्ची को लेने आया हूँ। मैंने कहा कि सामान  के साथ तुम्हारी  6 बोर की रिवॉल्वर मेरे साथ आ गयी है। ऊपर आये तो एक गोली तुम्हारे सीने में और दूसरी मेरे सीने में होगी !
फिर ?
वो लौट गए ,अगली बार पुलिस वाले का फोन आया कि आपके घर की तलाशी लेनी है। सामान है आपके पति का आपके घर !
फिर ?
मैंने कहा ,मैं थाने आती हूँ।  जा कर अधिकारी से पूछा कि FIR की कॉपी दो , नोटिस लाओ ! बोला नहीं है। भाईसाहब को मैं समझा दूंगा ! आप जाईये आगे से ऐसा नहीं होगा !
फिर ?
बेटी की शादी में नहीं आये ,इस बीच एक बेटी और गोद ली मैंने ! दोनों की शादी में वो नहीं आये !
फिर ?
एक बार एक्सीडेंट हुआ ,कोमा में चले गये ! पता चला कि सम्भालने वाला कोई नहीं तो दो महीने बॉम्बे हॉस्पिटल में इलाज कराया ,ठीक हो गए तो मैं लौट आयी
फिर ?
 जिंदगी चलती रही , पता चला वो किसी के साथ रहने लगे हैं ! वो लड़की मेरे विभाग से पी एच डी के लिए आयी ,सबने बताया कि" ये वही है "मैने कहा कोई नहीं ,उसका ध्यान रखती है ना ! मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।
फिर ?
कुछ साल बाद उनको कैंसर हो गया ! मैं फिर बॉम्बे अस्पताल ले गयी। आखिरी दिन बेटी से बोले तेरी मां के साथ रहता तो ये दिन नहीं देखता शायद।
बस फिर कुछ नहीं !
अब ?
अब मैं पार्क के बच्चों के साथ रोज शाम  खेलती हूँ , उनके होमवर्क और क्लास के झगड़े सुलझाती हूँ , संडे को चॉकलेट पार्टी करते हैं
घर में अकेले ?
नहीं ! पीजी है,  नीचे की मंजिल पर लड़के हैं और मेरे साथ चार लड़कियां रहती हैं।  सब साथ खाते हैं और मस्त रहते हैं ! बच्चों के पास आती जाती रहती हूँ ! यूनिवर्सिटी में क्लास ले के आ जाती हूँ।
क्या करियेगा अब  ?
एक जमीन है , ज़िंदा रही तो उस पर नीचे दुकाने ,बीच के फ्लोर पर वृद्धाश्रम और ऊपर लड़कियों का हॉस्टल बनाना चाहती हूँ !
सब साथ  रहेंगे तो सबको एक दूसरे से सहारा रहेगा।

और आप  खुश हैं ...................?

मैं खुश हूँ प्रेरणा ! मुझे लगा कि मैं अगर वो निर्णय नहीं करती तो जिनके भी लिए जो कुछ कर पायी ,नहीं कर पाती और मेरा तो वही होना था जो सब के साथ होता है।

मैं खामोश हो गयी ......

"हम शिकायकतों के पहिये पर उम्र को धकेलते रहते हैं। जीते कब हैं ? मैं खुश हूँ कि वो किया जो दिल ने कहा "

मैं उनको सुनती रही  !!

"पर मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैंने तुमसे आज इतनी बातें कैसे साझा कर लीं ? हमारा तुम्हारा तो कोई परिचय भी नहीं है ! मैंने अरसे से कभी किसी से अपनी जिंदगी के इस सच को किसी को नहीं कहा फिर तुमसे कैसे कह बैठी ?"

इस बात का जवाब मैं भी क्या देती ! उनका हाथ थाम उनके हाथ में कॉफी का प्याला थमा दिया और मुस्कुरा भर दी !

जिंदगी मुझे किताब पकड़ा देती है ! हौसलों की किताब है ,अनुभवों के फलसफे हैं। हम सबके भीतर कितने जलजले हैं और हम बाहर से कितने खामोश दिखाई देते हैं मानो कुछ हुआ ही न हो , कुछ होना ही नहीं हो !

जिंदगी की गाड़ी ढुलकते किस स्टेशन जा रुकेगी पता नहीं ! आप भी बतियाइए , दिल की कहिये ,दिल की सुनिये क्या पता किस मोड़ वक्त से सामना हो जाए !

अनमोल पल होते हैं जब कोई अजनबी आपका हाथ थाम जिंदगी की कोई अनकही पहेली सुलझाने बैठ जाए !
उस पल मुस्कुराइए कि आप ज़िंदा है !

