Saturday, 25 December 2021

वो जादुई क्रिसमस ,वो मीठी ईद ,वो लोहड़ी के किस्से.... आपको भी याद हैं क्या ?

आज क्रिसमस है ! बचपन का वो सालाना जलसा , जिसने बताया कि संसार जादूई है ,रंगीन है और इसी संसार में एक पेड़ ऐसा है जिस पर ढ़ेर सारे उपहार ,टॉफियां  ,बल्ब ,रंगीन पन्नियों से जड़े सितारे टंगे हैं | इस पेड़ के पीछे से एक लाल कोट ,लाल टोपी लगाये करिश्माई चश्मा पहने एक टोपी वाला बाबा आता है और नींद में मुस्कुरा रहे बच्चों के सिरहाने वो सब रख जाता है जिसका वो साल भर से इंतज़ार कर रहे होते हैं | 

उस वक़्त हमें बस ये पता था कि रात चर्च में घंटियां बजेंगी , प्रार्थना होगी और अगले दिन स्कूल में दोस्त टॉफियां बांटेंगे ,खेलेंगे , हम सब एक दूसरे को बताएंगे कि उसके सांता ने उसको क्या दिया | सांता श्यामल के घर भी जाता था , शगुफ्ता के भी और सैमुअल के भी ! वो ऐसा कैसे करता था ? क्या इन सब के पापाओं के सांता से कनेक्शन थे ? 
उस उम्र में ,उस काल में हमें न ईसाई होने का बहुत मतलब पता था न ये पता था कि मुसलमान कहाँ से आये ,उन्होंने क्या किया ,क्या नहीं किया !! हमें बस पता था कि ईद आएगी तो सलमा के घर जाएंगे ,उसके अब्बू और बड़ी फूफी से ईदी मिलेगी | आसिफ अगले कुछ दिन ढ़ेर सारा इत्र लगा कर आएगा और टीचर की डांट खायेगा.... खान अंकल शाम को बड़ा सा टिफिन लाते जिसमें कभी सिवईयां होतीं ,ज़र्दा पुलाव कभी मटन भरा होता था |  उस दिन उनके घर जलसा होता था | माँ मेरे लिए शरारा सिलवाती थीं , उस शरारे कुर्ते और दुप्पटे का हल्का निम्बुआ रंग ,उसके गोटे की जगरमगर हर ईद पर ताजी हो जाती है ....खैर !!

दिसम्बर खत्म होते ही लोहड़ी की तैयारी शुरू हो जाती थी | 

इस बार किसके घर के आगे ,किसकी छत पर रात भर डीजे लगेगा और कौन गुड़ ,रेवड़ी लाएगा , सबकी लिस्ट बनती | किसके पापा को पोपकोर्न के लिए कहना है और पड़ोस के निगार भाई की टाल से लकड़ियां कौन लाएगा ,सब की व्यवस्था अग्रवाल अंकल करते |  मुझे याद है सबसे अच्छा म्यूज़िक सिस्टम शर्मा अंकल के यहाँ से आता था | बेदी आंटी की पकौड़ियाँ रात भर छनतीं | सबने रात भर नाच-गाना करना होता था और पतंगों में तंग बाँधने होते थे | चरखी भरने का काम आसिफ अच्छा करता था , वो पेच भी बढ़िया खींचता था | 

मधु और मैं भाईयों से इतर अपनी चरखी और पतंग जमाते | मनप्रीत को कहना पड़ता था , दुप्पटा पिन करके छत पर आना , वो उसी में पतंगे उलझा कर फाड़ देती थी.... नुकसान हो जाता था | 

संक्रांति कौनसे धर्म के लोग मनाते थे ,हमें तब नहीं पता था क्यूंकि बाज़ार में तो अहमदी का मांजा और कादिर भाई के यहाँ से पतंग लाते थे |  एक से एक रंगबिरंगी पतंगें ....., तब किसी ने नहीं कहा कि वो तालिबानी हैं , या किसी ने आसिफ के पतंग उड़ाने से उसके धर्म के खतरे में आ जाने की बात भी नहीं बतायी | 

हम सब बचपन की ऐसी ही अनगिनित रंगीन कहानियों में बहुत खुश थे |

दिवाली आती तो नाज़िम भैया घर को झकाझक पेण्ट कर जाते | पड़ोस के सरदार अंकल की इलेक्ट्रिक की दुकान से लड़ियां लाते , रंगीन बल्ब लाते और घर को ,मोहल्ले को रोशनी से लकदक पाते | सुबह -सुबह शरबती काकी माटी के कलस और दिये लातीं और मां शब्बो की रुई भरने की दुकान से बाती लगाने की रुई मंगवातीं | कपूर आंटी मठरी मस्त बनाती थीं |

ईज़ा केक बनाती थी और यीशू की तस्वीर के सामने जाकर हम सब फूलझड़ी जरूर जलाते थे | उसका भाई था टीटू | टीटू को लड़ियाँ जलाने का शौक था | एक दिवाली उसका हाथ जला तो , रिज़वान के डॉक्टर पापा सबसे पहले उसके इलाज के लिए उसे ले दौड़े |  उस दिवाली मोहल्ले में सबके घर मायूसी थी कि टीटू घर आ जाए तो चैन से लक्ष्मी पूजन हो |  वो ठीक हो गया ,तब भी किसी ने नहीं बताया कि दिवाली पर एक ईसाई पटाखे नहीं जलायेगा और अगर वो जल गया है तो उसका इलाज मुस्लिम डॉक्टर उसके धर्म परिवर्तन के इरादे से कर रहा है |

जाने दीजिये , दीगर बात ये है कि टीटू आज भी ईसाई है , रिज़वान भी अब डॉक्टर है और उसकी बहन ने बेदी अंकल के डॉक्टर बेटे से प्रेम विवाह कर लिया है | हम सब ने उसकी शादी में मस्त बिरियानी छक के खाई थी |  

मैंने मुशायरों को सुना , अमज़द अली का सरोद  सुना ,पंडित भीमसेन को गाते , बिस्मिल्लाह खान को शहनाई पर कान्हा के गीत बजाते सुना है | 

अब जब ये सब झगड़े देखसुन रही हूँ तो समझ नहीं आ रहा कि ये नफरतों के बीज अचानक इस खूबसूरत ज़मीन पर कैसे उगने लगे हैं | नफरती नागफनियों के बीच से खंजर लिए आप मोहब्बत और खुलूस के उन जलसों से आने वाली नस्लों को महरूम करने जा रहे हैं जिनका इश्क़ जौन एलिया की शायरी के भरोसे परवान चढ़ा है , बिना मज़हब देखे जिनके हौसलों को अम्बेडकर की रहनुमाई वाले संविधान ने हिफाज़त बख़्शी है | 

अब जब न बाबर रहा ,न अकबर ज़िंदा है , न सिकंदर आ रहा है ,न कोई अंग्रेज न पुर्तगाली.... तो मसला ये है कि अब ये सब हमारे बीच ,हमारे ही दोस्तों ,चाचा -फूफा , जीजा ,पड़ोसी के अवतार में किसी गुंडे नेता की अगुआई में हमारे घर -आंगन में लफंगई का नंगा नाच कर रहे हैं |  ये ये नहीं बता रहे कि प्यार कैसे बढ़ायें ,ये ये बता रहे हैं कि किसकी इज़्ज़त को,किसी की जिंदगी को कैसे तार -तार करें | इन्हें सत्ताखोरों ने खींच कर आपके बीच ला खड़ा किया है ताकि किसी रोज़ अगर आपके गुस्से का शिकार हों तो वो हों , वो फिर भी धर्म के जरिये सत्ता की मलाई चाटने के लिए ज़िंदा रहा जाएं | 

पर बहुत देर हो चुकी हैं शायद...... 

आपको क्या लगता है ,आपके बच्चों और आपके अपनों के दिलों से ये जहर कितना दूर है ? टीवी -व्हाट्सप्प की मनहूसियत और धर्म के नाम पर परोसे जा रहे नशे के इस कारोबार से खुद को बचाईये | हिन्दू वाकई खतरे में है , उसकी सादगी -उसकी उदारता ,उसका बड़पन्न सब खतरे में हैं | उसकी महान विरासत के साथ दूसरे मज़हब की नक्काशियां जुडी रहनी चाहिए , उसके गुंबदों में अज़ान भी हो और दुर्गा के स्त्रोत भी हों ! वो जोड़े , तोड़ने के लिए धर्म नहीं बना है | अपने चमन को नफ़रत के इस सुनियोजित , सुसंगठित हमले से बचाईये| 

इतिहास पढ़ना है तो किताबें उठाइये , किसी पांचवीं फेल के व्हाट्सप्प संदेश के आधार पर हिन्दू को न तो खतरे में मानिये न भड़भड़ा के उसे उठाइये | हर हिन्दू -मुसलमान -सिख -ईसाई की नींद पूरी होने दें , उसे पौष्टिक भोजन दें ताकि वह लड़ाई झगड़े से निकल कर अपनी पढ़ाई -लिखाई पर ध्यान दे सके | कुछ नहीं रखा इस सब में , खतरे में धर्म नहीं आपकी औलादों के भविष्य हैं | 

आप सभी को क्रिसमस की शुभकामनाएं , सांता के झोले से हमेशा की तरह आपके अपनों के लिए ,आपके लिए प्यार और दुआ निकले |
आमीन !!

Thursday, 16 December 2021

सच को सब मालूम है पर सच की सुनेगा कौन ? सच की गवाही कौन देगा ? सच के चेहरे की लकीरों को कौन पढ़ेगा ?

आदमी हजार बार मरता है और  जो कहता है कि जी रहा है, तो झूठ कहता है. उसका ये कौनसा जनम  है ,वो खुद नहीं जानता ! मुखौटे लेकर सच की दुहाई देते लोगों के बीच , झूठ की फसल को सींचते लोग , दिन ब दिन बदलते , बहलाते ,खुद को फुसलाते लोग......... जिन्दा हैं क्या ? 

तुमको अच्छा लगता होगा , चमके -उजले -दमकते चेहरों से उतरते रंगों का दरिया , बातों में जमीर घोल कर पीने -पिलाने का चलन , अच्छा है ! सब अच्छा है ! सबको अच्छा कहते रहना भी अच्छा है | 

अच्छा तो है ही ये सब, पर जब मर ही जाना है एक दिन सबने तो फिर किसके लिए इतने स्वांग रचने हैं ?  सबको सबका सच पता है ! कितना हासिल हो जाएगा ,कितना संग ले जायेगा कोई....  

बेवज़ह अब कुछ नहीं होता , वजह सरकारी होती हैं , कुछ भी ढूंढने से ज्यादा , क्या वजह बतायी जाए ,यही ध्यान रखना जरूरी है  ! नकली मुस्कुराहट चस्पा कर लोग कोई अपना सा ढूंढ रहे हैं ,अपना कह देने भर को मर रहे हैं ? क्या मंज़र है , लाशों के इस ढेर में सबको किसी से प्यार करना है ,सबको खुद से मुलाकत करनी है ? 

कितनी लाचारगी ,कितनी बेचारगी है...... सच जानते हुए भी इस स्वांग का हिस्सा सबको बनना है  | 

इस खेल में हंसना ,रोना ,गाना -बजाना सब होगा |  बस जिस रोज़ सच विदा होगा , असल खेल उसी दिन होगा !!

आंसुओं से आईने को पिघलते देखा है क्या आपने ? 

ये उस दिन देखना ........देखना कि झूठ की भी रस्मअदायदगी होती है , उसकी भी सवारी निकलती है | लोग तख्त पर बिठाते हैं , जयकारे होते हैं , शहर में मुनादी होती है कि झूठ अब गद्दी पर बिठाया जायेगा ,झूठ अब शासन संभालेगा | 

सच को सब मालूम है पर सच की सुनेगा कौन ? सच की गवाही कौन देगा ? सच के  चेहरे की लकीरों को पढ़ेगा कौन  ? 

इस तरह हजार झूठ के बीच जीते हुए मर जाने की कल्पना कीजिये और फिर हर जन्म में फिर इन्हीं के बीच ,इन्हीं आवाज़ों के बीच खुद को देखिए ...... क्या लगता है , फिर लौटना चाहेंगे ? फिर से उसी शहद से पगी खंजर सी जुबान से खुद को आज़ाद कर सकेंगे ? 

