Saturday, 25 December 2021
वो जादुई क्रिसमस ,वो मीठी ईद ,वो लोहड़ी के किस्से.... आपको भी याद हैं क्या ?
Thursday, 16 December 2021
सच को सब मालूम है पर सच की सुनेगा कौन ? सच की गवाही कौन देगा ? सच के चेहरे की लकीरों को कौन पढ़ेगा ?
Wednesday, 15 December 2021
एक दिन ऐसे ही सब कहा - सुना धरा रह जाएगा। ........
Tuesday, 30 November 2021
पापा बगीचे के वो हरे भरे दरख्त थे जिसकी हर डाल पर बचपन पसरा था ....
आज फिर नींद नहीं आयी | अब नींद का नहीं आना ,आकर लौट जाना या आते हुए भी न आने सा महसूस होना सामान्य सी बात हो गई है | मैं अवसाद में नहीं हूँ ,ये यकीन दिलाते रहना और सहज बने रहने के लिए जूझते रहना ,आदत में शुमार हो गया है | नींद से दोस्ती हमेशा से बहुत अच्छी नहीं रही लेकिन साल 2021 ,अप्रेल-मई-जून के महीनों के कोरोना युद्ध ने उसे और बेमना कर दिया |
सच कहूं तो इस सब को लिखने से भागती रही मैं.. नहीं लिखना चाहती थी ,नहीं चाहती थी कि कोई और उस दर्द का सहभागी बने ,नहीं चाहती थी कि वो काली रातें ,स्याह दिन फिर -फिर आँखों के सामने से गुजरें लेकिन छः महीने बीत जाने पर भी वो टीस रह -रह कर उठती है ,जख्म फिर हरे हो जाते हैं | नींद फिर आँखों से दूर हो जाती है | इस कमरे से उस कमरे में , कभी भीतर -कभी बाहर भागते हुए सुबह हो जाती है | रात डराती है , डर से गुजर जाने पर भी डर लगना अजीब है | ये शायद डर नहीं है ,ये मलाल है कि पापा को उनके हिस्से की ऑक्सीजन ,उनके हिस्से की साँसे मैं उनको हजार कोशिशों के बाद भी न दे सकी |
उनके जाने के बहाने हो सकते हैं लेकिन उनके न होने के बहानों से दिल राजी नहीं होता | सब तर्क -वितर्क ,ज्ञान का हर पन्ना वो खिलौना लगता है जिसे देख कर भी उठाने का मन नहीं करता |
पापा को उम्मीद नहीं थी कि वो पॉजिटिव आ सकते हैं ,डर जरूर था उनके मन में | जिसका मन सिर्फ उसके बगीचे में लगता हो वो आईसोलेशन में कैसे रहते ? फिर भी उन्होंने कोशिश की , वो फिर भी बिना सहारे मुकाबला करते रहे | खुद चल कर पहला सीटी स्कैन करवाया , खुद चलकर अप्रेल की 23 तारीख को आईसीयू के बिस्तर तक पहुंचे | दिन में उनको वहाँ छोड़ा , रात तक वे घबरा गए | पास के मरीज से फोन करवाया ,सामने बैड पर कोई आखिर साँसे ले रहा था | उनको मोबाईल पसंद नहीं था ,चलाना सीखा नहीं | माँ के बिना रह नहीं सकते थे , बगीचा भी साथ नहीं था | डाक्टर वार्ड में रहने से मना कर रहा था | हम भाई -बहन उन्हें समझा -बुझा के लौट आए | सुबह फिर जिद कर ली ,घर लौटने की | कैसे लौटा लाती ? पापा भर्ती हुए उसके तीसरे दिन छोटे भाई की सांस भारी होने लगी | वो घर पर ऑक्सीजन सपोर्ट पर था ,पापा अस्पताल में | मैं 103 बुखार में, डॉक्टर को रेमेडेसीवर समेत जो चढ़ना था ,चढ़ता .. हाथ में कैनूला लगा रहता .. सुबह पापा के पास भागती , पापा बिटिया को बुलाया दो कि जिद किये रहते थे ! उनको बिठाना ,स्पंज करना ,मालिश करना , खिलाना..
वार्ड में किसी को पानी पिलाना ,किसी आंटी को बाथरूम तक ले जाना ,किसी को खिलाना .. सब किया ,सबको उम्मीद रहती थी कि बिटिया आएगी .. पापा के पास वाले बैड पर एक भाई जिसे तीन दिन तक संभाला ,सामने हाथ जोड़ कर चला गया , कोई अपने घरवालों को पुकारते चले गए .. प्यार भरे स्पर्शों को प्लास्टिक के बैग में सिमटते देखा मैंने ..
दोपहर फिर घर लौटना भाई के लिए सिलेंडरों का इंतजाम करना फिर वापिस पापा के पास लौटना.. रात फिर से घर के आईसी यू में खुद को भर्ती करना , बाल्टी भर दवाओं के डिब्बे .. एक पलंग पर भाई ,एक पर मैं !! रातभर भाई खांसी से सो नहीं पाता था | माँ को कह सुन के सुला देती थी | वे भी सहमी सी हिम्मत दिखाती रहीं | भतीजा सिलेंडर के इंतजाम के लिए रात भर लाईनों में लगा रहता.. सुबह हो जाती !!
एक रोज अस्पताल के वार्ड के बाहर चर्चा सुनी कि जो ऑक्सीजन लाइन आईसी यू में या रही है उसमें ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम है | सुनते ही अंदर भागी तो समझ आया कि अपने पेशेंट के लिए घरवाले सिलेंडरों का इंतजाम कर रहे हैं |
जिंदगी में पहली बार खुद को इतना निराश ,इतना हताश पाया | सिलेंडर कहाँ से लाऊँ ? दोस्तों -शुभचिंतकों की मदद से 21 सिलेंडर इकट्ठे किये 15 दिनों में , भाई और पापा दोनों को उसकी जरूरत थी .. सिलेंडर भरवाना हर रात संजीवनी लाने से कम न था | इस बीच पापा को ब्रेन स्ट्रोक आ गया | एक हिस्सा काम नहीं कर रहा था ,नजर आना बंद हो गया | आवाज भी जाने लगी | वे पेन मांगते लिखते तो घर में सबका हालचाल पूछते | कहते कि घर ले चले .. एक रोज उन्होंने लिखा " बिटिया खूब खुश रहना ,मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है | सबका ध्यान रखना | "
मैं नहीं जानती ,कैसे खुद को संभाला .. 7 तारीख को पापा को घर ले आयी कि अब जो हो सो हो कम से कम माँ के आँखों के सामने ,अपने -घर -बगीचे से रुखसत हों !! पापा मास्क खींच देते थे ,सो हाथ बांधना पड़ता था | आखिरी दिन उन्होनें मुझसे हाथ खोलने जिद की ,मैंने मना किया .. उनका देखना ऐसा था जैसे कह रहे हों कब तक बाँधेगी..
