Wednesday, 3 August 2016

मेरी गया यात्रा ....... पितरों का पंगा और महाबोधि दर्शन

गया, बिहार में हूं।मेरा ये पहला अनुभव नहीं है किसी धर्म नगरी में न, ये पहला मोहभंग है धर्म के व्यापारी स्वरूप से ! आस्था के बाजारीकरण को उसके निकृष्टतम रूप में देखना हो तो कुछ समय यहां जरूर गुजारें ।
गया प्लेटफार्म पर उतरते ही पंडो के एजेंट आपके कुल-गोत्र, दादा चाचा पार बाबा तार बाबा सबकी कुंडली खोल आपको अपना बनाने की जुगाड़ में लग जाते हैं। बच निकले तो आपका भाग्य वरना लौटने लायक पैसा भी पितरों की गलियों से होता हुआ "संस्कृति के चौकीदारों की जेब में चला जायेगा। सावन का महीना है सो यहां रेलवे स्टेशन पर भी कांवड़िये पसरे थे। सावन में लहरिया सुना और पहना था पर कांवरियों की नयी भगवा यूनिफार्म आस्था के बाजारीकरण की नयी परिभाषायें गढ़ रही है । गया पितरों की नगरी है, शास्त्रों के अनुसार विष्णु यहां द्रव रूप में फरगु में अवतार लिये हैं।
फरगु नदी के किनारे विष्णुपद मंदिर में पितरों की "मुक्ति" के अनुष्ठान होते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर लिखा है " अहिन्दु प्रवेश निषेध" ..... कमाल है न जिस विष्णु के चरण में तमाम सृष्टि का वास है उसके ही "एजेंट निवास" में सलेक्टिव लोग ही प्रवेश के हकदार हैं ?
अंदर धुसते ही आप पर फिर से "पितरों के एजेंटों" का हमला होगा। आप "किडनैप " कर लिए जायेंगे और थाली में धोती , माटी के कलस और भिंडी, आटा लिए नजर आयेंगे।पंडित आपको सौ पुश्तों के नाम पूछ आपमें इतनी हीन भावना भर देगा कि उठने पर आपको अपने नाम की भी तस्दीक करनी पड़ेगी ।
जो दादा जी बिना कहे दौड़ आते थे उनकी तृप्ति के लिए इतना जतन ? क्या मृत्यु के बाद भी ध्यानाकर्षण की चाह शेष रह जाती है?
तीन -चार घंटे के बवाल के बाद जब होश आये तो कुछ खा पी लें और महाबोधि दर्शन के लिए निकल लें .....
महाबोधि का अनुभव बोध गया से जल्द ही साझा करूँगी ! प्रणाम!

Monday, 1 August 2016

आओ कुछ पल उंगलियां उलझा के बैठें ....

एक ख़त लिखना चाहती हूं जिंदगी के नाम .... कभी कभी खुद को खुद के सामने बिठा कुछ सवाल कुछ जवाब लेने का मन होता है तो कभी जिंदगी को ठेंगा दिखा खिलखिलाकर भाग जाने का मन होता है .... मैं अलग और जिंदगी अलग हैं क्या ? अगर नहीं तो फिर इतनी दूरी कैसे है ? जो पास है तो खामोश क्यों?


ये सवाल भी वैसा ही है जैसा तुम सोचते हो कि कोई तुमसे बिना कुछ चाहे इश्क कैसे कर सकता है? जैसे तुम ये यकीन नहीं कर पाते कि देह के पार  भी कोई संबंध हो सकते हैं, रिश्तों की संभावनाएं हो सकती हैं। इतने मासूम से सवाल हैं तुम्हारे कि जी करता है कि इनकी पोटली बना आसमान में उड़ा दूं ....सच कहूं तो उड़ा ही दिए हैं। न उड़ाती तो जिंदगी का सबब ही खो देती।
देखो वो तस्वीर के उस पार की कश्ती देख रहे हो...
उसमें खास कुछ नहीं है सिवा इसके कि उसमें उन लम्हों का भार है जिनके वजन से झील का पानी किनारों को धकियाता रहता है , ये जिंदगी है, वो कश्ती जीने की जिद है।
मुझे अच्छा लगता है और बुरा क्यों नहीं लगता ? मैं किसी वक्त भी उस वक्त से अलग नहीं हो पाती .....कोई जिंदगी से अलग होकर जिंदगी को सोचता है क्या ?