सीने में कुछ धंसता है ये सब देख के , बहुत गहरा सा........ किरचे सा झूठ है पर जन्मों का घाव है !

हर कोई कोशिश कर रहा है  , झूठ के महल को सपनों सा सच देखूं , कोई परिकथा सा खेल जानूं ,उसे अमराई की गोद में खेलती धूप -छाहँ देखूं...... 

मैं भी हैरान हूँ कि सच को सच देखूं या  झूठ के तिलिस्म को अपना ठिकाना मानूँ ? 

एक कलम लेकर उसे तोड़ दो .... बात खत्म हो जायेगी ! 

अपने हिस्से का सच वहीं तक रह जाएगा , उसके सच उसके साथ रह जायेंगे.........

वक़्त फैसला करेगा कि कलम लाना सच था या कलम तोड़ देने से सच को झूठ लिख सकने की संभावना को खत्म कर देना ही सच था ? 

सच तो ये है कि सच कुछ होता नहीं ,झूठ कुछ है नहीं | सबको गुड्डे -गुड्डी ब्याहने हैं और बिदा कर देने हैं | 

आप भी खेलते रहिये , हमने भी खेल लिया !!

जय राम जी की ! 

Wednesday, 15 December 2021

एक दिन ऐसे ही सब कहा - सुना धरा रह जाएगा। ........

मन किसी बिगड़ैल बच्चे सा है , जिद करता है कभी रूठता कभी मानता कभी मनाने बैठ जाता है !! बात बात पर पसरने की उसकी आदत जाती नहीं है |  संसार की अपनी गति है ,अपनी सी आदते हैं और मन की अपनी .. किसी पल लठैत बन कर उसके सिर पर सवार हो जाओ तो उस घड़ी दो घड़ी गर्दन लटका काट बैठ जाता है जैसे ही अक्ल ने मुहं फेरा वो फिर से कहीं और निकल जाता है.... दिन भर इस गली उस गली भटकेगा फिर कहेगा कि पाँव दर्द कर रहे हैं , जब समझाया तब मानेगा नहीं | ऐसा कैसे चलेगा ?
एक रोज़ चोट खा बैठा , इतना खून बहा कि कोई दवा काम न आयी न अस्पताल खाली मिले ......... अच्छा ही हुआ , अपने आप घाव भरा ,अपने आप लड़ने की सीख ले ली |

नहीं सीखा उसने, तो वो था सम्भलना ..... 

सम्भलने के लिए साथ भी कोई दे तो कितना दे ?
चलना उसे खुद है , चलानी भी उसे अपनी ही है...ड़र लगता है पर उसे रोक नहीं सकती ,उसे बाँध के रखना भी मुनासिब नही ना ?

फिर मन को ये आज़ादी भी मैंने ही दी है ,मन को उड़ान का हौसला भी मैंने दिया फिर मैं ही उसे लेकर असमंजस में आती भी हूँ !! 
ये भरोसा है कि वो सही राह चलेगा फिर अगले ही पल लगता है, ये मेरा अति आत्मविश्वास है .. भटकते देखा है उसे मैंने कई बार !
 
ये शंका भी जायज़ है ,हर बार उसको लौटा लाना थका देता है ,वो हर बार उसी ऊर्जा से दौड़ पड़ता है  ! तारों की छाहँ में उसे नींद नहीं आती , दिन में उसे चैन नहीं  ? 

ये खेल बढ़ता ही जा रहा है | क्या मैं उसके थक जाने का इंतज़ार कर रही हूँ ? क्या मैं उसे मर जाने देना चाहती हूँ ? क्या मुझे उसका साथ पसंद नहीं ..... ऐसे तमाम सवालों के अनगिनित जवाब है और उन जवाबों से उपजे अनगिनित सवाल। जब सवाल भी अपने हों और जवाब भी अपने तो क्या और किसे क्या-क्या सुनाना है.......

एक दिन ऐसे ही सब कहा - सुना धरा रह जाएगा , सब तरफ का शोर थम जाएगा | उस दिन न मन होगा न मन का होगा  .... तब सब वही होगा जो तमाम उम्र होना चाहिए था , शांत और दृष्टा भाव......... उस नीरवता में जोर से हंसना चाहूंगी अपनी मूर्खताओं पर ,अपने पछ्तावों पर ,अपनी ध्रष्टताओं पर ,खुद को झिझोड़ के जगा देने का वक़्त चाहिए | 
तो .....अब उस सफर का रुख करना चाहिए जो भीतर ले जाए , अब उस मोड़ को छोड़ देना चाहिए जो फिर फिर बुलाता ,लुभाता और बरगलाता है, भटक जाने को........ अब नहीं जाना , अब लौटना मुमकिन नहीं है ये मन को समझना होगा वरना वापसी होगी नहीं , मंजिल मिलेगी नहीं ,रास्ते साथ देंगे नहीं ... कब तक ,कहाँ तक ले जाये ये रेत का सागर कौन जाने .... मन की मरीचिका का हासिल कुछ नहीं। फिर खुद को भरमाना भी क्या ? अबुझी प्यास से मरना तो नियति नहीं मेरी ?

 !!
सफर मन से मन का ही हो | बाहर निकल कर जाएंगे तो धूल ,धक्के ,शोर और बदहवासी की सिवा कुछ हासिल नहीं , जो हासिल हुआ भी तो तन मैला , मन खाली ही जायेगा !

सो मन से बतिआइये , उसे खुद में लौटा लाईये !

Tuesday, 30 November 2021

पापा बगीचे के वो हरे भरे दरख्त थे जिसकी हर डाल पर बचपन पसरा था ....

आज फिर नींद नहीं आयी | अब नींद का नहीं आना ,आकर लौट जाना या आते हुए भी न आने सा महसूस होना सामान्य सी बात हो गई है | मैं अवसाद में नहीं हूँ ,ये यकीन दिलाते रहना और सहज बने रहने के लिए जूझते रहना ,आदत में शुमार हो गया है | नींद से दोस्ती हमेशा से बहुत अच्छी नहीं रही लेकिन साल 2021 ,अप्रेल-मई-जून के महीनों के कोरोना युद्ध ने उसे और बेमना कर दिया |

सच कहूं तो इस सब को लिखने से भागती रही मैं.. नहीं लिखना चाहती थी ,नहीं चाहती थी कि कोई और उस दर्द का सहभागी बने ,नहीं चाहती थी कि वो काली रातें ,स्याह दिन फिर -फिर आँखों के सामने से गुजरें लेकिन छः महीने बीत जाने पर भी वो टीस रह -रह कर उठती है ,जख्म फिर हरे हो जाते हैं | नींद फिर आँखों से दूर हो जाती है | इस कमरे से उस कमरे में , कभी भीतर -कभी बाहर भागते हुए सुबह हो जाती है | रात डराती है , डर से गुजर जाने पर भी डर लगना अजीब है | ये शायद डर नहीं है ,ये मलाल है कि पापा को उनके हिस्से की ऑक्सीजन ,उनके हिस्से की साँसे मैं उनको हजार कोशिशों के बाद भी न दे सकी | 

उनके जाने के बहाने हो सकते हैं लेकिन उनके न होने के बहानों से दिल राजी नहीं होता | सब तर्क -वितर्क ,ज्ञान का हर पन्ना वो खिलौना लगता है जिसे देख कर भी उठाने का मन नहीं करता | 

पापा को उम्मीद नहीं थी कि वो पॉजिटिव आ सकते हैं ,डर जरूर था उनके मन में | जिसका मन सिर्फ उसके बगीचे में लगता हो वो आईसोलेशन में कैसे रहते ? फिर भी उन्होंने कोशिश की , वो फिर भी बिना सहारे मुकाबला करते रहे | खुद चल कर पहला सीटी स्कैन करवाया , खुद चलकर अप्रेल की 23 तारीख को आईसीयू के बिस्तर तक पहुंचे | दिन में उनको वहाँ छोड़ा , रात तक वे घबरा गए | पास के मरीज से फोन करवाया ,सामने बैड पर कोई आखिर साँसे ले रहा था | उनको मोबाईल पसंद नहीं था ,चलाना सीखा नहीं | माँ के बिना रह नहीं सकते थे , बगीचा भी साथ नहीं था | डाक्टर वार्ड में रहने से मना कर रहा था | हम भाई -बहन उन्हें समझा -बुझा के लौट आए | सुबह फिर जिद कर ली ,घर लौटने की | कैसे लौटा लाती ? पापा भर्ती हुए उसके तीसरे दिन छोटे भाई की सांस भारी होने लगी | वो घर पर ऑक्सीजन सपोर्ट पर था ,पापा अस्पताल में | मैं 103 बुखार में, डॉक्टर को रेमेडेसीवर समेत जो चढ़ना था ,चढ़ता .. हाथ में कैनूला लगा रहता .. सुबह पापा के पास भागती , पापा बिटिया को बुलाया दो कि जिद किये रहते थे ! उनको बिठाना ,स्पंज करना ,मालिश करना , खिलाना.. 

वार्ड में किसी को पानी पिलाना ,किसी आंटी को बाथरूम तक ले जाना ,किसी को खिलाना .. सब किया ,सबको  उम्मीद रहती थी कि बिटिया आएगी .. पापा के पास वाले बैड पर एक भाई जिसे तीन दिन तक संभाला ,सामने हाथ जोड़ कर चला गया , कोई अपने घरवालों को पुकारते चले गए  .. प्यार भरे स्पर्शों को प्लास्टिक के बैग में सिमटते देखा मैंने  .. 

दोपहर फिर घर लौटना भाई के लिए सिलेंडरों का इंतजाम करना फिर वापिस पापा के पास लौटना.. रात फिर से घर के आईसी यू में खुद को भर्ती करना , बाल्टी भर दवाओं के डिब्बे .. एक पलंग पर भाई ,एक पर मैं !! रातभर भाई खांसी से सो नहीं पाता था | माँ को कह सुन के सुला देती थी | वे भी सहमी सी हिम्मत दिखाती रहीं | भतीजा सिलेंडर के इंतजाम के लिए रात भर लाईनों में लगा रहता.. सुबह हो जाती !! 

एक रोज अस्पताल के वार्ड के बाहर चर्चा सुनी कि जो ऑक्सीजन लाइन आईसी यू में या रही है उसमें ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम है | सुनते ही अंदर भागी तो समझ आया कि अपने पेशेंट के लिए घरवाले सिलेंडरों का इंतजाम कर रहे हैं | 

जिंदगी में पहली बार खुद को इतना निराश ,इतना हताश पाया | सिलेंडर कहाँ से लाऊँ ? दोस्तों -शुभचिंतकों की मदद से 21 सिलेंडर इकट्ठे किये 15 दिनों में , भाई और पापा दोनों को उसकी जरूरत थी .. सिलेंडर भरवाना हर रात संजीवनी लाने से कम न था | इस बीच पापा को ब्रेन स्ट्रोक आ गया | एक हिस्सा काम नहीं कर रहा था ,नजर आना बंद हो गया | आवाज भी जाने लगी | वे पेन मांगते लिखते तो  घर में सबका हालचाल पूछते | कहते कि घर ले चले .. एक रोज उन्होंने लिखा " बिटिया खूब खुश रहना ,मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है | सबका ध्यान रखना | "

मैं नहीं जानती ,कैसे खुद को संभाला .. 7  तारीख को पापा को घर ले आयी कि अब जो हो सो हो कम से कम माँ के आँखों के सामने ,अपने -घर -बगीचे से रुखसत हों !! पापा मास्क खींच देते थे ,सो हाथ बांधना पड़ता था | आखिरी दिन उन्होनें मुझसे हाथ खोलने जिद की ,मैंने मना किया .. उनका देखना ऐसा था जैसे कह रहे हों कब तक बाँधेगी.. 

शाम को देह के बंध से वो मुक्त हो गए ! कोई रो भी न सका .. भाई के सामने से उनकी देह अंतिम यात्रा पर थी वो कंधा न दे सका | 

इधर पापा का जाना हुआ उधर भाई की साँसे जवाब देने लगीं | शाम 5 बजे खुद ही गाड़ी में सिलेंडर समेत भाई -भतीजे के साथ शहर के पाँच अस्पतालों के दरवाजे खटखटाए .. रात 11 बजे जाकर जगह मिली !