शाम को देह के बंध से वो मुक्त हो गए ! कोई रो भी न सका .. भाई के सामने से उनकी देह अंतिम यात्रा पर थी वो कंधा न दे सका |
इधर पापा का जाना हुआ उधर भाई की साँसे जवाब देने लगीं | शाम 5 बजे खुद ही गाड़ी में सिलेंडर समेत भाई -भतीजे के साथ शहर के पाँच अस्पतालों के दरवाजे खटखटाए .. रात 11 बजे जाकर जगह मिली !
भाई जीत गया | 15 दिन बाद घर लौटा फिर महीने भर बाद पापा के फूल मां गंगा की गोद में रख आया | पापा दो महीने अपने ही बगीचे के ,अपने ही सँवारे आसापाला के आलिंगन में रहे |
इस सब के बीच मैं कब ठीक हो गई ,पता नहीं चला ! कब मुझे कोरोना हुआ ,कैसे कब गया, नहीं पता |
मैं चाहती थी कि मुझे ये सब याद न रहे , स्लेट -पट्टी पर लिखे की तरह इसे भी सूखा दूँ .. नहीं सूख रहा है | एक -एक कर कितने ही चेहरे ,कितनी बातें , कितने मलाल दिमाग को सुन्न किये जाते हैं |
आज फिर सुबह हो गयी ! एक दिसंबर 2021 .. अब जब फिर तीसरी लहर की आशंका उठने लगी है ,दिल फिर से घबराने लगा है ! कहते हैं ,ब्रह्म मुहूर्त में ईश्वर जल्दी सुनते हैं .. मैंने आज सब लिख दिया है ,मैं चाहती हूँ ईश्वर इसे पढ़ें ,हमसे जो भी गलत हुआ हुआ हो उसे क्षमा करें .. कुछ न दें बस अपनों को आसपास रहने दें ,उनकी साँसों पर उनका हक रहने दें !
आप सब भी अपना ध्यान रखना ,अपनों के साथ रहना .. पापा बगीचे के वो हरे भरे दरख्त थे जिसकी हर डाल पर बचपन पसरा था ! माँ देहरी हैं , बस वही हैं जो हिम्मत बँधायें हैं कि एक दिन सब अच्छा होगा .. आप भी दुआ करें कि सब के साथ ,सबके पास सब अच्छा रहे !
चलते हैं ,फिर मिलेंगे ! निराश फिर भी मत होना ,जीवन है सब चलता रहेगा ..
Monday, 16 August 2021
मैं न कर सकी पर आप जो विद्रोह कर सकते हैं, जरूर कीजिएगा | इश्क की सतरंगी दुनिया में लौट आने की उम्मीद मत छोड़िएगा ....
बहुत बार मुझे ऐसा लगता था
अगर विद्रोह करने पर मजबूर कर दी जाऊँ
तो मैं बहुत जोर से चीख सकती हूँ
दीवार को भड़भड़ा के गिरा सकती हूँ
आसमान को पीछे धकेल सकती हूँ
और
अततः उन सब चीजों को बदल सकती हूँ जो मुझे असहज कर
रही हैं |
पर ये सब निहायत बचकाना सिद्ध हुआ
विद्रोह की हर स्थिति में
मैं बच निकली
कभी ये कहते हुए कि मेरे ही लड़ने से क्या होगा
कभी ये मान कि मुझसे पहले भी कई चले गए
जो सोचते थे
आसमान में सुराख कर देंगे |
हाई स्कूल में आयी , तीसरी भाषा के रूप में उर्दू
पढ़ने का ऐलान कर दिया |
घर वालों ने विरोध नहीं किया लेकिन जब उर्दू की
क्लास में जाकर बैठी
टीचर के साथ साथ क्लास की बाकी लड़कियों ने भी समझा
दिया कि ये उनके लिए भी अजीब है |
मैंने संस्कृत पढ़ी ,बेमन से |
मन उर्दू की किताब में था
ये विद्रोह भी वहीं दब गया |
मेरी सबसे पक्की सहेली फिरोजा दसवीं में ही
पाकिस्तान के किसी लड़के से ब्याह दी गयी|
फिरोजा चली गयी | पक्की सहेलियों का विद्रोह कच्चा साबित
हो गया |
ईद की सिवईयों का स्वाद लेते , शरारा –कुर्ते और
चुन्नी को संभालते
गज़लों वाली रातों और मुशायरों के साये में बचपन बीत
गया |
उस दौर को रोक लेने की जिद भी बहुत की
पर विद्रोह तब भी नहीं कर सकी |
वो दौर आया जब दिल बल्ले पर धड़कने लगा !
पाकिस्तान की टीम जयपुर आयी थी
सनक की इंतिहा ये कि इमरान के ऑटोग्राफ के लिए
कॉरीडोर पार कर उसे सीढ़ियों पर ही घेर लिया |
तब वो सिर्फ इमरान था | इमरान खान नहीं !!!
हॉस्टल की दीवार पर चस्पा दसियों पोस्टर वाला हीरो
!!
एक दिन कर्फ्यू लग गया | सब हिन्दू –मुसलमान हो गए
|
भीतर का इंसान , विद्रोह के स्वर में चिल्लाया
बंद करो ये खेल !!
सुनो सब एक से नहीं हैं
आवाज मेरी बस मैंने ही सुनी
पर विद्रोह मैं तब भी नहीं कर सकी |
लोगों ने कहा तुम मासूम हो, तुम सच नहीं जानती |
न जानने,
न बता पाने,
न सुने जाने का आक्रोश समझते हैं ना ?
मैं तब भी कुछ बदल नहीं सकी |
मैं उन सबको तब भी कुछ समझा न सकी |
विद्रोह तब भी नहीं कर सकी |
फिर एक रोज इंदिरा का खून बहा....