Wednesday, 3 August 2016

मेरी गया यात्रा ....... पितरों का पंगा और महाबोधि दर्शन

गया, बिहार में हूं।मेरा ये पहला अनुभव नहीं है किसी धर्म नगरी में न, ये पहला मोहभंग है धर्म के व्यापारी स्वरूप से ! आस्था के बाजारीकरण को उसके निकृष्टतम रूप में देखना हो तो कुछ समय यहां जरूर गुजारें ।
गया प्लेटफार्म पर उतरते ही पंडो के एजेंट आपके कुल-गोत्र, दादा चाचा पार बाबा तार बाबा सबकी कुंडली खोल आपको अपना बनाने की जुगाड़ में लग जाते हैं। बच निकले तो आपका भाग्य वरना लौटने लायक पैसा भी पितरों की गलियों से होता हुआ "संस्कृति के चौकीदारों की जेब में चला जायेगा। सावन का महीना है सो यहां रेलवे स्टेशन पर भी कांवड़िये पसरे थे। सावन में लहरिया सुना और पहना था पर कांवरियों की नयी भगवा यूनिफार्म आस्था के बाजारीकरण की नयी परिभाषायें गढ़ रही है । गया पितरों की नगरी है, शास्त्रों के अनुसार विष्णु यहां द्रव रूप में फरगु में अवतार लिये हैं।
फरगु नदी के किनारे विष्णुपद मंदिर में पितरों की "मुक्ति" के अनुष्ठान होते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर लिखा है " अहिन्दु प्रवेश निषेध" ..... कमाल है न जिस विष्णु के चरण में तमाम सृष्टि का वास है उसके ही "एजेंट निवास" में सलेक्टिव लोग ही प्रवेश के हकदार हैं ?
अंदर धुसते ही आप पर फिर से "पितरों के एजेंटों" का हमला होगा। आप "किडनैप " कर लिए जायेंगे और थाली में धोती , माटी के कलस और भिंडी, आटा लिए नजर आयेंगे।पंडित आपको सौ पुश्तों के नाम पूछ आपमें इतनी हीन भावना भर देगा कि उठने पर आपको अपने नाम की भी तस्दीक करनी पड़ेगी ।
जो दादा जी बिना कहे दौड़ आते थे उनकी तृप्ति के लिए इतना जतन ? क्या मृत्यु के बाद भी ध्यानाकर्षण की चाह शेष रह जाती है?
तीन -चार घंटे के बवाल के बाद जब होश आये तो कुछ खा पी लें और महाबोधि दर्शन के लिए निकल लें .....
महाबोधि का अनुभव बोध गया से जल्द ही साझा करूँगी ! प्रणाम!

Monday, 1 August 2016

आओ कुछ पल उंगलियां उलझा के बैठें ....

एक ख़त लिखना चाहती हूं जिंदगी के नाम .... कभी कभी खुद को खुद के सामने बिठा कुछ सवाल कुछ जवाब लेने का मन होता है तो कभी जिंदगी को ठेंगा दिखा खिलखिलाकर भाग जाने का मन होता है .... मैं अलग और जिंदगी अलग हैं क्या ? अगर नहीं तो फिर इतनी दूरी कैसे है ? जो पास है तो खामोश क्यों?


ये सवाल भी वैसा ही है जैसा तुम सोचते हो कि कोई तुमसे बिना कुछ चाहे इश्क कैसे कर सकता है? जैसे तुम ये यकीन नहीं कर पाते कि देह के पार  भी कोई संबंध हो सकते हैं, रिश्तों की संभावनाएं हो सकती हैं। इतने मासूम से सवाल हैं तुम्हारे कि जी करता है कि इनकी पोटली बना आसमान में उड़ा दूं ....सच कहूं तो उड़ा ही दिए हैं। न उड़ाती तो जिंदगी का सबब ही खो देती।
देखो वो तस्वीर के उस पार की कश्ती देख रहे हो...
उसमें खास कुछ नहीं है सिवा इसके कि उसमें उन लम्हों का भार है जिनके वजन से झील का पानी किनारों को धकियाता रहता है , ये जिंदगी है, वो कश्ती जीने की जिद है।
मुझे अच्छा लगता है और बुरा क्यों नहीं लगता ? मैं किसी वक्त भी उस वक्त से अलग नहीं हो पाती .....कोई जिंदगी से अलग होकर जिंदगी को सोचता है क्या ?


खुद पर इतना कम भरोसा क्यों ? क्यों इतने सवाल ? कहीं कोई एक झूठ हजार सच पर भारी तो नहीं  ?


ये हमारी जिंदगी है, ऐसे ही उलझाकर रखती है  ! सोचती है कि हर रोज़ कोई नया सवाल रख देगी तो मैं किसी रात ख्वाब छोड़ उसे हल करने लगूंगी पर ऐसा भी होता है क्या कोई ..... मुझे तुमसे मोहब्बत है मेरी जिंदगी ! तू सवाल किये जा मैं जवाब सजा के बैठी हूं।
ये सबसे खुशनुमा मंजर है ....अब मैं और मेरा इश्क जिंदगी की उस कश्ती पर सवार हैं जो हज़ार दियों वाली झील के सीने पर सिर टिकाये है ....  ले चल मेरे मांझी ले चल पार .. सवालों के पार - जवाबों के परे ! दूर पहाड़ों पर ,जंगल और दरिया किनारे .....
कब खत्म होगी ये दौड़ , इतना दौड़ के क्या हासिल हुआ ?
आओ कुछ पल उंगलियां उलझा के बैठें .... दरिया को सुने और जंगल को जी लें ,जब इसी के सुपुर्द होना है तो क्यों न इसी के हो के रह जायें.....
मेरी खूबसूरत जिंदगी मुझे तुझसे बेपनाह मोहब्बत है, तेरे इश्क में मर भी गयी तो फिर से तुझे पा लूंगी !