भाई जीत गया | 15 दिन बाद घर लौटा फिर महीने भर बाद पापा के फूल मां गंगा की गोद में रख आया | पापा दो महीने अपने ही बगीचे के ,अपने ही सँवारे आसापाला के आलिंगन में रहे |

इस सब के बीच मैं कब ठीक हो गई ,पता नहीं चला ! कब मुझे कोरोना हुआ ,कैसे कब गया, नहीं पता | 

मैं चाहती थी कि मुझे ये सब याद न रहे , स्लेट -पट्टी पर लिखे की तरह इसे भी सूखा दूँ .. नहीं सूख रहा है | एक -एक कर कितने ही चेहरे ,कितनी बातें , कितने मलाल दिमाग को सुन्न किये जाते हैं | 

आज फिर सुबह हो गयी ! एक दिसंबर 2021 .. अब जब फिर तीसरी लहर की आशंका उठने लगी है ,दिल फिर से घबराने लगा है ! कहते हैं ,ब्रह्म मुहूर्त में ईश्वर जल्दी सुनते हैं .. मैंने आज सब लिख दिया है ,मैं चाहती हूँ ईश्वर इसे पढ़ें ,हमसे जो भी गलत हुआ हुआ हो उसे क्षमा करें .. कुछ न दें बस अपनों को आसपास रहने दें ,उनकी साँसों पर उनका हक रहने दें !

आप सब भी अपना ध्यान रखना ,अपनों के साथ रहना .. पापा बगीचे के वो हरे भरे दरख्त थे जिसकी हर डाल पर बचपन पसरा था ! माँ देहरी हैं , बस वही हैं जो हिम्मत बँधायें हैं कि एक दिन सब अच्छा होगा .. आप भी दुआ करें कि सब के साथ ,सबके पास सब अच्छा रहे !

चलते हैं ,फिर मिलेंगे ! निराश फिर भी मत होना ,जीवन है सब चलता रहेगा .. 

Monday, 16 August 2021

मैं न कर सकी पर आप जो विद्रोह कर सकते हैं, जरूर कीजिएगा | इश्क की सतरंगी दुनिया में लौट आने की उम्मीद मत छोड़िएगा ....

 

बहुत बार मुझे ऐसा लगता था

अगर विद्रोह करने पर मजबूर कर दी जाऊँ

तो मैं बहुत जोर से चीख सकती हूँ

दीवार को भड़भड़ा के गिरा सकती हूँ

आसमान को पीछे धकेल सकती हूँ

और

अततः उन सब चीजों को बदल सकती हूँ जो मुझे असहज कर रही हैं |

पर ये सब निहायत बचकाना सिद्ध हुआ

विद्रोह की हर स्थिति में

मैं बच निकली

कभी ये कहते हुए कि मेरे ही लड़ने से क्या होगा

कभी ये मान कि मुझसे पहले भी कई चले गए

जो सोचते थे

आसमान में सुराख कर देंगे |

 

हाई स्कूल में आयी , तीसरी भाषा के रूप में उर्दू पढ़ने का ऐलान कर दिया |

घर वालों ने विरोध नहीं किया लेकिन जब उर्दू की क्लास में जाकर बैठी

टीचर के साथ साथ क्लास की बाकी लड़कियों ने भी समझा दिया कि ये उनके लिए भी अजीब है |

मैंने संस्कृत पढ़ी ,बेमन से |

मन उर्दू की किताब में था

 

ये विद्रोह भी वहीं दब गया |

 

मेरी सबसे पक्की सहेली फिरोजा दसवीं में ही पाकिस्तान के किसी लड़के से ब्याह दी गयी|

फिरोजा चली गयी | पक्की सहेलियों का विद्रोह कच्चा साबित हो गया |

 

ईद की सिवईयों का स्वाद लेते , शरारा –कुर्ते और चुन्नी को संभालते

गज़लों वाली रातों और मुशायरों के साये में बचपन बीत गया |

उस दौर को रोक लेने की जिद भी बहुत की

पर विद्रोह तब भी नहीं कर सकी |

 

वो दौर आया जब दिल बल्ले पर धड़कने लगा !

पाकिस्तान की टीम जयपुर आयी थी

सनक की इंतिहा ये कि इमरान के ऑटोग्राफ के लिए कॉरीडोर पार कर उसे सीढ़ियों पर ही घेर लिया |

तब वो सिर्फ इमरान था | इमरान खान नहीं !!!

हॉस्टल की दीवार पर चस्पा दसियों पोस्टर वाला हीरो !!

एक दिन कर्फ्यू लग गया | सब हिन्दू –मुसलमान हो गए |

भीतर का इंसान , विद्रोह के स्वर में चिल्लाया

बंद करो ये खेल !!

सुनो सब एक से नहीं हैं

आवाज मेरी बस मैंने ही सुनी

पर विद्रोह मैं तब भी नहीं कर सकी |

 

लोगों ने कहा तुम मासूम हो, तुम सच नहीं जानती |

न जानने,

न बता पाने,

न सुने जाने का आक्रोश समझते हैं ना ?

मैं तब भी कुछ बदल नहीं सकी |

मैं उन सबको तब भी कुछ समझा न सकी |

विद्रोह तब भी नहीं कर सकी |

 

फिर एक रोज इंदिरा का खून बहा....

गोधरा हुआ , गुजरात हुआ.........दिल खूब रोया !

वो संभलता कि राजीव गए ,सफ़दर झुंड में घेर के मारे गए

फिर ये दर्द आदत में शुमार हो गया..

फिर क्या आईसीस और क्या RSS

विद्रोह तो मैं तब भी नहीं कर सकी |

 

सच तो ये है

मैंने ही इश्क में तर

खूबसूरत नज़्म सी दुनिया की तमन्ना की थी

ये और बात है कि

लहू में तरबतर दुनिया मुझे हासिल हुई |

ये जान समझ लिया है मैंने

विद्रोह मैं अब भी नहीं कर सकी |

 

अब कुछ नहीं सूझता मुझे

बस एक खामोश उम्मीद बाकी है

कोई दिन ऐसा आएगा जब सब एक दूसरे को देख बाहें फैलाएंगे

मुस्कुरा कर कहेंगे कि तुम सब मेरे अज़ीज़ हो !

 

दिल का एक हिस्सा कहीं और बस रहा है,एक हिंदुस्तान में धड़क रहा है |

मैं खुद को दुनिया के हर हिस्से में , उसकी बनायी हर शह में जीती हूँ |

हर किसी के दर्द में रो लेती हूँ

हर किसी की मुस्कुराहट पर मर जाती हूँ

गीता में जब कृष्ण कहते हैं कि आत्मा लंबे सफर पर है

ऐसा है तो मैं कहती हूँ कि फिर हम उसे वीज़ा देने वाले हैं कौन ?

ये नियम, ये शर्तें ,ये पाबंदियाँ बस साँसों की गुलाम हैं....

कितना रोक लीजिएगा !

देह के रंग-ईमान ,उस पर कानून बनाने

बेकार की वजहों से

छोटी सी जिंदगी में जहर भर देने का ये सिलसिला थम जाना चाहिए !!

मैं न कर सकी पर आप जो विद्रोह कर सकते हैं, जरूर कीजिएगा |

इश्क की सतरंगी दुनिया में लौट आने की उम्मीद मत छोड़िएगा !

हम कहीं न कहीं ,कभी न कभी उसे जरूर पा लेंगे !

हम उस पार रोशनी की दुनिया में फिर से मिलेंगे

उम्मीद मत हारना !!

 

Monday, 17 August 2020

दिल्ली की राजनीति में बधाई की राजनीति के मायने क्या हैं ?







दिल्ली की राजनीति बड़ी दिलचस्प है | शीला दीक्षित का राजकाज हो , साहिब सिंह वर्मा हों या अब अरविन्द केजरीवाल , इन सब की राजनीति में केन्द्रीय सत्ता की भूमिका अन्य राज्यों की तुलना में अलग रही है | स्पष्ट कर दूं कि मैं राजनैतिक मसलों की कोई जानकार नहीं हूँ | एक सामान्य नागरिक की तरह जो सामने घटता दिख रहा है उसी आधार पर ये विश्लेषण कर रही हूँ |

कल अरविन्द केजरीवाल का जन्मदिवस था | नरेंद्र मोदी से लेकर छोटे –बड़े भाजपा नेताओं तक ने उनको बधाई दी | राजनीति में मूलतः विरोधी कोई नहीं होता ये बात जग जाहिर है इसलिए इन संदेशों से कोई अर्थ निकालना प्रथम द्रष्टया अनुचित है लेकिन ऐसा जब बीते सालों में ना हुआ हो तो कुछ अटपटा जरूर लगता है | क्या अरविन्द केजरीवाल भाजपा के करीब जा रहे हैं या भाजपा अरविन्द के करीब आ रही है ? दिल्ली की राजनीति में बधाई की राजनीति के मायने क्या हैं ?

कोरोना दौर की दोस्ती के मायने

कोरोना संकट के शुरुआती दौर में हमने देखा है की दिल्ली भाजपा के नेताओं से लेकर गोदी मीडिया तक के स्वर अरविन्द केजरीवाल को कोसने के थे | हमने ये भी देखा कि दिल्ली सरकार ने कोरोना संकट से जूझने के लिए जो प्रयास किये उसका केंद्र ने शुरुआती दौर में जबर्दस्त विरोध किया | जिसमें होम आईसोलेशन का मुद्दा खूब गर्माया पर वही बाद में देश भर में लागू करने पर भाजपा सरकार ने मंशा दिखाई |

लेकिन जब अमित शाह ने दिल्ली के सरकारी अस्पतालों का दौरा किया , उनकी प्रशंसा की , राधा स्वामी सत्संग हॉल को कोविड उपचार केंद्र में बदलने का रास्ता साफ़ किया तब से मीडिया की भी भाषा बदली और भाजपा नेताओं की जुबान पर भी लगाम लगी | क्या ये उतना ही सहज है जितना दिख रहा है ?

अरविन्द केजरीवाल सरकार की मंशा दिल्ली में कोरोना पर काबू पाने की थी ,उसने यह कर दिखाया भले उसके लिए उसे अपने क्रेडिट कार्ड में सेंध लगवानी पडी |

दिल्ली दंगों पर चुप्पी

यही बात दिल्ली के दंगों में दिल्ली सरकार की भूमिका को लेकर उठे प्रश्नों पर भी लागू होती है | दिल्ली जल रही थी तब आरोप लगे की अरविन्द केजरीवाल की सरकार चुप क्यों है ? सब जानते थे कि दिल्ली के चुनाव होने वाले थे और जल्द ही स्पष्ट भी हो गया था कि भाजपा चुनावों में शाहीन बाग़ का इस्तेमाल साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए कर रही थी | 

चुनाव खत्म होने के साथ ही शाहीन बाग़ की खुनस और हार की रार दंगों में कैसे बदली , ये सबने देखा पर फिर भी आज तक लोग जवाब ढूंढ रहे हैं कि “आप “ चुप क्यों रहे ? ये जानते हुए कि जांच कमेटी “आप” के नियन्त्रण से बाहर है , “आप” की दखल की मांग करते रहे ?

अब जब शाहीन बाद में सक्रीय शहजाद अली को भाजपा ने अपने घर में बुला लिया है तो लोगों को समझ आ जाना चाहिए की अरविन्द केजरीवाल चुप क्यों रहा ? सत्ता हर नागरिक आन्दोलन को येनकेन हाईजैक करवा ही लेती है , शाहीन बाग़ का संघर्ष भी अंततः इसी तरह बंधक बना कर सत्ता ने अपने हितों को साधने के लिए काम में लिया |

जानते हुए कि दिल्ली पुलिस ,जिसका नियंत्रण अमित शाह के हाथ में है वही जेएनयू हिंसा के फरार दोषियों को नहीं पकड़ सकी तो भी आप पूछ रहे हैं की अरविन्द केजरीवाल चुप क्यों रहा ?