गोधरा हुआ , गुजरात हुआ.........दिल खूब रोया !
वो संभलता कि राजीव गए ,सफ़दर झुंड में घेर के मारे गए
फिर ये दर्द आदत में शुमार हो गया..
फिर क्या आईसीस और क्या RSS
विद्रोह तो मैं तब भी नहीं कर सकी |
सच तो ये है
मैंने ही इश्क में तर
खूबसूरत नज़्म सी दुनिया की तमन्ना की थी
ये और बात है कि
लहू में तरबतर दुनिया मुझे हासिल हुई |
ये जान समझ लिया है मैंने
विद्रोह मैं अब भी नहीं कर सकी |
अब कुछ नहीं सूझता मुझे
बस एक खामोश उम्मीद बाकी है
कोई दिन ऐसा आएगा जब सब एक दूसरे को देख बाहें
फैलाएंगे
मुस्कुरा कर कहेंगे कि तुम सब मेरे अज़ीज़ हो !
दिल का एक हिस्सा कहीं और बस रहा है,एक
हिंदुस्तान में धड़क रहा है |
मैं खुद को दुनिया के हर हिस्से में , उसकी बनायी
हर शह में जीती हूँ |
हर किसी के दर्द में रो लेती हूँ
हर किसी की मुस्कुराहट पर मर जाती हूँ
गीता में जब कृष्ण कहते हैं कि आत्मा लंबे सफर पर
है
ऐसा है तो मैं कहती हूँ कि फिर हम उसे वीज़ा देने
वाले हैं कौन ?
ये नियम, ये शर्तें ,ये पाबंदियाँ बस साँसों की
गुलाम हैं....
कितना रोक लीजिएगा !
देह के रंग-ईमान ,उस पर कानून बनाने
बेकार की वजहों से
छोटी सी जिंदगी में जहर भर देने का ये सिलसिला थम
जाना चाहिए !!
मैं न कर सकी पर आप जो विद्रोह कर सकते हैं, जरूर कीजिएगा
|
इश्क की सतरंगी दुनिया में लौट आने की उम्मीद मत
छोड़िएगा !
हम कहीं न कहीं ,कभी न कभी उसे जरूर पा लेंगे !
हम उस पार रोशनी की दुनिया में फिर से मिलेंगे
उम्मीद मत हारना !!
Monday, 17 August 2020
दिल्ली की राजनीति में बधाई की राजनीति के मायने क्या हैं ?
दिल्ली की राजनीति बड़ी दिलचस्प है | शीला दीक्षित का राजकाज हो , साहिब सिंह वर्मा हों या अब अरविन्द केजरीवाल , इन सब की राजनीति में केन्द्रीय सत्ता की भूमिका अन्य राज्यों की तुलना में अलग रही है | स्पष्ट कर दूं कि मैं राजनैतिक मसलों की कोई जानकार नहीं हूँ | एक सामान्य नागरिक की तरह जो सामने घटता दिख रहा है उसी आधार पर ये विश्लेषण कर रही हूँ |
कल अरविन्द केजरीवाल का जन्मदिवस था | नरेंद्र मोदी से लेकर छोटे –बड़े भाजपा नेताओं तक ने उनको बधाई दी | राजनीति में मूलतः विरोधी कोई नहीं होता ये बात जग जाहिर है इसलिए इन संदेशों से कोई अर्थ निकालना प्रथम द्रष्टया अनुचित है लेकिन ऐसा जब बीते सालों में ना हुआ हो तो कुछ अटपटा जरूर लगता है | क्या अरविन्द केजरीवाल भाजपा के करीब जा रहे हैं या भाजपा अरविन्द के करीब आ रही है ? दिल्ली की राजनीति में बधाई की राजनीति के मायने क्या हैं ?
कोरोना दौर की दोस्ती के मायने
कोरोना संकट के शुरुआती दौर में हमने देखा है की दिल्ली भाजपा के नेताओं से लेकर गोदी मीडिया तक के स्वर अरविन्द केजरीवाल को कोसने के थे | हमने ये भी देखा कि दिल्ली सरकार ने कोरोना संकट से जूझने के लिए जो प्रयास किये उसका केंद्र ने शुरुआती दौर में जबर्दस्त विरोध किया | जिसमें होम आईसोलेशन का मुद्दा खूब गर्माया पर वही बाद में देश भर में लागू करने पर भाजपा सरकार ने मंशा दिखाई |
लेकिन जब अमित शाह ने दिल्ली के सरकारी अस्पतालों का दौरा किया , उनकी प्रशंसा की , राधा स्वामी सत्संग हॉल को कोविड उपचार केंद्र में बदलने का रास्ता साफ़ किया तब से मीडिया की भी भाषा बदली और भाजपा नेताओं की जुबान पर भी लगाम लगी | क्या ये उतना ही सहज है जितना दिख रहा है ?
अरविन्द केजरीवाल सरकार की मंशा दिल्ली में कोरोना पर काबू पाने की थी ,उसने यह कर दिखाया भले उसके लिए उसे अपने क्रेडिट कार्ड में सेंध लगवानी पडी |
दिल्ली दंगों पर चुप्पी
यही बात दिल्ली के दंगों में दिल्ली सरकार की भूमिका को लेकर उठे प्रश्नों पर भी लागू होती है | दिल्ली जल रही थी तब आरोप लगे की अरविन्द केजरीवाल की सरकार चुप क्यों है ? सब जानते थे कि दिल्ली के चुनाव होने वाले थे और जल्द ही स्पष्ट भी हो गया था कि भाजपा चुनावों में शाहीन बाग़ का इस्तेमाल साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए कर रही थी |
अब जब शाहीन बाद में सक्रीय शहजाद अली को भाजपा ने अपने घर में बुला लिया है तो लोगों को समझ आ जाना चाहिए की अरविन्द केजरीवाल चुप क्यों रहा ? सत्ता हर नागरिक आन्दोलन को येनकेन हाईजैक करवा ही लेती है , शाहीन बाग़ का संघर्ष भी अंततः इसी तरह बंधक बना कर सत्ता ने अपने हितों को साधने के लिए काम में लिया |
जानते हुए कि दिल्ली पुलिस ,जिसका नियंत्रण अमित शाह के हाथ में है वही जेएनयू हिंसा के फरार दोषियों को नहीं पकड़ सकी तो भी आप पूछ रहे हैं की अरविन्द केजरीवाल चुप क्यों रहा ?