खुद पर इतना कम भरोसा क्यों ? क्यों इतने सवाल ? कहीं कोई एक झूठ हजार सच पर भारी तो नहीं  ?


ये हमारी जिंदगी है, ऐसे ही उलझाकर रखती है  ! सोचती है कि हर रोज़ कोई नया सवाल रख देगी तो मैं किसी रात ख्वाब छोड़ उसे हल करने लगूंगी पर ऐसा भी होता है क्या कोई ..... मुझे तुमसे मोहब्बत है मेरी जिंदगी ! तू सवाल किये जा मैं जवाब सजा के बैठी हूं।
ये सबसे खुशनुमा मंजर है ....अब मैं और मेरा इश्क जिंदगी की उस कश्ती पर सवार हैं जो हज़ार दियों वाली झील के सीने पर सिर टिकाये है ....  ले चल मेरे मांझी ले चल पार .. सवालों के पार - जवाबों के परे ! दूर पहाड़ों पर ,जंगल और दरिया किनारे .....
कब खत्म होगी ये दौड़ , इतना दौड़ के क्या हासिल हुआ ?
आओ कुछ पल उंगलियां उलझा के बैठें .... दरिया को सुने और जंगल को जी लें ,जब इसी के सुपुर्द होना है तो क्यों न इसी के हो के रह जायें.....
मेरी खूबसूरत जिंदगी मुझे तुझसे बेपनाह मोहब्बत है, तेरे इश्क में मर भी गयी तो फिर से तुझे पा लूंगी !

Tuesday, 12 July 2016

रिश्तों का लिटमस टेस्ट हर कोई अपने फार्मूले से करना चाहता है........

बहुत देर तक सोचती रही क्या बात करूं उससे ,उसके सवालों के जवाब हैं मेरे पास पर सच उसने सुनना नहीं और तर्क में मुझे अब उलझना नहीं।

संवाद का ये दौर भी अजीब होता है। स्वीकृति और अस्वीकृति के बीच भी सहमति बन जाती है जिसमें साथ चलने की गुंजाइश ज्यादा बेहतर हो जाती है ............ जरूरी भी है , हर एक के जिन्दगी के अपने तजुर्बे होते हैं। हर एक की अपनी प्रयोगशाला है। रिश्तों का  लिटमस टेस्ट हर कोई अपने फार्मूले से करना चाहता है।

मुझे पता है वो जो कर रहा है गलत है पर उसके अपने तर्क हैं ,उसकी अपनी क्षमताएं और उसकी अपनी ख्वाहिशें हैं।  हर एक के भीतर कई किरदार हैं , उनकी अपनी कुंठाएं उनकी अपनी लालसाएं हैं जिनको उसे पूरा करना ही होता है।

मेरा गलत उसके पैमाने पर गलत हो सकता है लेकिन मेरे अनसुने तर्क उसकी जिन्दगी की तहरीर लिख रहे हैं।
ये इश्क भी कमाल का है, न उसके करीब जाने देता है न उससे दूर ही होने देता है।
कभी वो खुद से हार जाता है तो बेसाख्ता बाहें पसार देता है और कभी उस जीत से खुश हो जाता है जो उसे खुद से ही दूर ले जाती है ................