दंगों और सरकारों को गिराने का इतिहास किस दल का है , सब जानते हैं , सबको मालूम है | सब ये भी जानते हैं कि शहर में आग लगेगी तो आग उनके घर तक भी आयेगी ...... सब जानते बूझते भी अगर लोग भीड़ का हिस्सा बना कर अपनों की ही जमापूंजी को आग के हवाले कर देना चाहते हैं तो कठपुतली पुलिस किस किस को रोकेगी ? क्यों रोकेगी ?

विपक्ष की तैयारी अरविन्द केजरीवाल को दंगों के खेल में फंसा कर चुनावी रण जीतने की थी | केजरीवाल सरकार जानती थी कि न पुलिस उसकी सुनेगी ना विपक्ष के गुंडे उसकी मानेंगे !!


हर राजनैतिक दल ऐसे समर्थकों और कार्यकर्ताओं की फ़ौज बना लेना चाहता है जो उसके कमांडर के हर गलत को सही सिद्द करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद के गुप्तकालीन नियमों का पालन करे | नैतिकता के मारे ये मासूम लोग पोस्टर चिपकाने , नारे लगाने , सोशल मीडिया पर ट्रोलगिरी करने , भीड़ बन जाने को ही जीवन की सार्थकता मान लेते हैं | दिल्ली में आम आदमी पार्टी , कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी तीनों के पास कार्यकर्ताओं की कमी नहीं लेकिन तीनों में अंतर साफ़ दिखाई देता है | ये अंतर उनकी तर्किकता, भाषाई मर्यादा , कार्यशैली , सामाजिक सरोकारों में स्पष्ट रूप से दखा जा सकता है | आम आदमी पार्टी के अधिकाँश कार्यकर्ता / समर्थक सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक पर भाजपा कार्यकर्ताओं/ समर्थकों की गुंडई से जूझते-उलझते दीखते हैं | दुष्प्रचार और प्रोपगेंडा मशीनरी के इस्तेमाल में सबसे अधिक चंदा उगाही करने वाली पार्टी अव्वल नम्बर पर है | बेरोजगार नवयुवक –युवतियों को आसान मेहनताना/भावुक झांसे देकर कुछ भी लिखवाया-बुलवाया जा सकता है |

केन्द्रीय सत्ता के परोकारों ने व्हाट्सएप्प से लेकर फेसबुक तक सब पर कभी अरविन्द केजरीवाल की खांसी तो कभी उनके ऑड इवन के फार्मूले , मोहल्ला क्लीनिकों तक का मजाक उड़ाया | बाकी चुनावों की तरह दिल्ली के आमचुनावों में बड़े दलों ने धन बल से लेकर भुज बल तक का खूब इस्तेमाल किया | अमित शाह की रैलियां और उनके नेताओं के कड़वे बोल किसे याद नहीं होंगे ? किसे ये याद नहीं होगा कि अरविन्द केजरीवाल भी भाजपा और कांग्रेस की जमकर आलोचना किया करते थे |




सब नजारा यकायक कैसे बदल गया ? क्या दुश्मनी यारी में बदल गयी या दोनों खेमों ने विरोधी की ताकत को भांप के राजनीति बदली है ?

मुझे दूसरा वाला विकल्प ज्यादा करीब लगता है | अरविन्द केजरीवाल अब राजनीति में पहले से ज्यादा परिपक्व व्यवहार करने लगे हैं | जनता की नब्ज समझने में उनका कोई सानी नहीं है | मोदी की आलोचना से ज्यादा वक्त वो अपनी विकास योजनाओं को अमल में लाने में लगा रहे हैं | दिल्ली MCD के चुनाव जीतना उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहा है | महामारी के इस दौर में दिल्ली की बीमार MCD अरविन्द केजरीवाल के योग्य सिपहसालारों की निगरानी में आ जाए उससे बेहतर उनके लिए कुछ नहीं हो सकता | दिल्ली सरकार जानती है की उनकी ये विजय जनता तक सीधे पहुंचने और निचले स्तर पर भाजपा के सियासी दखल को कम करने में मदद ही करेगी इसलिए सीधे टकराव को जितना टाला जा सके अच्छा है |

भाजपा जानती है “आप” के पास कांग्रेस का वोट बैंक है , अगर वो ये सिद्ध कर दे कि “आप” भाजपा साथ हैं तो उन वोटों में सेंध लग सकती है | दिल्ली में कांग्रेस वैसे ही नगण्य स्थिति में है , भाजपा के लिए केवल “आप” चुनौती है | “आप” जनता के हित में जितने साधन –संसाधन जुटा सकती है ,जुटाने की जुगत में है भले उसके लिए उनको विरोधियों से फीते कटवाने पड़ें या बधाई की राजनीति से दो चार होना पड़े |

इस सब में भी ‘आप ’ ने लाभ दिल्ली की जनता को ही पहुंचाया है | केजरीवाल की मांग पर अगर एक दिन में 30 हजार ऑक्सीमीटर जनता के लिए उपलब्ध हो जाते हैं तो ये राजनीति सकारात्मक है |

स्कूलों –अस्पतालों और जन सुविधाओं को लेकर अगर कोई सरकार गम्भीर है तो उसकी इस गुरिल्ला राजनीति से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए | अन्य दल अगर इसी राजनीति की आड़ में दिल्ली की सत्ता पर नज़र लगाये हैं तो उनको अपने चश्मे के नम्बर में सुधार की दरकार है |

...............बाकि तो दलों के दलदल में राजा-रंक सब नंगे है , सब चंगे हैं ,सब रंगेपुते हैं, इससे ज्यादा क्या कहें !!

Saturday, 20 June 2020

बालकनियों में उतरती शामों के किस्से हमेशा रूमानी नहीं होते .....


                           

नींद जब नहीं आती तो नहीं आती और जब आती है तो सुबह आती है जब जागना होता है ..... उठने – सोने का वक्त बदलता रहा !! पहले अपने स्कूल की बस निकल जाने का डर जगा देता था फिर बच्चों की स्कूल बस का, उसके बाद आदत बन गयी और चाहने पर भी देर तक सोना नहीं हो पाया |

पिछले तीन महीने में व्यवस्थाएं बदलीं !! बच्चे हॉस्टल से घर आ गये और संजय ने भी घर को दफ्तर बना लिया था ! बदलना केवल मुझे था , मुझे सबको वैसा ही माहौल देना था जैसा उनके कॉलेज –हॉस्टल –ऑफिस में होता है | घर का एक कोना जो नहीं बदला वो थी रसोई .....सारे स्विच बोर्ड चार्जर से लदे रहते , बिस्तरों पर ,सोफे –कुर्सी ,मेज पर लैपटॉप –पावरबैंक ,किताबें .... कपड़े कहीं और सिरहाने पानी की बोतलों का जमावड़ा !! इस बेतरतीबी से झुंझला कर कलह करने से भी कुछ नहीं होना था क्योंकि मोबाइल और कंप्यूटर से गर्दन उठाने का वक्त किसी के पास नहीं था |

नाश्ता क्या बनाऊं ?
बना लो , जो बनाना है !!
पोहे ?
नहीं कुछ और ?
इस और का जवाब ढूँढने का वक्त किसी और के पास नहीं था, वो मेरा धर्म था, मुझे ही निभाना था |
नाश्ते के बर्तन धोना फिर खाने की तैयारी के बीच सीमा के ना आने का मलाल करते करते झाडू –पोंछा....
करती क्या हो सारा दिन ?
ये काम नहीं है क्या  ?
कोई कुछ कहता नहीं, जैसा जचे जब जचे कर लिया करो क्यों परेशान रहती हो ?

संजय की आवाज़ की तल्खी मुझे हर बार ये बात बताने से रोक देती कि परेशानी काम से नहीं है, उस वक्त से थी जिसमें मैं कहीं हूँ ही नहीं ! पत्नी और मां होने के अलावा मेरा कोई वजूद है क्या ? कुछ देर मोबाइल हाथ में ले लो तो संजय की गर्दन ऐसे घूमती है , जैसे मैं कोई गुनाह कर रही हूँ !

क्या देखती रहती हो इसमें ?
व्हाट्सएप्प है , कानपुर वाली बुआ के पोता हुआ है !!
हुआ होगा , हमें क्या ? ये ग्रुप छोड़ दो, बेकार गॉसिप और पोलिटिकल बातें हैं, दिमाग खराब करती हैं |
मैं सिर्फ देखती हूँ , कहती कुछ नहीं !
बेकार टाइम खराब करना है |
तो क्या करूँ ?
पढ़ा करो !
क्या ?
जो पढ़ना चाहो !!

याद आया पढ़ने के लिये पिछले मेले से कुछ किताबें लाई थी | एक रोज उठाईं, कुछ पन्ने पलटे कि संजय कहने लगे कि ये बेकार ऑथर है , सनसनी के लिए लिखता है |

किताब उस दिन से शेल्फ से बाहर नहीं निकली |

तुम घूम आया करो , वजन बढ़ जाएगा !!
ठीक है , शाम को जाउंगी !
शाम को तो बच्चों के स्नैक्स का टाइम होता है ,कैसे जाओगी ?
तो सुबह चली जाउंगी !!
देख लेना ऐसे जाना कि 7 बजे तक लौट आओ, मुझे 8 बजे रिपोर्ट करनी होती है !!
उसके बाद वो सुबह भी आज तक नहीं आयी |

ना घूमने जाना हुआ ,ना पढना ,ना सोना ,ना जागना ......
इस सब का अभ्यास हो गया है मुझे , अब यही जिन्दगी है | मैं नहीं समझ पाती कि 14 दिन के क्वारेंनटीन से या होम आईसोलेशन से लोग डरते क्यों हैं ? ये होम आईसोलेशन तो मैं 28 बरस से जी रही हूँ !!!! चुप्पी का एक मास्क ओढ़े रिश्तों को बचाते, जी रही हूँ |
क्या पहनना है ,क्या बनना है ,क्या लाना है, किससे रिश्ते रखने हैं और किसके साथ कितनी दूरी रखने है सब गाईडलाइन जी ली हैं मैंने |

बच्चों को क्या खुद में शामिल करूं , मैं अब मेरे साथ नहीं रहती !!
तो, ऐसे कब तक चलेगा ?
चलेगा, सबका चल ही रहा है | बच्चों की अपनी दुनिया है, अपनी परेशानियाँ हैं..... उनको और क्या परेशान करना !! सबको अपने हिस्से की चक्की चलानी हैं– अपना पेट भरना है| भाड़ है दुनिया – फूंक मारते जाओ !!

आभा कहती जा रही थी ...... धाराप्रवाह , सांस की फ़िक्र किये बिना !!
फेसबुक पर तुम्हारी तस्वीरें देखकर मुझे लगता था कि तुम अपने परिवार में खुश हो ?
हाँ ,खुश हूँ मना कब किया ?
फिर खुद में नहीं होना क्या है ?
कुछ नहीं बस ज़िंदा रहना है , साँसों के खेल को मेले में बदलना भर है | इसका ख़ुशी या नाखुशी से कोई वास्ता नहीं है !! जो ख़ुशी है तो बस इतनी कि अब दर्द नहीं होता ना किसी से झगड़ने का मन करता है | संजय की कर्कशता और मेरे प्रति उनका दोयम प्रेम मुझमें अब ऊब और गुस्सा भी नहीं भरता !! वो जब  कभी कहता भी है कि तुमको लोगों से तौर तरीके सीखने चाहियें तो लगता है कि इतना दोगला होने से बेहतर है चुप रह जाना , अकेले रह जाना |

आभा कहते कहते चुप हो गयी ....पीछे से आवाज़ आ रही थी “किससे इतनी देर तक बातें कर रही हो ? समय देखो, ये फोन करने का वक्त है क्या ?