दंगों और सरकारों को गिराने का इतिहास किस दल का है , सब जानते हैं , सबको मालूम है | सब ये भी जानते हैं कि शहर में आग लगेगी तो आग उनके घर तक भी आयेगी ...... सब जानते बूझते भी अगर लोग भीड़ का हिस्सा बना कर अपनों की ही जमापूंजी को आग के हवाले कर देना चाहते हैं तो कठपुतली पुलिस किस किस को रोकेगी ? क्यों रोकेगी ?
विपक्ष की तैयारी अरविन्द केजरीवाल को दंगों के खेल में फंसा कर चुनावी रण जीतने की थी | केजरीवाल सरकार जानती थी कि न पुलिस उसकी सुनेगी ना विपक्ष के गुंडे उसकी मानेंगे !!
हर राजनैतिक दल ऐसे समर्थकों और कार्यकर्ताओं की फ़ौज बना लेना चाहता है जो उसके कमांडर के हर गलत को सही सिद्द करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद के गुप्तकालीन नियमों का पालन करे | नैतिकता के मारे ये मासूम लोग पोस्टर चिपकाने , नारे लगाने , सोशल मीडिया पर ट्रोलगिरी करने , भीड़ बन जाने को ही जीवन की सार्थकता मान लेते हैं | दिल्ली में आम आदमी पार्टी , कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी तीनों के पास कार्यकर्ताओं की कमी नहीं लेकिन तीनों में अंतर साफ़ दिखाई देता है | ये अंतर उनकी तर्किकता, भाषाई मर्यादा , कार्यशैली , सामाजिक सरोकारों में स्पष्ट रूप से दखा जा सकता है | आम आदमी पार्टी के अधिकाँश कार्यकर्ता / समर्थक सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक पर भाजपा कार्यकर्ताओं/ समर्थकों की गुंडई से जूझते-उलझते दीखते हैं | दुष्प्रचार और प्रोपगेंडा मशीनरी के इस्तेमाल में सबसे अधिक चंदा उगाही करने वाली पार्टी अव्वल नम्बर पर है | बेरोजगार नवयुवक –युवतियों को आसान मेहनताना/भावुक झांसे देकर कुछ भी लिखवाया-बुलवाया जा सकता है |
केन्द्रीय सत्ता के परोकारों ने व्हाट्सएप्प से लेकर फेसबुक तक सब पर कभी अरविन्द केजरीवाल की खांसी तो कभी उनके ऑड इवन के फार्मूले , मोहल्ला क्लीनिकों तक का मजाक उड़ाया | बाकी चुनावों की तरह दिल्ली के आमचुनावों में बड़े दलों ने धन बल से लेकर भुज बल तक का खूब इस्तेमाल किया | अमित शाह की रैलियां और उनके नेताओं के कड़वे बोल किसे याद नहीं होंगे ? किसे ये याद नहीं होगा कि अरविन्द केजरीवाल भी भाजपा और कांग्रेस की जमकर आलोचना किया करते थे |
सब नजारा यकायक कैसे बदल गया ? क्या दुश्मनी यारी में बदल गयी या दोनों खेमों ने विरोधी की ताकत को भांप के राजनीति बदली है ?
मुझे दूसरा वाला विकल्प ज्यादा करीब लगता है | अरविन्द केजरीवाल अब राजनीति में पहले से ज्यादा परिपक्व व्यवहार करने लगे हैं | जनता की नब्ज समझने में उनका कोई सानी नहीं है | मोदी की आलोचना से ज्यादा वक्त वो अपनी विकास योजनाओं को अमल में लाने में लगा रहे हैं | दिल्ली MCD के चुनाव जीतना उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहा है | महामारी के इस दौर में दिल्ली की बीमार MCD अरविन्द केजरीवाल के योग्य सिपहसालारों की निगरानी में आ जाए उससे बेहतर उनके लिए कुछ नहीं हो सकता | दिल्ली सरकार जानती है की उनकी ये विजय जनता तक सीधे पहुंचने और निचले स्तर पर भाजपा के सियासी दखल को कम करने में मदद ही करेगी इसलिए सीधे टकराव को जितना टाला जा सके अच्छा है |
भाजपा जानती है “आप” के पास कांग्रेस का वोट बैंक है , अगर वो ये सिद्ध कर दे कि “आप” भाजपा साथ हैं तो उन वोटों में सेंध लग सकती है | दिल्ली में कांग्रेस वैसे ही नगण्य स्थिति में है , भाजपा के लिए केवल “आप” चुनौती है | “आप” जनता के हित में जितने साधन –संसाधन जुटा सकती है ,जुटाने की जुगत में है भले उसके लिए उनको विरोधियों से फीते कटवाने पड़ें या बधाई की राजनीति से दो चार होना पड़े |
इस सब में भी ‘आप ’ ने लाभ दिल्ली की जनता को ही पहुंचाया है | केजरीवाल की मांग पर अगर एक दिन में 30 हजार ऑक्सीमीटर जनता के लिए उपलब्ध हो जाते हैं तो ये राजनीति सकारात्मक है |
स्कूलों –अस्पतालों और जन सुविधाओं को लेकर अगर कोई सरकार गम्भीर है तो उसकी इस गुरिल्ला राजनीति से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए | अन्य दल अगर इसी राजनीति की आड़ में दिल्ली की सत्ता पर नज़र लगाये हैं तो उनको अपने चश्मे के नम्बर में सुधार की दरकार है |
...............बाकि तो दलों के दलदल में राजा-रंक सब नंगे है , सब चंगे हैं ,सब रंगेपुते हैं, इससे ज्यादा क्या कहें !!
Saturday, 20 June 2020
बालकनियों में उतरती शामों के किस्से हमेशा रूमानी नहीं होते .....
बंद दरवाजों और बालकनियों में उतरती शामों के किस्से हमेशा रूमानी नहीं होते ...... इनके किरदार अपने वजूद की लड़ाई - लड़ते , समझौते करते करते लम्बी नींद सो जाते हैं !! इनके ख्व़ाब बहुत खूबसूरत होते हैं , मौका मिले कभी आपको तो इनके सोने से पहले उनको जगा के पूछियेगा, खुद से और दुनिया से आपकी भी शिकायतें कम हो जायेंगी !!!!