एक रोज़ किसी पगडंडी पर टहलते उसने पूछा " क्या सुकून है मेरे साथ वक्त बिताने में " !! ये सवाल भी कमाल था। सोच रही थी कह दूं कि मौत का इंतज़ार इससे हसीं नहीं हो सकता............... कहा नहीं पर खुद पर खूब हंसी ! कितनी अजीब कशमकश है , साथ होने और साथ होकर साथ नहीं होने के भ्रम को पाले रखने की। दोनों की चुप्पी में गजब की रूमानियत और गज़ब का इकरार है ,करार है और तकरार है...........

बरसात में पिघल जाऊं और आसमान को बाहों में भर  खुद को आज़ाद कर देना चाहती हूँ  हर कशमकश से ,हर ख्वाहिश हर ख्वाब से परे.......  पर उसके सवाल जीने नहीं देते और उसकी मुस्कुराहट मरने नहीं देती !!

अच्छा सुनो !! ..........इस बार किसी चौराहे पर मत मिलना ~!! इस बार हम पहाड़ की चोटी या पहाड़ की उस तलहटी में मिलेंगे जहाँ नदी का शोर हो और हवा में देवदार की सरसराहट हो ! बहस करने के लिए भी मूड चाहिए और तुमसे उलझने के लिए तो मुझे कई जनम चाहिए !

मैं कहती जा रही थी ,मुझे पता है वो सुनता नहीं है ! अपनी ही दुनिया में अपना कुछ सुनाने के लिए बेताब .......   वो अपनी दुनिया को लेबोरेट्री बना के जी रहा है मनो उसे ही नोबेल मिलेगा किसी अजूबे ग्रह को खोज लाने के लिए ! मैं हंस देती हूँ उसकी इल्म और फिल्म के बीच जूझ रही जिन्दगी को देख ! वो चिढ़ता है , लड़ता है और फिर से किसी खोज में निकल फिर मुड़ के देख लेता है ......... मैं मुस्कुरा भर देती हूँ !

देखो जो करना है करो ,मैं यहीं हूँ ,देख रही हूँ ,समझा रही हूँ ....... खेलते हुए चोट लग जाए तो सम्भलना ! मैं यहीं मिलूंगी।

चौराहे का पुराना पेड़ हूँ ...... जब भी लौटोगे यहीं मिलूंगी ! वक्त खत्म भी कर देगा तो फिर से यहीं उग जाउंगी और नए रूप में फिर मिलूंगी बस तुम सफ़र सम्भल कर करना ................. खुश खुश मिलना !








Wednesday, 6 July 2016

काश कि मोदी भी अरविन्द के साथ खड़े होते .........

सत्ता और सट्टा बेईमानी सिखा ही देते हैं। नीयत में खोट भले न हो राजनीति के दांव खेलने में चालबाज बन ही जाते हैं। हर कोई ईमानदारी का दम भरता है और बेईमान बन जाता है। ईमानदारों की फ़ौज बेईमानों से उलझते उलझते कब दांवपेच सीख जाती है पता ही नहीं चलता।

अरविन्द अकेले क्या कर लेंगे ? मोदी भी अकेले क्या कर लेंगे ? निर्णय दोनों अकेले नहीं ले सकते ,ले भी लें तो उस निर्णय को लागू कराने के लिए जिन लोगों का सहारा लेना पड़ेगा , वो वही होंगे जो उन तक वही बात पहुंचाएंगे जो उनके मन मुताबिक़ हो। सत्ता के चौकीदार भेस धरे घूमते हैं। चमचे और चाटुकार अंततः मोतियों का हार ले जाने में  कामयाब हो जाते हैं और दूरगामी परिणाम के लिए नेतृत्व को छोड़ देते हैं।

मोदी भी उसी छद्म दुनिया में चले गए हैं और उसके ग्लैमर से इस कदर अभिभूत हैं कि वास्तविकता को अब चाह कर भी जी नहीं सकेंगे। सत्ता कुछ मायनों में बेहद क्रूर होती है। 