आभा ने रिसीवर रख दिया , उसका फोन आना कम हो गया है ! उसका होम आईसोलेशन अंतहीन है , उसके लिए इस जिन्दगी से जूझने के सिवा कोई विकल्प नहीं !! उसके प्रश्नों का मेरे पास समाधान नहीं और मेरे समाधानों को वो अपने सवालों में फिट कर पाए उसके पास उतनी स्पेस नहीं |

ये हर बंद दरवाजे के पीछे की कहानी है .... समन्दर की स्याही से रेत पर लिखी कहानी !! फेसबुकिया तस्वीरों से किसी की तकलीफ , भीतर चल रहे संघर्ष और इन्कलाब की करवटों को जान लेना आसान नहीं | प्रेम का परिंदा उड़ान चाहता है पर हमने उसे दुनियादारी की और कभी अपने कम्फर्ट जोन की सलाखों के पीछे धकेला है |


बंद दरवाजों और बालकनियों में उतरती शामों के किस्से हमेशा रूमानी नहीं होते ...... इनके किरदार अपने वजूद की लड़ाई - लड़ते , समझौते करते करते लम्बी नींद सो जाते हैं !! इनके ख्व़ाब बहुत खूबसूरत होते हैं , मौका मिले कभी आपको तो इनके सोने से पहले उनको जगा के पूछियेगा, खुद से और दुनिया से आपकी भी शिकायतें कम हो जायेंगी  !!!!

Sunday, 28 April 2019

लेकिन फिर मन कहता है नोटा नहीं , उम्मीद को चुनना !!

दम घोटू चुनाव प्रचार और  उथले - कुंठित नवोदित नेताओं की सुनामी ने लोकतंत्र के इस महापर्व को कचरे का ढेर बना डाला है |

मन नहीं करता कि घर से बाहर जाकर झाँका भी जाए कि कौन वोट मांगने आया है,कौन जाने वो किस बहाने से आपके सुख  की रेकी कर के चला जाए | बहसों से बच के निकल जाती हूँ , आएगा तो मोदी ही - या पप्पू की मम्मी या फिर केजरीवाल ......... कान में सब कुछ पड़ता है पर मन जाने क्यों सब से निर्लिप्त है | 

ये अजीब उत्साहहीनता का दौर है ,  वैसा ही जैसा हमेशा से रहता था | 

छोटे थे तो हर दल की रैली के झंडे - बिल्ले लगा कर घूम लेते थे | पापा कट्टर कांग्रेसी थे सो पंजे पर जोर रहता था लेकिन जयपुर ग्रामीण से बीजेपी सांसद गिरधारी लाल भार्गव जो सात बार जीते थे , उजला अरोड़ा जो विधायक थीं पारिवारिक सदस्य ही थे ,के साथ कमल भी कहीं साथ चलता था |  वो दौर अटल बिहारी वाजपेयी ,वीपी सिंह और इंदिरा -राजीव का था |  सबका साथ रहता था , जनसंघियों का भी खूब आनाजाना था | 

राजीव गांधी को सुना था मैंने ,इंदिरा को भी....... अरविन्द केजरीवाल के शपथ ग्रहण में रामलीला मैदान की भीड़ का हिस्सा भी थी !!

सब देख सुन लिया और जी लिया ....... उम्मीदों को बनते बिगड़ते ,जोश को उठते -बिखरते -ठहरते देख लिया | सत्ता कैसे सपनों को छलती है और उम्मीदों को कैसे वोट में बदलती है ,सब देख लिया | 

आप चुनते किसी और को हैं वो निकलता कुछ और है , आप चलते उसके साथ हैं पर वो मंजिल बदल लेता है !! अब आधे रास्ते से लौट जाने या वहां रुक कर उसके लौटने ,पीछे मुड़ कर देखने की उम्मीदें भी जाती रहती हैं | कारवाँ बढ़ता रहता है , तारीखें बदलती रहती हैं और सरकारें भी | 

नहीं बदलता है कुछ तो वो है हमारी नियति !! 

तमाम तरह के हथकंडे अपना कर मोदी भले सरकार बना लें लेकिन ये बात वो भी जानते हैं कि देश को उन्होंने धर्म -जाति -समाज -देशद्रोही -देशभक्त में बाँट दिया है | इतना बैर -इतनी कटुता .......आप देश को बाँट कर उस पर राज कर सकते हैं लेकिन उसके दिल में जगह नहीं बना सकते | कांग्रेस की नीतिगत विफलताओं और भीतरघात ने देश को कमजोर विपक्ष  दे दिया जिसका परिणाम अब मोदी के रूप में सबको भोगना  पड़ रहा है | 

किसी भाषण में ,किसी परिचर्चा में वो देश के मुखिया नहीं लगे | बीजेपी के प्रवक्ता से ज्यादा इस व्यक्ति की कोई हैसियत नहीं है | फर्जी आंकड़े और फर्जी दावों के बूते पर अगर मोदी ही आएगा तो आ जाए !! कम से कम मेरी पीढ़ी इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराई जा सकेगी | 

देश जिम्मेदार है ,लोग जिम्मेदार हैं अपने गलत निर्णय के लिए !! हम काम नहीं देख रहे ,काम के नाम पर हो रहे प्रचार से भर्मित किये जा रहे हैं कि लगे कि अथाह काम हो रहा है | 

अब ऐसे में क्या देखना है ,क्या सुनना है ,किसे चुनना है सब कुछ नोटा हो गया है | 

लेकिन फिर मन कहता है नोटा नहीं ,  उम्मीद को चुनना !! 

कल वोटिंग है ,मैं वोट दूंगी आप भी वोट जरूर देना  भले मन हो या ना हो !! चुप रहे या बैठे रहे तो हम भी कहीं गुनहगार ही ठहराए जाएंगे | 

जय लोकतंत्र -जय जनतंत्र !!!


Sunday, 24 February 2019

ये माटी ,पहाड़ ,नदियां ,जंगल ,खेत....... एक यायावर है मुझमें जो कभी टिकने नहीं देता !


वक़्त कहाँ रुकता है किसी के लिए और अगर रुक भी जाये तो कौन ठहरता है उस वक़्त के लिए ?
कभी वक़्त को हमारे लिए फुरसत नहीं और कभी हमें वक़्त का इंतज़ार करना नहीं आता....... हम सब ठेले जाते हैं ,कभी इसके मन से तो कभी उसके मन से !!

एक रोज़ जंगल की पगडंडी पर पत्तों की चरमर सुनते हुए मैंने जाना कि खुद के लिए वक़्त निकालना कितना जरूरी है | पहाड़ों से उड़ कर आते बादल और सीली हुई हवा ने कान में कहा कि अब आयी हो तो लौटना मत...... मैं अब उसी की सुनती हूँ | जब तक उसकी नहीं सुनी थी , उलझन में थी कि किसकी सुनूं ?

ये माटी ,पहाड़ ,नदियां ,जंगल ,खेत....... एक यायावर है मुझमें जो कभी टिकने नहीं देता ! वक़्त ने जीना सिखा दिया ,चलते रहना सिखा दिया , इंतज़ार करना सीखा दिया |

घुम्मकड़ी को जिंदगी का हिस्सा बना लीजिये , समझ जाएंगे कि जीने लिए दुनिया भर के तामझाम नहीं चाहिए | मौत भी आने से पहले आपके इंतज़ामात का जायजा लेने नहीं आएगी | कितना भी आराम जुटा लें , रिश्तों का कितना भी जमावड़ा हो आसपास...... आपको सुकून तो पल दो पल आँख बंद करके अकेले हो जाने में ही मिलेगा |

जब आनंद भीतर है तो बाहर किसे ढूंढना और किसके लिए महल -असबाब इकट्ठे करने हैं ?

भीतर के बच्चे को ज़िंदा रखिये और उसके बचपन को महसूस कीजिए | वक़्त को कैलेंडर का और कैलेंडर को जिंदगीनामा बना लेंगे तो जियेंगे कब ? लोग शिकाययत करते हैं ,उसके लिए इतना किया पर उसने ऐसा किया -वैसा किया...... ये सच है ,हम नाशुक्रे लोग हैं ! जिसने किया, वो उसका फर्ज था सोच कर आगे बढ़ जाते हैं ,ये सोच कर कि ना भी करता तो कौन सा उसको कहा था करने के लिए...... व्यथा की कथा यहीं से शुरू हो जाती है |

क्यों किया ?

इसीलिये कहती हूँ , कीजिये पर खुद को बचा ले जाईये इस कपोल कल्पित बोझ से | सब के कर्मों का भार अपने कंधों पर कैसे रखा जा सकता है |

वक़्त पर भरोसा करना और वक़्त से शिकायतें करना जरूरी नहीं है और लाज़मी भी नहीं ! अवसाद और खुशी का हर मौका पेड़ -पहाड़ -नदी -हवा...... के साथ साझा कीजिये और वक़्त की धुन को गुनगुनाइए ,यही जीवन संगीत है ,यही वक़्त है जीने का.......

जीते रहिये -चलते रहिये !!

Sunday, 20 January 2019

मैं चाँद पर हूँ , हूँ तो हूँ !! कम से कम सुबह होने तक तो हूँ ना .......

एक रोज़ आसमां पर टहलते हुए चाँद के करीब पहुँच गयी........ गुजरते हुए आंचल में सितारे अटक गये थे ,अटके रहने दिए !! कुछ उठा के जूड़े में भी अटका लिए...... !! चाँद मुझे देखते ही खिल गया , कहा आओ..... कब से इंतज़ार था तुम्हारा !!

मैं हंस पड़ी ,ये सोच कर कि ये भी निरा झूठा है ,मेरा इंतज़ार इसे क्यों था भला ? सारी दुनिया इसकी तरफ देख के आहें भर रही है , जाने कितने ख्वाब ,जाने कितनी ख्वाहिशें इसके इर्द गिर्द घूमती हैं........मेरा इंतज़ार ?

उसको अनसुना कर दिया मैंने ! मैं बस उसको छूना चाहती थी ,ये देखना चाहती थी कि वो वास्तव में उन कल्पनाओं के जैसा है भी या नहीं जिसके लिए दुनिया छोड़ने की जिद की ??

अजीब होती हैं ना ख्वाहिशें भी ! रात सितारे हथेली पर धर जाती है और दिन माथे पर सूरज रखकर चला जाता है | हम कहाँ होते हैं इन सब के बीच ? कोई भी कहाँ है ? सबके पास अपनी अपनी दुनिया है , कहने भर को सब इसी दुनिया में हैं !!

हर कोई अपने आप में एक टापू है , उस तक पहुंच भी जाओ तो सब से कट जाना होता है और वहां से निकलो तो उसको छोड़ देना होता है | कोई विकल्प नहीं कि सब संग हो , सब साथ हों....... बस एक ही सुकून है , ख्वाब !!

मैं चाँद पर हूँ , तो हूँ !! कम से कम सुबह होने तक तो हूँ ना .......उससे हजार सवाल करूंगी , उसकी नजर से दुनिया भी देखूंगी !

मैंने कहा , मुझे ले चलो अपने साथ .......वहां बादलों से पार !! दुनिया देखनी है मुझे ?

वहीं से तो आयी हो ? वो हैरान था !

हाँ , पर वहां से कुछ समझ नहीं आयी , अजीब था सब !! भीड़ लगती थी पर सब अकेले ही मिले ......!

तो , तुमको क्या लगता है यहाँ से सब एक साथ दिखेंगे ?

हाँ ,दिखेंगे ! दूर से सब के करीब होना धोखा होता है ना !! फिर तुम भी तो उनके लिए वैसे ही मरीचिका हो.. तुम्हारी कसमें खाते हैं , तुमको देख कर कितने व्रत उपवास होते हैं , किसी के बचपन का सहारा और किसी की जवानी का .......पर तुम भी तो कहाँ हो ?

हूँ तो !! देखो छू कर देखो मुझे ....... मुझमें भी धडकन है , मुझमें भी बचपन है और जीवन का हर रंग है !! चलो ले चलता हूँ तुमको वहां जहाँ से तुम अपनी इच्छा पूरी कर सको !!

हम बादलों के पार चल पड़े ! चांदनी की दरिया पार कर कोई जगह थी , उसने कहा मेरी बाहं कस कर थामना और फिर नीचे देखना !!

मैं हैरान थी ,हथेलियाँ उसकी बाहं को और कस रही थीं ......मेरी दुनिया तो बिलकुल अलग है , एक दम बूँद बराबर , लोग भी कहीं नहीं , बस रोशनी ही रोशनी तो कहीं समन्दर कहीं पहाड़.......!! ये वैसी नहीं है, जैसी मैं सोचती थी !!

तुम डर रही हो ? चाँद ने पूछा !!

हां !! ये कैसे हो गया ? जो उम्र भर जिया वो झूठ कैसे और ये सच कैसा है ?