Sunday, 28 April 2019
लेकिन फिर मन कहता है नोटा नहीं , उम्मीद को चुनना !!
Sunday, 24 February 2019
ये माटी ,पहाड़ ,नदियां ,जंगल ,खेत....... एक यायावर है मुझमें जो कभी टिकने नहीं देता !
वक़्त कहाँ रुकता है किसी के लिए और अगर रुक भी जाये तो कौन ठहरता है उस वक़्त के लिए ?
कभी वक़्त को हमारे लिए फुरसत नहीं और कभी हमें वक़्त का इंतज़ार करना नहीं आता....... हम सब ठेले जाते हैं ,कभी इसके मन से तो कभी उसके मन से !!
एक रोज़ जंगल की पगडंडी पर पत्तों की चरमर सुनते हुए मैंने जाना कि खुद के लिए वक़्त निकालना कितना जरूरी है | पहाड़ों से उड़ कर आते बादल और सीली हुई हवा ने कान में कहा कि अब आयी हो तो लौटना मत...... मैं अब उसी की सुनती हूँ | जब तक उसकी नहीं सुनी थी , उलझन में थी कि किसकी सुनूं ?
ये माटी ,पहाड़ ,नदियां ,जंगल ,खेत....... एक यायावर है मुझमें जो कभी टिकने नहीं देता ! वक़्त ने जीना सिखा दिया ,चलते रहना सिखा दिया , इंतज़ार करना सीखा दिया |
घुम्मकड़ी को जिंदगी का हिस्सा बना लीजिये , समझ जाएंगे कि जीने लिए दुनिया भर के तामझाम नहीं चाहिए | मौत भी आने से पहले आपके इंतज़ामात का जायजा लेने नहीं आएगी | कितना भी आराम जुटा लें , रिश्तों का कितना भी जमावड़ा हो आसपास...... आपको सुकून तो पल दो पल आँख बंद करके अकेले हो जाने में ही मिलेगा |
जब आनंद भीतर है तो बाहर किसे ढूंढना और किसके लिए महल -असबाब इकट्ठे करने हैं ?
भीतर के बच्चे को ज़िंदा रखिये और उसके बचपन को महसूस कीजिए | वक़्त को कैलेंडर का और कैलेंडर को जिंदगीनामा बना लेंगे तो जियेंगे कब ? लोग शिकाययत करते हैं ,उसके लिए इतना किया पर उसने ऐसा किया -वैसा किया...... ये सच है ,हम नाशुक्रे लोग हैं ! जिसने किया, वो उसका फर्ज था सोच कर आगे बढ़ जाते हैं ,ये सोच कर कि ना भी करता तो कौन सा उसको कहा था करने के लिए...... व्यथा की कथा यहीं से शुरू हो जाती है |
क्यों किया ?
इसीलिये कहती हूँ , कीजिये पर खुद को बचा ले जाईये इस कपोल कल्पित बोझ से | सब के कर्मों का भार अपने कंधों पर कैसे रखा जा सकता है |
वक़्त पर भरोसा करना और वक़्त से शिकायतें करना जरूरी नहीं है और लाज़मी भी नहीं ! अवसाद और खुशी का हर मौका पेड़ -पहाड़ -नदी -हवा...... के साथ साझा कीजिये और वक़्त की धुन को गुनगुनाइए ,यही जीवन संगीत है ,यही वक़्त है जीने का.......
जीते रहिये -चलते रहिये !!
Sunday, 20 January 2019
मैं चाँद पर हूँ , हूँ तो हूँ !! कम से कम सुबह होने तक तो हूँ ना .......
मैं हंस पड़ी ,ये सोच कर कि ये भी निरा झूठा है ,मेरा इंतज़ार इसे क्यों था भला ? सारी दुनिया इसकी तरफ देख के आहें भर रही है , जाने कितने ख्वाब ,जाने कितनी ख्वाहिशें इसके इर्द गिर्द घूमती हैं........मेरा इंतज़ार ?
उसको अनसुना कर दिया मैंने ! मैं बस उसको छूना चाहती थी ,ये देखना चाहती थी कि वो वास्तव में उन कल्पनाओं के जैसा है भी या नहीं जिसके लिए दुनिया छोड़ने की जिद की ??
अजीब होती हैं ना ख्वाहिशें भी ! रात सितारे हथेली पर धर जाती है और दिन माथे पर सूरज रखकर चला जाता है | हम कहाँ होते हैं इन सब के बीच ? कोई भी कहाँ है ? सबके पास अपनी अपनी दुनिया है , कहने भर को सब इसी दुनिया में हैं !!
हर कोई अपने आप में एक टापू है , उस तक पहुंच भी जाओ तो सब से कट जाना होता है और वहां से निकलो तो उसको छोड़ देना होता है | कोई विकल्प नहीं कि सब संग हो , सब साथ हों....... बस एक ही सुकून है , ख्वाब !!
मैं चाँद पर हूँ , तो हूँ !! कम से कम सुबह होने तक तो हूँ ना .......उससे हजार सवाल करूंगी , उसकी नजर से दुनिया भी देखूंगी !
मैंने कहा , मुझे ले चलो अपने साथ .......वहां बादलों से पार !! दुनिया देखनी है मुझे ?
वहीं से तो आयी हो ? वो हैरान था !
हाँ , पर वहां से कुछ समझ नहीं आयी , अजीब था सब !! भीड़ लगती थी पर सब अकेले ही मिले ......!
तो , तुमको क्या लगता है यहाँ से सब एक साथ दिखेंगे ?
हाँ ,दिखेंगे ! दूर से सब के करीब होना धोखा होता है ना !! फिर तुम भी तो उनके लिए वैसे ही मरीचिका हो.. तुम्हारी कसमें खाते हैं , तुमको देख कर कितने व्रत उपवास होते हैं , किसी के बचपन का सहारा और किसी की जवानी का .......पर तुम भी तो कहाँ हो ?
हूँ तो !! देखो छू कर देखो मुझे ....... मुझमें भी धडकन है , मुझमें भी बचपन है और जीवन का हर रंग है !! चलो ले चलता हूँ तुमको वहां जहाँ से तुम अपनी इच्छा पूरी कर सको !!
हम बादलों के पार चल पड़े ! चांदनी की दरिया पार कर कोई जगह थी , उसने कहा मेरी बाहं कस कर थामना और फिर नीचे देखना !!