जब तक नेतृत्व घेराबंदी से बाहर है तभी तक ताजी हवा की गुंजाइश है , बंद कमरों में सिर्फ साजिशें रची जाती हैं। सत्ता का यही खेला जबर्दस्त है , पद और शक्ति पर एकाधिकार की भावना इस कदर प्रबल है कि आलोचना को विरोध मान कर दरवाजे -खिड़कियां बंद कर ली जाती हैं। नतीजा पूरा समाज और उसकी असीमित अपेक्षाएं भुगतती हैं। 

 देश को मोदी और अरविन्द से असीमित अपेक्षाएं हैं।  जनमानस ने दोनों को सर्वशक्तिमान मान लिया है। दुखद ये है कि देश के दो सर्वशक्तिमान साथ होने की जगह हर बार आमने सामने आ खड़े होते हैं। यही दुर्भाग्य है जो देश का पीछा नहीं छोड़ रहा। 

उत्तराखंड भीषण त्रासदी से गुज़र रहा है ,बुंदेलखंड सूखे से परेशान  , बस्तर गरीबी में कैद है.  हम अठ्ठन्नी चवन्नी की लड़ाई लड़ रहे हैं। दाल है नहीं गाय पर बवाल करते हैं। नौकरी नहीं पर राष्ट्रवाद कभी भारतमाता पर बखेड़ा करते हैं ......... 

अरविन्द आंदोलन की उपज हैं ,उनके साथ आंदोलन की शक्ति थी जिसे मोदी दिल्ली के हित के लिए काम में ले सकते थे और देश में सकारात्मक राजनैतिक ऊर्जा का संचार कर सकते थे लेकिन हुआ इसके विपरीत। 

काश कि मोदी भी अरविन्द के साथ खड़े होते और विकास के उस सपने को सच करते जिसका कि वो दावा करते हैं। 

किसी दुर्घटना से कोई नहीं सीखता ! शहादत भी खेल और सियासत भी खेल है।दोनों की मैयत हमारी नियति है।

तो राजनीति -राजनीति खेलते रहिये ,तकाजे करते रहिये और इज़ इक्वल टू की थ्योरी पर चलते हुए देश के प्रति अपनी छद्म प्रतिबद्धता का बेशर्म प्रदर्शन करते रहिये। सब राम हवाले और राम तम्बू के हवाले हैं। 

जय राम जी की। चलते हैं !

Thursday, 16 June 2016

शिकायतों में वक्त इतना जाया हो जाता है कि लौटते वक्त मलाल के सिवा जिस्म पर कुछ नहीं होता............

कभी कभी शिकायतों का सिम सिम  पिटारा खुल जाता है और वक्त के आहते में लम्हे इधर उधर बिखर जाते हैं। उसकी शिकायतें खुद से इस कदर हैं कि गाहे बगाहे छम्म से फ़ैल जाती हैं और उसको ही परेशान करती रहती हैं , मुश्किल ये है वो सुनता भी नहीं और सुनाये बिना रहता भी नहीं।


हम जिंदगी के कितने करीब से गुज़र जाते हैं और जिंदगी को छू भी नहीं पाते। शिकायतों में वक्त इतना जाया हो जाता है कि लौटते वक्त मलाल के सिवा जिस्म पर कुछ नहीं होता। ताउम्र खुद के लिए सहूलियतें जुटाने में इस कदर मसरूफ रहते हैं कि रूह जिस्म से कब फना हो गई होती है इसका पता ही नहीं चलता।

आक्रोश स्वभाविक होते हैं पर एक से जुर्म के लिए खुद को  पारितोषिक और दूसरे के लिए  सजा का आयोजन भी अजीब सच है। आक्रोश खुद को तर्क से परे और दूसरे को कटघरे में खड़ा कर देता है।  हम सब अपने  कंधों पर अपने सच का सलीब ले कर चलते हैं और सब के पास अपने सही होने की वजह है। वाजिब है या गैरवाजिब इसका फैसला जब हो सकता है जब वो एक दूसरे की जिंदगी के फैसलों से परे हो।  नैतिकता के धरातल पर सब नंगे हैं। सबके जिस्म से उह्ह्ह् आती है। लिबास को जिस्म समझने वाले और रवायतों को गिरवी रख रूह का मोलभाव करने वाले दिल के दलाल गली के हर मोड़ पर मिल जाते हैं।