वो हंस दिया , कहने लगा "सुनो , मैं भी तो मिट्टी हूँ ! ना चांदनी मेरी है ना मर्जी से मेरी सूरत तुमको दिखा पाता हूँ...... असमान में टंगा हूँ ,ना जमीन मेरी है न आसमान मेरा है पर मुझे तुमसे प्यार है........इसलिए कि तुम मेरी दुनिया हो और मुझसे मिलने यहाँ तक चली आईं........अब जाओ ,लौट जाओ ! देखती रहना मुझे ,हर रात तुमको नई नज्म सुनाऊंगा ,तुम्हारे लिए कुछ कहानियां और गीत भी लाऊंगा......

और सुनो , दुनिया वही है जिसमें तुम खुश रह सको और खुशी का कारवां भीतर से बहता है !! उसे महसूस करना और खुश रहना...... मुस्कुराना कि चाँद भी तुम्हारा है और दुनिया भी !!

नींद तब तक खुल गयी थी ,सूरज माथे पर चढ़ आया था पर एक चाँद भी कहीं दूर क्षितिज पर था , जो देख कर मुस्कुरा रहा था कि मैं सलामत से अपनी दुनिया में लौट आयी हूँ उसके प्यार को हजार सितारों के साथ जीत के आयी हूँ ...........

Thursday, 20 December 2018

......लेकिन रंगों के खेल में खुद बेरंग मत हो जाना ..... इतना कि तुम खुद को भी पहचान ना सको !!



ये निष्ठाएं भी अजब का पागलपन हैं !! डिस्क्लेमर जैसा कुछ सबके दरवाजे पर टंगा है....... फैशन के इस दौर में गारंटी की उम्मीद ना रखें !

हम फिर भी कितना कुछ चाहने लगते हैं और मानने लगते हैं जैसे हर चाहा और माना हुआ हो ही जाना हो ,जैसे वो आपका अधिकार हो  | 

अपनी मूर्खताओं और अपनी समझ पर वक्त कितनी आसानी से पानी फेर जाता है | रिश्ते कितने भी अजीज हों ,कितने भी जतन से सम्भाले गये हों , एक रोज " मोनोटोनस" हो ही जाते हैं | 

नयापन बाज़ार में बिकता हो तो बताओ ,खरीद लायें ? एक के साथ एक फ्री इन्द्रधनुष खरीद लें , जब तुम इस रंग से बोर हो जाओ तो तुम्हें दूसरा रंग थमा दूं ?

नये लोग जीवन में नई सम्भावनाएं जगाते हैं और पुराने धीरे धीरे दरवाजे की ओर धकेले जाते हैं | एक सहज प्रक्रिया की तरह इसकी व्याख्या और इसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण सुनकर लगता है जैसे आप किसी बाज़ार में खड़े हैं और सामने वाला आपको मार्केटिंग की टिप्स दे रहा है | 

ये सब देखते देखते और जीते जीते एक रोज़ मन जाने कहाँ उठ के चल देता है !! 

रिश्तों के बाज़ार में भ्रम के सौदे हैं | सौदा पट जाना चाहिए फिर बाकि सब गौण हो जाता है | रिश्तों पर एक चादर निष्ठाओं की भी होती है , ढकी रहती है तो अपने लगते हैं | भीतर सब खोखले हैं और एक लम्हे में तार -तार हो जाने हैं | 

कोई भी आवाज़ उस सफर की कहानी बयाँ नहीं कर सकती जो किसी त्रासदी से उपजी हो , वैसे ही जैसे वो चुप्पी जो किसी संवाद में "और " पर आकर अटक गयी हो | 

समन्दर किनारे की रेत है मन !! कितनी ही लहरें आयें -जाएँ ये रीता का रीता रह जाता है !! खारे -नमक को पीता, रेत हो जाने की नियति को स्वीकार कर चुका हो जैसे  | 

किसी "इंटरेस्टिंग" सी स्टोरी का प्लाट सजाते -सजाते मन कितनी ऊब से भर गया है | अब तुम जाओ और इन्द्रधनुष उतार के लाओ ताकि किसी के जूडे में उसे सजा सको ,उसके संग दिल बहला सको | 

मैं यहीं हूँ ! देखूंगी अपने आसमान पर नये रंगों को सजते, तुमको मुस्कुराते और इठलाते !! 

जाओ - तितलियाँ और फूल सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं ....... !!

किसी बाग़ या माली से निष्ठा मत रखना , बाग़ उजाड़ हो जाते हैं , माली मर जाते हैं लेकिन फूल और तितलियाँ कहीं नहीं जातीं ....... हर बार नई मिलेंगी ,नये रंगों और नयी गंध के साथ !

लेकिन रंगों के खेल में खुद बेरंग मत हो जाना ..... इतना कि तुम खुद को भी पहचान ना सको !!


Monday, 24 September 2018

हम सिर्फ साँसों के नुमाइंदे हैं , क़ानून की किताब नहीं !

कई सवाल और उनके कई जवाबों के बीच में फंसी कलम हैरां है कि कौनसा सवाल पहले लिया जाये और कौनसा जवाब उस सवाल का सही जवाब हो सकता है |

अरे !! ऐसा नहीं होता !! एक सवाल का जवाब एक ही हो सकता है |
क्यों ? जब सवाल किसी एक जवाब का परिणाम नहीं है तो जवाब भी कई होंगें ही ना !!!
नहीं , अगर तुमने ऐसा किया तो इसका अर्थ है तुम जवाब को गढ़ रही हो | जानती हो सच को गढ़ नहीं सकते |
यानि सवाल गढ़ सकते हैं लेकिन जवाब नहीं गढ़ सकते ?
सवाल कौन गढ़ता है ? वो तो उपजते हैं |
और जवाब ? जवाब भी तो उपजते हैं , अलग अलग किस्म के ,मौसम के हिसाब से !!
ये कुतर्क है |
तो तार्किक सवाल होते हैं और जवाब सब कुतर्क ?
नहीं ऐसा नहीं है | बात ये है कि मैं अगर कुछ सवाल कर रहा हूँ तो कुछ जानते हुए ही कर रहा हूँ ना और अगर जानते हुए कोई सवाल किया है तो उसे गढ़ना नहीं कहेंगे |
यानि तुम जवाब जानते हो फिर भी सवाल कर रहे हो ?

हाँ , ऐसा ही समझ लो |
ऐसा क्यों ? जब जानते हो तो जो जानते हो उसे ही मेरा जवाब मान लो और बात खत्म करो |

नहीं ये तो मेरी और से जबरदस्ती हो जाएगी | मैं तुम पर जवाब थोपना नहीं चाहता , बस जानना चाहता हूं !!
पर तुम जानते हुए भी क्या जानना चाहते हो ?
यही कि क्या मैं सही जानता हूँ ?
नहीं तुम कुछ नहीं जानते और जो जानते हो वो सही नहीं है |
देखो अब तुम जवाब को घुमा रही हो !!
अच्छा तो सीधा जवाब ये है कि तुम्हारा सवाल मेरे से जवाब लेने का अधिकारी नहीं है |

क्यों ? ये मेरा अधिकार है कि तुमसे सवाल करूँ ?
हो सकता है तुम्हारा अधिकार हो पर मेरा अधिकार है कि चाहूँ तो जवाब दूँ और ना चाहूं तो ना दूँ |
ये अनैतिक है , सीमा का उल्लंघन है |
तो जो नैतिकता तुम्हें सवाल करने का हक दे रही है वो मेरे जवाब नहीं देने को अनैतिक घोषित कर रही है ?

बहस से कोई फायदा नहीं !! साफ़ है कि तुम्हारे पास जवाब इसलिए नहीं है कि तुम दोषी हो
मेरा दोष ?

दोष यही है कि तुम सवालों से मुक्त होकर भाग जाना चाहती थीं लेकिन ऐसा कर नहीं सकीं !!

यानि तुम विजेता हो ? सवालों के घेरे में मुझे कैद करके रखना चाहते हो ?

दुनिया बड़ी खराब है , बाहर निकलना भी मत !!

सच कहा तुमने , दुनिया वाकई खराब है ! यहाँ तुम हो , सवाल हैं और जवाबों का ऐसा सन्नाटा है जिसे हजार चीख भी नहीं तोड़ सकती !!

लेकिन सुनो !!

कहो ?

मेरे पास एक विकल्प है |

वो क्या  है ?

अब मैं तुमको कोई जवाब नहीं दूंगी ,तुम्हारे किसी सवाल का कोई जवाब नहीं दूंगी !! अब मैं तुमको सवालों का पर्चा दूंगी और हर पर्चे में उतने ही सवाल होंगे जितने तुम्हारे जवाब जानने के अधिकार हैं |

मैं जवाब नहीं दूंगा !!

मत देना लेकिन अब से यही जवाब मेरा भी मान लेना और सवालों के नकाब ओढ़ जवाब की जिद मत करना ! सच ये है कि ना तुम जवाब जानते हो ना मैं , ना तुम सवाल कर सकते हो ना मैं | हम सिर्फ साँसों के नुमाइंदे हैं , क़ानून की किताब नहीं !

पल पल को जी लो , लहर लहर भीग लो....... और कहानी कुछ आगे है भी नहीं और थी भी नहीं  !!









Tuesday, 13 February 2018

मुन्ना ,बेबी ,जानू ,जाना सबका मालिक वैलेंटाईन है इसीलिए ......... !!!

फरवरी का महीना है ,प्रेम की बासंती हवा चल रही है।  कुछ ठिठुर रहे हैं , कुछ सिहर रहे हैं और कुछ रजाई को कसे जा रहे हैं ,कहीं उनको छूत न लग जाए |

 हम सब विरोधाभासों में जीते हैं ! सबको प्रेम चाहिए , सब प्रेम में हैं लेकिन प्रेम पर सबकी की भौहें तन जाती हैं | अगर प्यार सिर्फ जीवन जीने का तरीका होता तो ये दिक्कत नहीं होती ,दिक्कत इसलिए है क्यूंकि ये आपको नफरत सिखा रहा है , छलने और ठगने के तरीके सिखा रहा है | अब आप प्रेम के व्यापारीकरण के दौर में हैं इसलिए आपको किसी से अपना प्रेम साझा करने के लिए एक हफ्ते की निर्धारित प्रक्रियाओं को पूरा करना है | 

चुराई हुई शायरी , उधार के गिफ्ट और जतन से की गयी लीपापोती के बाद जब आप प्रेमी आमने-सामने होते हैं तो किसी रंगमंच के कलाकार अधिक होते हैं ,प्रेमी नहीं ! स्क्रिप्ट लिख के भी कोई प्रेम कर सकता है क्या ? करते हैं , बहुत हैं जो बतायेंगे कि आपसे बेहतर इंसान उसके जीवन में कभी नहीं आया ..... सच ये होता है कि कहने वाले को ना पहला याद है ना आप अंतिम हो | 

डिजिटल दौर के प्रेम में जब तक दिल वाली इमोजी और टैडी के साथ किस्सियों का आदान प्रदान ना हो तो लानतों का दौर चालू हो जाता है | मुन्ना ,बेबी ,जानू ,जाना सबका मालिक वैलेंटाईन है इसीलिए इस दिन को हमारा संस्कारी देश कूड़ा नजर से दखता है | बाबा वैलेंटाईन ने भगवा कपड़े पहन लिए होते तो देश की 80% समस्या का समाधान हो जाता | 

दिल्ली के अंकित को प्रेम की दर्दनाक सजा मिली , ये सजा उसको मिलनी ही थी ..... जन्म लिया था उसने इस दानव समाज में ! एक मां के सामने उसके बेटे को कोई ऐसी सजा दी है कि मन डरता है कि उस मां की कोख से निकली बद्दुआ पूरे समाज को ही कहीं नामर्द ना बना दे ! प्रेम करने वाले से नफरत कैसे कर सकते हो तुम भाई लोग ?

जब आप प्रेम में होते हो दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह पर , सबसे जादुई पलों को जी रहे होते हो ! हर मुश्किल से पार कर पाने का ,उसका सामना करने की हिम्मत जुटा पाते हो , हर किसी को खुशगवार नजरों से देखते हुए दुनिया बनाने वाले का शुक्रिया अदा करते हो ! 
क्या हम हमेशा ऐसे ही नहीं रह सकते ? क्यूँ हम इतने विध्वंसक हो जाते हैं ,क्यूँ प्रतिशोध हमारे प्रेम पर भारी पड़ जाता है ? 