मैं हैरान थी ,हथेलियाँ उसकी बाहं को और कस रही थीं ......मेरी दुनिया तो बिलकुल अलग है , एक दम बूँद बराबर , लोग भी कहीं नहीं , बस रोशनी ही रोशनी तो कहीं समन्दर कहीं पहाड़.......!! ये वैसी नहीं है, जैसी मैं सोचती थी !!
तुम डर रही हो ? चाँद ने पूछा !!
हां !! ये कैसे हो गया ? जो उम्र भर जिया वो झूठ कैसे और ये सच कैसा है ?
वो हंस दिया , कहने लगा "सुनो , मैं भी तो मिट्टी हूँ ! ना चांदनी मेरी है ना मर्जी से मेरी सूरत तुमको दिखा पाता हूँ...... असमान में टंगा हूँ ,ना जमीन मेरी है न आसमान मेरा है पर मुझे तुमसे प्यार है........इसलिए कि तुम मेरी दुनिया हो और मुझसे मिलने यहाँ तक चली आईं........अब जाओ ,लौट जाओ ! देखती रहना मुझे ,हर रात तुमको नई नज्म सुनाऊंगा ,तुम्हारे लिए कुछ कहानियां और गीत भी लाऊंगा......
और सुनो , दुनिया वही है जिसमें तुम खुश रह सको और खुशी का कारवां भीतर से बहता है !! उसे महसूस करना और खुश रहना...... मुस्कुराना कि चाँद भी तुम्हारा है और दुनिया भी !!
नींद तब तक खुल गयी थी ,सूरज माथे पर चढ़ आया था पर एक चाँद भी कहीं दूर क्षितिज पर था , जो देख कर मुस्कुरा रहा था कि मैं सलामत से अपनी दुनिया में लौट आयी हूँ उसके प्यार को हजार सितारों के साथ जीत के आयी हूँ ...........
Thursday, 20 December 2018
......लेकिन रंगों के खेल में खुद बेरंग मत हो जाना ..... इतना कि तुम खुद को भी पहचान ना सको !!
ये निष्ठाएं भी अजब का पागलपन हैं !! डिस्क्लेमर जैसा कुछ सबके दरवाजे पर टंगा है....... फैशन के इस दौर में गारंटी की उम्मीद ना रखें !
Monday, 24 September 2018
हम सिर्फ साँसों के नुमाइंदे हैं , क़ानून की किताब नहीं !
अरे !! ऐसा नहीं होता !! एक सवाल का जवाब एक ही हो सकता है |
क्यों ? जब सवाल किसी एक जवाब का परिणाम नहीं है तो जवाब भी कई होंगें ही ना !!!
नहीं , अगर तुमने ऐसा किया तो इसका अर्थ है तुम जवाब को गढ़ रही हो | जानती हो सच को गढ़ नहीं सकते |
यानि सवाल गढ़ सकते हैं लेकिन जवाब नहीं गढ़ सकते ?
सवाल कौन गढ़ता है ? वो तो उपजते हैं |
और जवाब ? जवाब भी तो उपजते हैं , अलग अलग किस्म के ,मौसम के हिसाब से !!
ये कुतर्क है |
तो तार्किक सवाल होते हैं और जवाब सब कुतर्क ?
नहीं ऐसा नहीं है | बात ये है कि मैं अगर कुछ सवाल कर रहा हूँ तो कुछ जानते हुए ही कर रहा हूँ ना और अगर जानते हुए कोई सवाल किया है तो उसे गढ़ना नहीं कहेंगे |
यानि तुम जवाब जानते हो फिर भी सवाल कर रहे हो ?
हाँ , ऐसा ही समझ लो |
ऐसा क्यों ? जब जानते हो तो जो जानते हो उसे ही मेरा जवाब मान लो और बात खत्म करो |
नहीं ये तो मेरी और से जबरदस्ती हो जाएगी | मैं तुम पर जवाब थोपना नहीं चाहता , बस जानना चाहता हूं !!
पर तुम जानते हुए भी क्या जानना चाहते हो ?
यही कि क्या मैं सही जानता हूँ ?
नहीं तुम कुछ नहीं जानते और जो जानते हो वो सही नहीं है |
देखो अब तुम जवाब को घुमा रही हो !!
अच्छा तो सीधा जवाब ये है कि तुम्हारा सवाल मेरे से जवाब लेने का अधिकारी नहीं है |
क्यों ? ये मेरा अधिकार है कि तुमसे सवाल करूँ ?
हो सकता है तुम्हारा अधिकार हो पर मेरा अधिकार है कि चाहूँ तो जवाब दूँ और ना चाहूं तो ना दूँ |
ये अनैतिक है , सीमा का उल्लंघन है |
तो जो नैतिकता तुम्हें सवाल करने का हक दे रही है वो मेरे जवाब नहीं देने को अनैतिक घोषित कर रही है ?
बहस से कोई फायदा नहीं !! साफ़ है कि तुम्हारे पास जवाब इसलिए नहीं है कि तुम दोषी हो
मेरा दोष ?
दोष यही है कि तुम सवालों से मुक्त होकर भाग जाना चाहती थीं लेकिन ऐसा कर नहीं सकीं !!
यानि तुम विजेता हो ? सवालों के घेरे में मुझे कैद करके रखना चाहते हो ?
दुनिया बड़ी खराब है , बाहर निकलना भी मत !!
सच कहा तुमने , दुनिया वाकई खराब है ! यहाँ तुम हो , सवाल हैं और जवाबों का ऐसा सन्नाटा है जिसे हजार चीख भी नहीं तोड़ सकती !!
लेकिन सुनो !!
कहो ?
मेरे पास एक विकल्प है |
वो क्या है ?
अब मैं तुमको कोई जवाब नहीं दूंगी ,तुम्हारे किसी सवाल का कोई जवाब नहीं दूंगी !! अब मैं तुमको सवालों का पर्चा दूंगी और हर पर्चे में उतने ही सवाल होंगे जितने तुम्हारे जवाब जानने के अधिकार हैं |
मैं जवाब नहीं दूंगा !!