मैं उसकी  शिकायतों से पार उससे  हार जाना चाहती हूँ। हर तर्क से परे उसको उस झील सा ठहरा और हजारों सितारों को अपने सीने पर लिए बेसाख्ता खिलखिलाते ,उड़ते देखना चाहती हूँ। ये वक्त का दरिया है जो हमारे बीच बह रहा है। क्या फर्क पड़ेगा ये दरिया मनो सूख भी जाए ............तो भी हर बरसात पानी अब यहीं से हो कर गुज़रेगा और जब भी गुज़रेगा हम फिर एक दूसरे के सामने होंगे।

कुछ रिश्ते  न काल के , न सवाल के  मोहताज़ होते  है। उनकी उम्र भी नहीं होती ,जिसकी होती है वो रिश्ते नहीं होते बस मुलाकात होती है । सो चुकना तो है ही है आज नहीं तो कल ये हिसाब बराबर होगा पर जितना होगा उतना  मेरा दावा वक्त पर मजबूत होता जाएगा।

वो उलझा हुआ है ये मैं जानती हूँ लेकिन ये भी सच है कि बिना सच को स्वीकार किये वो  एक कदम आगे नहीं बढ़ पाएगा। शिकायतों से परे संवाद की दुनिया है । इस दुनिया में जाओ और सुनो कि पीड़ा की हरेक की परिभाषा अलग अलग है। कुछ देर कंधे पर हाथ रखो और सुनो..........दर्द पिघल जाएगा और अहम की दीवार टूटेगी तो ये सूखी सी लगने वाली घास फिर से हरी होने लगेगी ! मौसम सब गुज़रते हैं ,ये भी गुजरेगा !

हर एक को उसका आईना  प्यारा ही बताएगा पर कभी उसके आईने से उसको भी देखो शायद आराम आ जाए .......वैसे भी तुम को अपने चेहरे पर ज्यादा ही गुमान है भले गुस्से में नाक पकौड़े सी हो जाए और गाल बंगाल की खाड़ी हो रहे हों .........    तो मुस्कुराओ उठो और शिकायतों को  परे रख आसमान  को अपने आलिंगन में समेट लो ! मौसम खुशगवार है !                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          

Monday, 13 June 2016

ये रिश्तों का बंटवारा है , ये रूह कहीं, जिस्म कहीं का रिश्ता है !

" एक अरसे के बाद उससे मुलकात हुई ! अरसा भी क्या कहूं एक दशक ही बीत गया होगा ........ वो जब लौटा था तो  उसकी नीली -भूरी सपनीली आँखों में हजार सपने और कंधे पर सच की सलीब थी। इस बार वो जब लौटा तो कंधे पर जिम्मेदारियां और आँखों में तलाश थी ,सवाल थे।

इंसान भी अजीब है , कुछ की तलाश में कुछ भी खो देता है और कुछ मिल जाता है तो फिर कुछ पाने की जद्दोजहद में लग जाता है। मैंने उसके साथ ,उसके सफर में एक बेनाम हमसफर का रिश्ता निभाया है  ..... उसके साथ रोना उसके साथ हंसना भी हुआ ,बस नहीं हुआ तो साथ नहीं हुआ।

ये रिश्तों का बंटवारा है , ये रूह कहीं, जिस्म कहीं का रिश्ता है ! दोनों अधूरे- अधूरी कहानी ,पूरी सी दिखने वाली पर खत्म नहीं होने वाली सी कहानी है मनो ..... ! परिवार और समाज से परे कुछ नहीं है पर कुछ है जो इन दोनों में ही नहीं ,वो बस वहीं है, जहाँ रूह बसती है।

जिंदगी बिना रिश्तों के नहीं चलती ,रिश्ते जरूरी भी नहीं। जरूरतों का धरातल बदलता रहता है। बस जो नहीं बदलता वो एक एहसास है कि "तुम हो ना "........    उसका हाँ कह देना और मेरा मान लेना !!