क्या आप अपनी मर्जी से किसी जात विशेष में पैदा हुए हैं ? क्या प्रेम जाति देख कर किया जा सकता है ? जाति देखकर केवल सत्ता के चक्रव्यूह रचे जा सकते हैं ! लग्न कुंडली तक में राहू केतु वही होंगे जो आपके या किसी और के हैं !! आप आज मुस्लिम हैं कल हिन्दू कोख मिल गयी तो क्या कीजिएगा , आज हिन्दू हैं कल ईसाई हो गये तो ?

ये प्रेम का मौसम है , छोटा सा जीवन है ! जिसके साथ खुश हैं और ईमानदार हैं ,उसी को जीवनसाथी बना लीजिये ! सम्मान कीजिये प्यार का ताकि कभी ये ना कहना पड़े कि मेरे नसीब में सिर्फ धोखा है , नफरत है और असफलताएं हैं ! प्यार करने वालों को प्यार से देखिये , प्यार का व्यापार करने वालों पर सख्त नजर भी रखिये !

प्यार को सलाम और आप सबको ढेर सारा प्यार !  बाबा वैलेंटाईन आप सबके जीवन को प्यार -मोहब्बत से तर रखें ! चलते हैं ,अपना ख्याल रखियेगा मौसम बदल रहा है !!

Saturday, 25 November 2017

........तो AAP पांच साल की हो गयी ! बधाई !

........तो AAP पांच साल की हो गयी ! एक ऐसा बच्चा जिसका जन्म ही लाठियों ,डंडों ,तिहाड़ के साये में , ठंड में ठिठुरती रातों में सड़क किनारे पड़े जनमानस के बीच हुआ ! उस बच्चे को सरकते ,चलते और फिर दौड़ते देखना कितना सुखद है ये वो हर व्यक्ति समझ सकता है जिसके मन में माँ -पापा , दादा दादी का साथ बसा हो ! आंदोलन से राजनैतिक दल का रूप लेते हुए सब का मन आशंकित था कि क्या सत्ता के बाहुबली इस बच्चे को जीने भी देंगे ! असमय मरते हुए कई आन्दोलनों ,कई दलों ,कई क्रांतिकारी विचारधाराओं को देखा है | AAP अपवाद के रूप में उभरी और तमाम विषमताओं , षड्यंत्रों ,कुचक्रों से झूझते हुए एक मजबूत राजनैतिक दल के रूप में उभरी है |
अरविन्द के नेतृत्व ने इसे दिशा दी है तो मनीष ने इसको अंजाम तक ले जाने की भूमिका बखूबी निभाई है | कुमार विश्वास ,संजय ,आशुतोष ,दिलीप पांडे ,प्रीती मेनन ,गोपाल राय , प्रशांत भूषण और भी ना जाने कितने ही लोगों ने इस बच्चे को चलना सिखाया ,इसके कदमों को मजबूती दी |
हजारों कार्यकर्ता जिनके पास सम्भवतः पार्टी की प्राथमिक सदस्यता भी नहीं है को मैंने  इस दल के साथ ऐसे जुड़े देखा है मानो वो इनका अपना परिवार हो !
कितनों ने अपना करियर छोड़ा ,घरबार छोड़ा , अपना शहर तक छोड़ दिया और सिर्फ जिद और जुनून में AAP के हमराह हो गए ! कभी कभी लोग पूछते हैं ,ऐसा क्या है इस अरविन्द केजरीवाल में जो लोग इसकी तुलना मोदी से करते हैं और तमाम मीडिया को भी सिर्फ दिल्ली ही दिखाई देती है ?

मेरा जवाब होता है , फकीर है वो ! जिसके पास कुछ नहीं होता उसके पास रब होता है | रब साथ ना होता तो आज और की तरह AAP को भी राजनीति निगल जाती | ईमानदार इरादे और  नेक राह  थाम कर चलने वाले ही जो कहते हैं कर दिखाते हैं |

हजार कमियों और असफलताओं के बावजूद AAP ने शिक्षा और स्वास्थ्य में जो काम किये हैं वो विपक्ष भी नजरंदाज नहीं कर सकता | बेशक परिवार के भीतर मतभेद हैं लेकिन अगर वो मतभेद भी उसे सकारात्मक दिशा दे रहे हैं तो उनका भी स्वागत करना चाहिए |

14 फरवरी को जब अरविन्द शपथ ले रहे थे ,मेरे साथ कोमल और पूजा थीं ! हम सब आंसुओं से तर थे ,हमारे पीछे लाखों की भीड़ थी जिनकी आँखों में हजार सपने और AAP के लिए दुलार था !

अंकिता ,केशव , आरती......सबसे पहली बार मिली थी लेकिन ऐसा लग रहा था मानो परिवार इकट्ठा हुआ है ! अंकित ,डॉन ,गजेंद्र ,दुर्गेश , राशु , शाश्वत ,राकेश ,नवेन्दु ,पवन,प्रियंका , ......पटेल नगर की ढेर सारी स्मृतियां मानस पर अंकित हैं | ढेर सारी तस्वीरें हैं जो इस सफर की साथ की याद दिलाती रहती हैं ! झाड़ू के साथ इस अनोखी यात्रा में शामिल होना मेरे जीवन के बेहतरीन समय में से एक है |

AAP ने जनता के भरोसे को तोडना नहीं है , उसे देश के हर बंदे को भरोसा दिलाना है कि झाड़ू हाथ में है तो क्या गम है !
बढ़ते चलिए , काम करते चलिए ! गलतियों से सबक ले ,सबको साथ ले कर चले तो जय निश्चित है !

शुभकामनाएं AAP सभी को !

Monday, 2 October 2017

क्या सुशांत सिन्हा मोदी जी के हरकारे हैं या रवीश के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं ?



मेरे सामने दो ख़त हैं - एक रवीश का जो उन्होंने अपने प्रधानमंत्री को एक नागरिक की हैसियत से लिखा था और दूसरा सुशांत सिन्हा का जिन्होंने रवीश के प्रधानमंत्री को लिखे पत्र का जवाब दिया है |

क्या आप किसी के किसी को लिखे पत्र का जवाब दे सकते हैं ? मैं सवाल आपसे करूँ और जवाब देने कोई तीसरा आये तो उसे क्या मानूं ? ये भी सही है कि भारत के प्रधानमंत्री के पास इतना टाइम नहीं कि वो रवीश जैसे मामूली पत्रकार के मामूली से पत्र के जवाब के लिए समय निकाले ! ये मसला पत्र लिखने वाले और पत्र पाने के वाले के बीच का था !

खैर ! अगर आपने पत्र नहीं पढ़ा हो तो एक दो मसले बता देती हूँ |

रवीश ने लिखा कि उनको धर्म रक्षति रक्षित: नाम के उस व्हाट्स ग्रुप में जबरदस्ती जोड़ा जा रहा है जिसके कई एडमिन हैं और उनमें से कइयों को प्रधानमंत्री जी सहित कई अन्य माननीय फॉलो करते हैं |
इस ग्रुप द्वारा उनको मारने , खींचने , अश्लील हरकतें करने तक की अभद्र टिप्पणियां की हैं ! एक अन्य महिला पत्रकार को भी परेशान किया जा रहा है | रवीश ने इस वार्तालाप के कई स्क्रीन शॉट भी दिए हैं और उनके नाम भी बताये हैं !

इसी में वे आगे लिखते हैं कि उनको धमकी दी जा रही है कि वे नौकरी से निकाले जाएंगे ! इस पूरे पत्र में रवीश ने अन्य किसी मुद्दे का जिक्र तक नहीं किया है |

दूसरा खत जो मुझे नहीं पता कि सुशांत बाबू ने किस हैसियत से लिखा है , में लिखा है की --

पहला - आपने अपने स्वर्गीय पिता से अपने आत्मिक रिश्ते को सार्वजनिक करने की धृष्टता की !

दूसरा -आप बेवजह डर रहे हैं यानि जो धमकियां मिल रही हैं उनको रवीश को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए ! वे ऐसा कर रहे हैं तो इसलिए कि आप प्रसिद्धि चाहते हैं ! वे खुद को अहमियत ना दें उनके रहने या जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा !

तीसरा - नौकरी जाए तो जाए आपकी बीबी खूब कमाती हैं और अब तक जितना कमाया उससे आप सड़क पर नहीं आएंगे !

आपने फलां को देखकर शीशा बंद कर लिया , मेरे लिये मैनेजिंग एडिटर को चिट्ठी क्यों नहीं लिखी !

पत्र के आखिर में तथाकथित पत्रकार सुशांत जी बीमार रवीश के स्वस्थ्य होने की कामना कर रहे हैं !

मैं हैरान हूँ और विचलित भी और विश्वास से कह रही हूँ पत्र का जवाब देने वाला या उसका कोई अपना उसी धर्म रक्षति रक्षित: का सदस्य होगा जो रवीश , बरखा , राजदीप को मारो - खींचो -पटको के साथ सम्पूर्ण परम् अश्लीलता के उन्माद के नारे लगा रहा है !

आप जिस भी दल /विचारधारा का समर्थन करते हैं वो आपके व्यक्तित्व में झलकने लगती है और अंततः वह संस्था या तो आप जैसी हो जाती है या आप उसके जैसे हो जाते हैं !

यदि आप सोचते हैं कि असहमति का अंत गौरी लंकेश जैसा होना चाहिए या असहमति का बलात्कार करना चाहिए तो आप उस भी उस उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनने जा रहे हैं या बन बन चुके हैं जिसको जीवन के मूलभूत प्रश्नों से कोई सरोकार नहीं है | आप चुप रहें और जयजयकार करके चमत्कार का इंतज़ार जब तक करें जब कि कोई आपका अपना सवाल करने के जुर्म में अपनी नौकरी नहीं खो देता या चौराहे पर मारा नहीं जाता |

यदि आप ऐसा नहीं सोचते हैं और मानते हैं कि पत्रकार का काम आंकड़ों की बाजीगरी का सच सामने लाना है ताकि आपका पैसा आपके काम आये , ताकि आप ये जान सकें कि आपने जिनको चुना था वो क्या सही क्या गलत कर रहे हैं तो समझिये कि टीवी में परोसी जाने वाली भायँ - भायँ केवल मरीचिका है , बचना चाहते हैं और अपना तर्क बचाये रखना चाहते हैं तो टीवी देखना बंद कर दीजिये | धार्मिक उन्माद से बचिए और समझिये कि एक पूरी इंडस्ट्री है जो ये फरेब लिखती है ,आपको जोड़ती है और आंकड़ों के मायाजाल से भरमा के पेट्रोल की बढ़ती कीमतों , फिसलती नौकरियों के सवाल से दूर कर रही है |

बाकि तो आप जो चाहे जो सोचें , जो चाहे करें कौन रोक सकता है !

दोनों के पत्रों के लिंक आपको दे रही हूँ केवल ब्लॉग के संदर्भ के लिए !