मत देना लेकिन अब से यही जवाब मेरा भी मान लेना और सवालों के नकाब ओढ़ जवाब की जिद मत करना ! सच ये है कि ना तुम जवाब जानते हो ना मैं , ना तुम सवाल कर सकते हो ना मैं | हम सिर्फ साँसों के नुमाइंदे हैं , क़ानून की किताब नहीं !
पल पल को जी लो , लहर लहर भीग लो....... और कहानी कुछ आगे है भी नहीं और थी भी नहीं !!
Tuesday, 13 February 2018
मुन्ना ,बेबी ,जानू ,जाना सबका मालिक वैलेंटाईन है इसीलिए ......... !!!
Saturday, 25 November 2017
........तो AAP पांच साल की हो गयी ! बधाई !
अरविन्द के नेतृत्व ने इसे दिशा दी है तो मनीष ने इसको अंजाम तक ले जाने की भूमिका बखूबी निभाई है | कुमार विश्वास ,संजय ,आशुतोष ,दिलीप पांडे ,प्रीती मेनन ,गोपाल राय , प्रशांत भूषण और भी ना जाने कितने ही लोगों ने इस बच्चे को चलना सिखाया ,इसके कदमों को मजबूती दी |
हजारों कार्यकर्ता जिनके पास सम्भवतः पार्टी की प्राथमिक सदस्यता भी नहीं है को मैंने इस दल के साथ ऐसे जुड़े देखा है मानो वो इनका अपना परिवार हो !
कितनों ने अपना करियर छोड़ा ,घरबार छोड़ा , अपना शहर तक छोड़ दिया और सिर्फ जिद और जुनून में AAP के हमराह हो गए ! कभी कभी लोग पूछते हैं ,ऐसा क्या है इस अरविन्द केजरीवाल में जो लोग इसकी तुलना मोदी से करते हैं और तमाम मीडिया को भी सिर्फ दिल्ली ही दिखाई देती है ?
मेरा जवाब होता है , फकीर है वो ! जिसके पास कुछ नहीं होता उसके पास रब होता है | रब साथ ना होता तो आज और की तरह AAP को भी राजनीति निगल जाती | ईमानदार इरादे और नेक राह थाम कर चलने वाले ही जो कहते हैं कर दिखाते हैं |
हजार कमियों और असफलताओं के बावजूद AAP ने शिक्षा और स्वास्थ्य में जो काम किये हैं वो विपक्ष भी नजरंदाज नहीं कर सकता | बेशक परिवार के भीतर मतभेद हैं लेकिन अगर वो मतभेद भी उसे सकारात्मक दिशा दे रहे हैं तो उनका भी स्वागत करना चाहिए |
14 फरवरी को जब अरविन्द शपथ ले रहे थे ,मेरे साथ कोमल और पूजा थीं ! हम सब आंसुओं से तर थे ,हमारे पीछे लाखों की भीड़ थी जिनकी आँखों में हजार सपने और AAP के लिए दुलार था !
अंकिता ,केशव , आरती......सबसे पहली बार मिली थी लेकिन ऐसा लग रहा था मानो परिवार इकट्ठा हुआ है ! अंकित ,डॉन ,गजेंद्र ,दुर्गेश , राशु , शाश्वत ,राकेश ,नवेन्दु ,पवन,प्रियंका , ......पटेल नगर की ढेर सारी स्मृतियां मानस पर अंकित हैं | ढेर सारी तस्वीरें हैं जो इस सफर की साथ की याद दिलाती रहती हैं ! झाड़ू के साथ इस अनोखी यात्रा में शामिल होना मेरे जीवन के बेहतरीन समय में से एक है |
AAP ने जनता के भरोसे को तोडना नहीं है , उसे देश के हर बंदे को भरोसा दिलाना है कि झाड़ू हाथ में है तो क्या गम है !
बढ़ते चलिए , काम करते चलिए ! गलतियों से सबक ले ,सबको साथ ले कर चले तो जय निश्चित है !
शुभकामनाएं AAP सभी को !
Monday, 2 October 2017
क्या सुशांत सिन्हा मोदी जी के हरकारे हैं या रवीश के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं ?
मेरे सामने दो ख़त हैं - एक रवीश का जो उन्होंने अपने प्रधानमंत्री को एक नागरिक की हैसियत से लिखा था और दूसरा सुशांत सिन्हा का जिन्होंने रवीश के प्रधानमंत्री को लिखे पत्र का जवाब दिया है |
क्या आप किसी के किसी को लिखे पत्र का जवाब दे सकते हैं ? मैं सवाल आपसे करूँ और जवाब देने कोई तीसरा आये तो उसे क्या मानूं ? ये भी सही है कि भारत के प्रधानमंत्री के पास इतना टाइम नहीं कि वो रवीश जैसे मामूली पत्रकार के मामूली से पत्र के जवाब के लिए समय निकाले ! ये मसला पत्र लिखने वाले और पत्र पाने के वाले के बीच का था !
खैर ! अगर आपने पत्र नहीं पढ़ा हो तो एक दो मसले बता देती हूँ |
रवीश ने लिखा कि उनको धर्म रक्षति रक्षित: नाम के उस व्हाट्स ग्रुप में जबरदस्ती जोड़ा जा रहा है जिसके कई एडमिन हैं और उनमें से कइयों को प्रधानमंत्री जी सहित कई अन्य माननीय फॉलो करते हैं |
इस ग्रुप द्वारा उनको मारने , खींचने , अश्लील हरकतें करने तक की अभद्र टिप्पणियां की हैं ! एक अन्य महिला पत्रकार को भी परेशान किया जा रहा है | रवीश ने इस वार्तालाप के कई स्क्रीन शॉट भी दिए हैं और उनके नाम भी बताये हैं !
इसी में वे आगे लिखते हैं कि उनको धमकी दी जा रही है कि वे नौकरी से निकाले जाएंगे ! इस पूरे पत्र में रवीश ने अन्य किसी मुद्दे का जिक्र तक नहीं किया है |
दूसरा खत जो मुझे नहीं पता कि सुशांत बाबू ने किस हैसियत से लिखा है , में लिखा है की --
पहला - आपने अपने स्वर्गीय पिता से अपने आत्मिक रिश्ते को सार्वजनिक करने की धृष्टता की !
दूसरा -आप बेवजह डर रहे हैं यानि जो धमकियां मिल रही हैं उनको रवीश को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए ! वे ऐसा कर रहे हैं तो इसलिए कि आप प्रसिद्धि चाहते हैं ! वे खुद को अहमियत ना दें उनके रहने या जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा !
तीसरा - नौकरी जाए तो जाए आपकी बीबी खूब कमाती हैं और अब तक जितना कमाया उससे आप सड़क पर नहीं आएंगे !
आपने फलां को देखकर शीशा बंद कर लिया , मेरे लिये मैनेजिंग एडिटर को चिट्ठी क्यों नहीं लिखी !
पत्र के आखिर में तथाकथित पत्रकार सुशांत जी बीमार रवीश के स्वस्थ्य होने की कामना कर रहे हैं !
मैं हैरान हूँ और विचलित भी और विश्वास से कह रही हूँ पत्र का जवाब देने वाला या उसका कोई अपना उसी धर्म रक्षति रक्षित: का सदस्य होगा जो रवीश , बरखा , राजदीप को मारो - खींचो -पटको के साथ सम्पूर्ण परम् अश्लीलता के उन्माद के नारे लगा रहा है !
आप जिस भी दल /विचारधारा का समर्थन करते हैं वो आपके व्यक्तित्व में झलकने लगती है और अंततः वह संस्था या तो आप जैसी हो जाती है या आप उसके जैसे हो जाते हैं !
यदि आप सोचते हैं कि असहमति का अंत गौरी लंकेश जैसा होना चाहिए या असहमति का बलात्कार करना चाहिए तो आप उस भी उस उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनने जा रहे हैं या बन बन चुके हैं जिसको जीवन के मूलभूत प्रश्नों से कोई सरोकार नहीं है | आप चुप रहें और जयजयकार करके चमत्कार का इंतज़ार जब तक करें जब कि कोई आपका अपना सवाल करने के जुर्म में अपनी नौकरी नहीं खो देता या चौराहे पर मारा नहीं जाता |
यदि आप ऐसा नहीं सोचते हैं और मानते हैं कि पत्रकार का काम आंकड़ों की बाजीगरी का सच सामने लाना है ताकि आपका पैसा आपके काम आये , ताकि आप ये जान सकें कि आपने जिनको चुना था वो क्या सही क्या गलत कर रहे हैं तो समझिये कि टीवी में परोसी जाने वाली भायँ - भायँ केवल मरीचिका है , बचना चाहते हैं और अपना तर्क बचाये रखना चाहते हैं तो टीवी देखना बंद कर दीजिये | धार्मिक उन्माद से बचिए और समझिये कि एक पूरी इंडस्ट्री है जो ये फरेब लिखती है ,आपको जोड़ती है और आंकड़ों के मायाजाल से भरमा के पेट्रोल की बढ़ती कीमतों , फिसलती नौकरियों के सवाल से दूर कर रही है |
बाकि तो आप जो चाहे जो सोचें , जो चाहे करें कौन रोक सकता है !
दोनों के पत्रों के लिंक आपको दे रही हूँ केवल ब्लॉग के संदर्भ के लिए !
रवीश का पत्र जो प्रधानमंत्री जी के लिए था -
https://www.facebook.com/RavishKaPage/posts/706573349540815
सुशांत सिन्हा का प्रत्युत्तर -
http://www.sushantsinha.news/%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE/
Sunday, 24 September 2017
उम्मीदें रखें पर उनकी कैद स्वीकार ना करें
Tuesday, 30 May 2017
आज़ाद कीजिये खुद को नई पुरानी तल्खियों से ........
बहुत लोग मिले , हर किसी के पास अपना कैदखाना है , कोई अपनी खुशी से कैद है और कोई दूसरों की ख़ुशी के लिए उसमें कैद है ! रूह भी कैद है और सांसे तो खैर हैं ही ! हाड का पिंजर भी अपने भीतर कितनी जिंदगियां समेटे है |
जिसके पास घड़ी दो घड़ी बैठ जाओ , उनके भीतर से शिकायतों का दरिया बहने लगता है ! हर किसी को महसूस होता है कि उसे छला जा रहा है , सबको सबसे शिकायतें हैं ! अंतहीन सिलसिला है ! ऐसे बहुत कम लोग मिले जो कहते हैं कि उसे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं हैं , कुछ कह भी देते हैं तो अगले ही पल ऐसे सवालों की झड़ी लगा देते हैं जो जिंदगी की "क्यों " पर ही खत्म होती है !
मेरे पास किसी सवाल का कोई जवाब नहीं सिर्फ अपने अनुभव हैं ! उसी से कहती हूँ कि जिंदगी जितने भी सवाल करती है उन सब सवालों के जवाब हमारे ही कर्म हैं ,कुछ इस जन्म के कुछ पिछले जन्मों के ! दोष किसी का नहीं ! जो किया वो पाया तो शिकायत क्या कीजे !
जीना चाहते हैं और खुश रहना चाहते हैं तो शिकायतों की पोटली को इश्क के दरिया में बहा आइये ! आज़ाद कीजिये खुद को नई पुरानी तल्खियों से और नए कलेवर में अपनी उम्र को एक बार फिर आईने के सामने संवरते देखिये !
मन एक खूबसूरत किताब है जिसमें उन सुनहरे लम्हों की अनगिनत कहानियां हैं जो जीवन को अधिक अर्थपूर्ण बनाती हैं ...... तो फिर क्यों उन लोगों ,घटनाओं और समय की कैद का स्ववरण किया जाये जो जीवन को ही नष्ट कर रही हैं !
जिंदगी का हाथ थामिये और और चल पड़ें नए रास्तों और अनजान चेहरों के बीच ,शायद वहां आप खुद को खोज पाएं !
Sunday, 26 March 2017
रोमियो का खत ,प्राउड इंडियन जी के नाम !
Sunday, 4 December 2016
जाड़ों की शाम है
धूप का सिमटना
दिन का सिकुड़ना
रात का फैलना
अदरखी चाय में
तीखी हवा
तुम्हारी बातों
गुलाबी शरारतों का
घुलना और जम जाना
नम होना
आंखों के कोरों का
कोई जाड़ा याद आना
तुम्हारी वार्डरोब हो जाना
बर्फ संग
तुम्हारा खेलना
मुझे लंबे से खत भेजना
अब सब
जाड़ो की शाम है
वही एक मौसम
वही एल्पस
वही ठंड
इस छोर से उस छोर तक
बची रह गयी
केवल जाडों की शाम
वही एक शाम....