बस वही एक एहसास खींच लाया उसको ,वही एक खालीपन ,वही एक उदास कोना ,वही एक टीस ...... देस क्या परदेस क्या ! अब समंदर भी बूँद और कभी बूँद भी समंदर लगता है।

अच्छा सुनो ! बिटिया कितनी बड़ी हो गयी ?
18 पूरे होने वाले हैं , उसने कहा और मुस्कुरा दिया !
तुमने उसका नाम वही रखा ना जो हमने सोचा था ?
तुमको याद है ?
मैं हंस पडी.........
और तुमने भी तो ऐसा ही कुछ किया है ना ?
वो हंस पड़ा .......
हम्म !! ऐसे पागलपन भी भला भूलता है कोई !
नहीं ! वो पागलपन नहीं था ,वक्त था ! हम पर कहानी लिख रहा था और हम किरदार सिर्फ उसके कहे को निभा रहे थे !
थे नहीं हैं ! मैंने बात को विराम दे दिया।

विराम दे देने की कोशिशें नाकाम होती रहीं ! घंटों उँगलियों में उलझे वक्त के धागे सुलझाते रहे......... दोनों को पता था सुलझेगा कुछ नहीं पर इन धागों की पेचीदगी में उम्र के तार फंसे हैं जिनके फंसे रहना ही हमारी नियति बन गयी है।

पर जो भी है अच्छा ही है ! साथ रहते तो शायद कभी टूट जाते इसलिए दूर सही साथ हैं तो भी क्या बुरा है। जो पास हैं वो भी कितना जुड़े हैं ? "

वो अपनी बात कहती जा रही थी। कुछ मुझे पता था, कुछ अनसुना भी था।

फिर क्या हुआ ........ ? मैंने सवाल बढ़ा दिया ये सोच के कि उसकी चुप के अंतराल को कम कर  सकूंगी पर वो अब निढ़ाल सी सोफे पर पसर गयी। आंसुओं की धार उसके गालों से लुढ़कते देख पा रही थी मैं  .......

मैं कमरे का पर्दा खींच निकल आयी। कुछ सवाल अनुत्तरित रह जाने चाहिए ,जवाब जिनका खुद के पास ही न हो तो फिर नासूर बन जाने तक उनको कुरेदने से भी क्या हासिल।

मुझे पता है जिंदगी किसी के लिए नहीं रुकती  ........ सब चलते रहेंगे ,मिलते रहेंगे और फिर कहीं गुम जाएंगे फिर मिलने के लिए !

आप भी चलते रहिये पर जो साथ है उनका शुक्रिया करते रहिये कि वे साथ तो हैं ! ये साथ और साथ के भरोसे की मिट्टी नम रहनी चाहिए ! मोहब्बत की बेल इसी से हरीभरी रहेगी ! रिश्तों को हरा रखना है तो हाथ थामे  रखिये..... ! मौसम की फितरत है देर -सवेर बदल जाएगा !




Sunday, 12 June 2016

राजनीति की रसोई में पकाने आये हैं तो चमचे और लोटों की जगह बना लीजिए !