रवीश का पत्र जो प्रधानमंत्री जी के लिए था -
https://www.facebook.com/RavishKaPage/posts/706573349540815


सुशांत सिन्हा का प्रत्युत्तर -
http://www.sushantsinha.news/%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE/


Sunday, 24 September 2017

उम्मीदें रखें पर उनकी कैद स्वीकार ना करें

एक आस , एक उम्मीद हर किसी को रहती है , सबसे भी और खुद से भी | इसी उम्मीद ने रिश्ते बना दिए और तोड़ भी दिए , इसी उम्मीद ने  साँसों को थामे रखा और साँसों की डोर तोड़ भी दी | उम्र गुजर जाती है ,खुद को दिलासा दिए रहने में कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा , न वो वक्त कभी आता है ना सांसे उस वक्त के और इंतज़ार की मोहलत देती हैं | 

अजब बेरोजगारी है इस उम्मीद की जो खत्म ही नहीं होती | रात आती है तो हजार सवाल लिए , क्या होगा -कैसे होगा -ना हुआ तो क्या होगा .......और भी ना जाने कितने बेसिर पैर के सवालों का जखीरा खुल जाता है ! सामने उम्मीद फिर अदालत लगा के बैठ जाती है , दावों -वादों और कहानियों की गवाही होती है ! रात बीतने लगती है ,गवाह सब ऊंघते हुए सो जाते हैं | दिन उग आता है , अपनी शाखाओं पर हजार उम्मीदों के फूल लिए........ मन बावरा फिर चल पड़ता है ,चुनता है धूप और पिरोता है छाहं |  निकल पड़ता है किसी खरीददार के इंतज़ार में कि कोई उसकी मेहनत का , उसके प्रेम का सही मूल्यांकन तो कर सके |  
अंततः उम्मीद को गिरवी रख फिर एक बार हकीकत को घर लाया जाता है | माना कि पेट उम्मीदों से नहीं भरता , ना तन उम्मीद से ढका जा सकता है, तो भी,  वो ना हो तो ना मन भरता है,  न तन मानता है | 

इस उम्मीद का तिलिस्म तोडना मुश्किल है लेकिन इस उम्मीद को जीना रगों में ऑक्सीजन के बहने जैसा है इसलिए उम्मीद कायम रखिये और वही कीजिये जो सबको सुख दे और आपको आत्म संतुष्टी ! आप किसी की उम्मीदों को शतप्रतिशत  पूरा नहीं कर सके , ना वे आपकी उम्मीदों पर हर बार खरे उतरेंगे इसलिए शिकायतों के फेर में ना पड़ें , ना खुद से खुद की शिकायत करें ना दूसरों से उम्मीदें पालें !

उम्मीदें रखें पर उनकी कैद स्वीकार ना करें क्यूंकि जिन्दगी के आपने उसूल हैं , आप उसके पार नहीं जा सकते !

Tuesday, 30 May 2017

आज़ाद कीजिये खुद को नई पुरानी तल्खियों से ........

खुद को कैद रखना आज़ाद कर देने से ज़्यादा आसान होता है ! कभी लम्हों की कैद में ,कभी  सांसों की कैद में......हमे हमेशा सलाखें ही चाहिए होती हैं ,शायद इसीलिए कि हम भी उसी में खुद को सुरक्षित महसूस करने लगते हैं और कभी इसलिए कि वो हमारी जरूरत हो जाती हैं और कभी इसलिए कि उसी में एक दुनिया उग आती है ,वो दुनिया जिसमें हम हैं पर नहीं हैं !

बहुत लोग मिले , हर किसी के पास अपना कैदखाना है , कोई अपनी खुशी से कैद है और कोई दूसरों की ख़ुशी के लिए उसमें कैद है ! रूह भी कैद है और सांसे तो खैर हैं ही ! हाड का पिंजर भी अपने भीतर कितनी जिंदगियां समेटे है |

जिसके पास घड़ी दो घड़ी बैठ जाओ , उनके भीतर से शिकायतों का दरिया बहने लगता है ! हर किसी को महसूस होता है कि उसे छला जा रहा है , सबको सबसे शिकायतें हैं ! अंतहीन सिलसिला है ! ऐसे बहुत कम लोग मिले जो कहते हैं कि उसे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं हैं , कुछ कह भी देते हैं तो अगले ही पल ऐसे सवालों की झड़ी लगा देते हैं जो जिंदगी की "क्यों " पर ही खत्म होती है !

मेरे पास किसी सवाल का कोई जवाब नहीं सिर्फ अपने अनुभव हैं ! उसी से कहती हूँ कि जिंदगी जितने भी सवाल करती है उन सब सवालों के जवाब हमारे ही कर्म हैं ,कुछ इस जन्म के कुछ पिछले जन्मों के ! दोष किसी का नहीं ! जो किया वो पाया तो शिकायत क्या कीजे !

जीना चाहते हैं और खुश रहना चाहते हैं तो शिकायतों की पोटली को इश्क के दरिया में बहा आइये ! आज़ाद कीजिये खुद को नई पुरानी  तल्खियों से और नए कलेवर में अपनी उम्र को एक बार फिर आईने के सामने संवरते देखिये !

 मन एक खूबसूरत किताब है जिसमें उन सुनहरे लम्हों की अनगिनत कहानियां हैं जो जीवन को अधिक अर्थपूर्ण बनाती हैं ...... तो फिर क्यों उन लोगों ,घटनाओं और समय की कैद का स्ववरण किया जाये जो जीवन को ही नष्ट कर रही हैं !

जिंदगी का हाथ थामिये और और चल पड़ें  नए रास्तों और अनजान चेहरों के बीच ,शायद वहां आप खुद को खोज  पाएं !


Sunday, 26 March 2017

रोमियो का खत ,प्राउड इंडियन जी के नाम !

प्रिय प्राउड इंडियन जी ,

मेरा नाम रोमियो है।  मेरा जन्म उस शेक्सपियर की कथा में हुआ था जो भारत से हजारों  मील दूर जब रची गयी, जब आप पैदा भी नहीं हुए थे। 

मेरा गुनाह सिर्फ इतना था कि मैंने उसको प्रेम किया जिसके परिवार एक दूसरे से नफरत करते थे पर इतनी सदियों के बाद , अब मेरा गुनाह ये हो गया कि मैंने प्रेम किया था। दो परिवार आपस में नफरत करें तो भी कीमत प्रेम को चुकानी पड़ती है , दो मुल्क आपस में नफरत करें तो भी कीमत प्रेम को ही चुकानी पड़ती है। अब धर्म और जाति तो मैं जानता नहीं क्योंकि उस उम्र में प्रेम में पड़ा जिस उम्र में नफरत के बीज उगने शुरू हो जाते हैं। 
मैं उस मौसम की पैदावार नहीं था , यही मेरा गुनाह था !

मैं आपके इस खूबसूरत देश कभी आया नहीं तो इस मुल्क के  छिछोरों की पहचान कैसे बन गया ? मैंने कभी किसी को छेड़ा नहीं फिर भी मैं भारतीय मनचलों का ब्रांड एम्बेसेडर बन गया ?  इस दुनिया में क्या प्रेम करना और छेड़ना एक समान ही है ?

मैंने जूलियट से प्रेम किया और उसी से शादी भी की। मैं उसको छोड़ के भागा नहीं और उसके साथ जीवन भर रहने की चाह लिए उसके साथ मर भी गया पर जाने दीजिये, जब आपके नेता ही आपके आदर्श हैं तो इसे आप नहीं समझेंगे !

मेरी पीड़ा बस इतनी सी है कि चार सदी गुजरने के बाद भी दुनिया नफरतों के भँवर में उलझी है और प्रेम करने वाले कल भी मारे जा रहे थे और आज भी मारे जा रहे हैं। आप सियासत करने वाले हैं आपको प्रेम और छिछोरेपन में अंतर करना कठिन लगता होगा , ये मैं समझता हूँ

मैं भारत के उन सभी युवाओं से अपील करता हूँ कि मैं रोमियो हूं , प्रेम करने वाला रोमियो ! मनचला -लड़कियों पर फब्ती करने और स्नूपिंग वाला रोमियो नहीं ! मुझे समझें और मेरे नाम को उस प्रेम के साथ ही जोड़ें जो हर जाति -धर्म और हर दीवार से परे सिर्फ प्रेम करना जानता था। मैनें जूलियट के साथ मरते दम तक अपना प्रेम निभाया ,यही मेरी संस्कृति और यही मेरा धर्म था। 

माननीय प्राउड इंडियन जी भारत आपका देश है , उसे चाहें जैसा बनाएं , जिसे चाहें उठायें , जिसे चाहें घसीटें ,पर मुझे बख्श दें। मैं मेरी जूलियट के साथ उस स्वर्ग में हूँ  जहां सिर्फ प्यार बरसता है। डंडों ,लातो और जेल की सलाखों का यहाँ कोई भय नहीं इसलिए मेरे नाम का दुरूपयोग ना करें। 
आपको आपकी नफरत मुबारक , मुझे मेरे प्रेम  की दुनिया में रहने दीजिये  !

 नमस्कार !

निवेदनकर्ता   
" रोमियो "

Sunday, 4 December 2016

जाड़ों की शाम है

जाड़ों की शाम है
धूप का सिमटना
दिन का सिकुड़ना
रात का फैलना
अदरखी चाय में
तीखी हवा
तुम्हारी बातों
गुलाबी शरारतों का
घुलना और जम जाना
नम होना
आंखों के कोरों का
कोई जाड़ा याद आना
तुम्हारी वार्डरोब हो जाना
बर्फ संग
तुम्हारा खेलना
मुझे लंबे से खत भेजना
अब सब
जाड़ो की शाम है
वही एक मौसम
वही एल्पस
वही ठंड
इस छोर से उस छोर तक
बची रह गयी
केवल जाडों की शाम
वही एक शाम....



तुम मेरी शाम हो ,जंगल वाली शाम !

जंगल में शाम का ढलना अजीब अजीब सा शोर पैदा कर देता है। इस डूबने का अपना मजा है और इस शोर में भीतर की खामोशी को तोड़ने का हुनर है ...... एक साथ इतनी आवाजें कि पहचान ही न सको कि कौनसी भीतर की है और कौनसी बाहर की ! कुछ दरकने की, कुछ संवरने की ,कुछ सुनी - कुछ अनसुनी सी। परिंदे घर लौट रहे हैं , अपनी-अपनी शाख को पहचान रहे हैं ,अपने नीड़ के लिए सामान ला रहे हैं ,कुछ सपने बुन रहे हैं और कुछ थक के जो भी भी मिला, उसी में गुनगुना रहे हैं।

दूर धुआं उठ रहा है , चूल्हा जला होगा। कोई वहां भी लौटा होगा ....... झील ने सूरज में हाथ डुबो दिए और उसको अपनी रोशनी दी है...... पानी पर लौ तैर रही है। उधर क्षितिज पर एक तारा है.....  बुलाने आया है औरों को भी ,आ जाओ ,खेलने का समय हो गया है। सही भी है ना ,लकड़ियां बीनती औरत को घर लौटने का इशारा करना भी तो उसी का काम है। वही बताएगा कि और संगी आ जायें , उसके पहले लौट जाओ।  वही रास्ते भर उनका ख्याल रखेंगे और उनको उनके घर लौटने तक पगडंडी की आवाज़ को भी जिलाये रखेंगे। 

शाम कहीं भी हो ,जंगल में हो या कम्प्यूटर के सामने बन्द कमरे में ...... अपने साथ एक एहसास लाती है। भूख जगने लगती है। भूख, उन ख्वाबों की जो दिन देखता है और भूख उन ख्वाहिशों की जो कैलेंडर सी दीवार पर टंगीं है .......

कितनी ही शामें गुजर गयीं , सालों में तब्दील होती चली गयीं और मैं उन्हें लम्हों की तलाश में शाम से सुबह ,सुबह से फिर शाम में बदलती चली गयी। मुझे शामों ने सिखाया है कि कोई भी शाम वैसी नहीं होती जैसी कल थी ,जैसी अब है और ये भी कि मैं कल भी वैसी ही थी और आज भी वैसी ही हूं जैसी कल थी। उसमें और मुझमें इतना सा रिश्ता है कि मैं उसके साथ उतनी सी बदलती हूं, जितना कि सूरज के ढलने और उगने का भरम होता है। कोई सोता है तो मान लेता है कि सूरज डूब गया ,कोई जाग गया तो मान लेता है कि उग गया। 

शामें इसी दुविधा का नाम हैं ! क्या मानूं ? अब जो भी हैं अजीज़ हैं मुझे ,जंगल की इस शाम जैसी !

सुनो ,तुम मेरे कितना करीब हो आज भी। बिलकुल इस शाम जितना ...... मेरे ख्वाब ,मेरी ख्वाहिशें सब तुमसे वाबस्ता हैं। इतना सा करम रखना बस ......तुम भी मेरे हिस्से के सितारे बस मेरे ही रखना ...... हर रात मेरे ही आंचल में उंडेलने के लिए , हर रात चांद मेरे ही सिराहने हो...... मैं वैसे ही लौटती रहूं तुममें !

तुम मेरी शाम हो ,जंगल वाली शाम ! मुझमें बसे रहना..... ताल किनारे चाँद के डूबने तक !