राजनीति के रसोईघर में दाखिल होने से पहले कवच -कुंडल धारण करके आईये। पकाने आये हैं तो चमचे और लोटों की जगह बना लीजिए , दाल गलने से लेकर परोसने तक वही काम आएंगे । अगर जीमने आये हैं तो अपनी थाली -कटोरा लेकर पंगत में बैठ जाइये , "जैसे ही बनेगा परोसा जाएगा " पर भरोसा रखिये और इंतज़ार कीजिये।

इस रसोईघर में कुछ बर्तन हैं जो बरसों से काम नहीं आये ,शायद दादी दहेज़ में लाई हों या दादा जी जिद करके ले आये हों , बहरहाल वो ऊपर वाली दुछत्ती में पड़े हैं ,इस इंतज़ार में कि कभी जरूरत हुई तो निकालेंगे। मुझ याद ही नहीं कि वहां से बर्तन कभी निकले भी थे ,हाँ ये जरूर हुआ कि बाऊजी सबको बताते रहे कि उनके पास अंग्रेजों के जमाने का कलसा और मुगलों के जमाने का लोटा पड़ा है। बाज़ार में कोई खरीददार भी नहीं ,कबाड़ी को बेचेंगे तो मुहल्ला कहेगा कि पुरखों की निशानी बेच दी , सो सब जस के तस है।

निष्ठाओं के अचार की कई बरनियां भी एक आले में सजी हैं। ये सब मौसम आने पर सस्ते में मिल जाने वाली सब्जियां हैं तो बारहों महीने काम आती हैं। निष्ठा का अचार चटपटा और पाचक होता है। सब्जी न हो तो इसके साथ किसी गर्मागर्म बवाल को परोसा जा सकता है।

रसोई पार के कोने में एक चक्की है जो मुद्दों को पीस मालपुए का घोल बनाने के काम आती है। चक्की की घरघराहट से सात घर दूर तक पता चल जाता है कि आज दिन की रसोई में क्या पकने वाला है। सब अलर्ट हो जाते हैं और कानाफूसी शुरू हो जाती है। माहौल में उत्तेजना बनाए रखने के लिए ये दो पाट की मशीन बड़े काम आती है। इसे चलाता कोई और, और इसमें पिसता कोई और है।

मीडिया का दूध आंच पर चढ़ा है और बहने के इंतज़ार में है पर इस रसोई काका की पैनी नज़र से न दूध उबल के गिरता है न आंच ही मंदी होती है। ये दूध जितना उबलेगा इस पर मलाई उतनी गाढ़ी आएगी और रसोई काका  ही जानते हैं कि उस मलाई का हकदार कौन होगा सो आपको ये कभी पता नहीं चलेगा कि जो दूध आप चढ़ा के आये थे उसकी मलाई कौन खा गया।

राजनीति की रसोई सब्र का इम्तिहान भी लेती है। छुरी में धार न हो तो फांक नहीं मिलती और गलती से खुद को लग जाए तो धार रुकती नहीं सो सब्र से काम लें। थाली में बैंगन लुढ़क रहे हों  या तड़का लगाना हो या चार बर्तनों की टकराहट को सम्भालना हो ,आपको धीरज रखना ही होगा वरना रायता फैलते देर नहीं होगी और मेहमान रसोई की अव्यवस्था के लिए सब रसोई काका की जगह जजमान को लानते भेजेंगे।
यहाँ सब कुछ पकता है , छिलके से लेकर गूदे तक कुछ भी ! कचरे के डिब्बे में जो कुछ दिख रहा है वह सब उनकी किस्मत का लेखा है

सो देवियों -सज्जनों ! राजनीति की रसोई में सम्भल के पांव धरियेगा ! पांव के नीचे भी नज़र रखिएगा कि कोई टूटे गिलास का कांच ही न आ जाए या मक्खन पर फिसल जाएँ। यहाँ जो कुछ भी पक रहा है वो सबको बराबर पचे जरूरी नहीं सो बाजार से आदर्शों की भूसी खाते रहिये और यहाँ का लुत्फ़ उठते रहिये।

रसोई काका आपके अन्नदाता हैं उन्हें प्रणाम करके बाहर आईयेगा वरना अगली बार भूख लगने पर खाना तो क्या दाना भी नसीब नहीं होगा !

नमस्कार ,चलते हैं ! हाँ ! जानते हैं ,भूख पर जोर किसी का नहीं है ...........